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कार्बनी कल्प
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जनवरी 2017
thumb|कार्बनी कल्प सम्पादन।
कार्बनप्रद तंत्र (Carboniferous System) उन शैलों के समुदाय को कहते हैं जिनसे पत्थर का कोयला और उसी प्रकार के कार्बनमय पदार्थ मिलते हैं। जिस युग में यह तंत्र बना उसे कार्बनी कल्प (Carboniferous period) कहते हैं।
परिचय
सन् 1822 ई. में डब्ल्यू.डी. कानीबियर ने इस तंत्र का नाम कार्बनिफ़रस इसलिए रखा कि इसे अंतर्गत समस्त इंग्लैंड का कोयला आ जाता है। इस तंत्र के अंतर्गत विश्व की अधिकांश मुख्य कोयला खानें भी आ जाती हैं। इस दृष्टि से भी यह सर्वथा उचित प्रतीत होता है। कार्बनप्रद युग और गिरियुग (Permian) में कई बातें समान होने के कारण कुछ विद्वान् इन दोनों युगों का एक ही नामकरण करते हैं; जैसे एन्थ्रौकोलियिक, कार्बोपरमियन, पैलियो-परमियन अथवा परमो-कार्बनिफ़रस।
इस युग के पादप विशेष महत्व के हैं। इनकी अत्यधिक वृद्धि हुई और इनके कारण इस युग के कार्बन का निर्माण हो सका। इस युग के स्थल पादपों में पर्वांग (ferm), पर्वांग के ही समान टेरिडोस्पर्म (Pteridosperm), साइक्राडोफ़िलिकल, लाइकोपॉड (lycopod) और अश्वपुच्छ (equistum), प्रजाति की प्रधानता थी।
इस तंत्र पादछिद्रगण (foraminifera) नामक जीव शैलनिर्माण और स्तरनिर्माण के रूप में पहली बार महत्वपूर्ण हुए। प्रवाल भी महत्व के हैं जिनमें से लांसडेलिया तथा लिथॉस्ट्रोशन महत्वपूर्ण हैं और जिनका एक निश्चित स्तरनिर्माण है। स्थल संधिपादों (आर्थोपोडा) में भीमकाय कीट थे, व्याधिपतंग (ड्रैगन फ़्लाइ) के पंखों का फैलाव उन दिनों 2।। फुट का था जिससे यह प्रकट होता है कि उस युग का वातावरण अधिक घना था, परंतु पंखों का यह आकार वायु में प्रतिद्वंद्विता के अभाव के कारण भी हो सकता है, क्योंकि उस समय पक्षियों का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। ब्राइयोज़ोआ (हरिता जीवा) नामक प्राणी प्राय: बहुतायत में थे जिनमें से फ़ेनेस्टेला कहलानेवाली प्रजाति अति व्याप्त थी। बाहुपाद (Brachiopoda) भी प्रचुर संख्या में थे और उनमें स्पीरीफ़ेरा और प्रोडक्टस प्रजातियाँ अधिक थीं। उदरपाद (Gastropod) में बेलरोफ़ान सुविस्तृत प्रजाति थी और फलकक्लोमा में यरेडिसमा प्रजाति उत्तर कार्बनप्रद युग में सुविस्तृत थी। शीर्षपादों (Cephalopoda) में गोनियाटाइटीज़ (Goniatites) अधिक थे।
पृष्ठवंशी जीवों में चौपायों का प्रादुर्भाव उल्लेखनीय है। अभी हमें उनके पादचिह्नों का ही ज्ञान है।
भारत के कार्बनप्रद शैल अवर, मध्य और उत्तर भागों में विभक्त किए गए हैं। अवर और मध्य कार्बनप्रद शैलों के अवसादन के उपरांत, भारत के भौतिक इतिहास में विशाल क्रांतियाँ घटित हुईं, जिनके परिणामस्वरूप स्थल और समुद्र के वितरण में विशेष परिवर्तन हुए।
कैब्रियन युग के बाद आनेवाले सुपुरा कल्प के प्रांरभ में प्रायद्वीपीय भारत के बाहर के स्थल और समुद्र का पुन: विस्तरण हुआ। फलत: उस विशाल भूखंड में, जहाँ पर आज हम विशाल हिमालय को देखते हैं, टेथिस नाम से प्रसिद्ध एक सागर फैल गया। इसका विस्तार स्पेन से लेकर चीन तक लगातार था। इस टेथिस सागर ने उत्तर यूरेशिन महाद्वीप को दक्षिण गोंडवाना महाद्वीप से पृथक कर रखा था।
यूरोप में रूस एक ऐसा देश है जहाँ पर कार्बप्रद शैलों का विकास अन्य स्थानों की अपेक्षा पहले हुआ है। ब्रिटेन में इस युग के शैलों का दो भागों में विभाजन किया गया है जो दो विभिन्न कालों में बने हैं। ब्रिटेन की भाँति, अमरीका में भी ये शैल दो भागों में विभक्त हैं। एशिया में ये शैल हिंदचीन, चीन, मंगोलिया, जापान, साइबेरिया आदि देशों में मिलते हैं।
भारतवर्ष में अवर तथा मध्य कार्बनप्रद शैल स्पीती और कश्मीर में मिलते हैं। उत्तर कार्बन प्रद शैलों का अत्युत्तम विकास सॉल्ट रेंज (Salt Range) में हुआ है।
बाहरी कड़ियाँ
International Commission on Stratigraphy (ICS)
Geologic Time Scale 2004
http://www.stratigraphy.org/bak/geowhen/index.html
November 8, 2009
https://web.archive.org/web/20130106085716/http://www.stratigraphy.org/bak/geowhen/index.html
6 जनवरी 2013
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Examples of Carboniferous Fossils
60+ images of Carboniferous Foraminifera
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