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भैषज्य रत्नावली
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भैषज्यरत्नावली, आयुर्वेद का एक ग्रन्थ है। इसके रचयिता गोविन्ददास सेन हैं। इसकी रचना कब और कहाँ हुई, यह ठीक-ठीक पता नहीं है। किन्तु इसका सबसे पहला यान्त्रिक प्रकाशन कोलकाता से १८७७ में हुआ। उनके वंशज विनोद लाल सेन ने इसका प्रकाशन कराया। यह भारत के उत्तरी भागों (विशेषकर बंगाल) में प्रचलित है।
भैषज्य रत्नावली आयुर्वेदीय चिकित्सा ग्रन्थोंमें एक उत्कृष्ट और प्रामाणिक चिकित्सा ग्रन्थ समझा जाता है । वैद्य समाज में इसका बड़ा आदर है। कारण इसके रचयिता श्रीगोविन्ददास सेन ने इसमें अनेक अनुभूत योगों का संग्रह बड़ी सुन्दर और सरल रीति से किया है। इसमें क्वाथ, चूर्ण, अवलेह, आसव, अरिष्ट आदि वनस्पति प्रयोग और रसधातु आदि के द्वारा सिद्ध किये रसायन प्रयोग दिये गये हैं। इस प्रकार दोनों प्रकार के योगों का समावेश होने के कारण इसके द्वारा सभी श्रेणी के वैद्य उत्तम रीति से लाभ उठा सकते हैं । इसका प्रत्येक प्रयोग प्रत्यन्त गुणकारक और त्वरित फलप्रद होने से यह ग्रन्थ वैद्यों को अल्प समय में ही अत्यन्त आदरणीय हो गया है। अब तक इसके कलकत्ता, लखनऊ, लाहौर आदि में कई संस्करण हो चुके हैं।
महामान्य कविराज श्रीगोविन्ददास सेन ने इस ग्रन्थ की रचना लगभग १८वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में की थी। पहले इस ग्रन्थ का बङ्गाल में अधिक प्रचार हुआ। फिर धीरे धीरे सारे भारतवर्ष में इसका समादर होने लगा ।
बाहरी कड़ियाँ
भैषज्यरत्नावली (गूगल पुस्तक) (जयदेव विद्यालंकार कृत हिन्दी व्याख्या सहित)
गोविन्ददास सेन कृत भैषज्य रत्नावली (हिन्दी भाषा टीका - वैद्य शंकर लाल)
भैषज्यरत्नावली (हिन्दी भाषा टीका - सिद्धि नन्दन मिश्र)
Various forms of medications in Bhaishajya Ratnavali (आयुषवेद)
श्रेणी:आयुर्वेद