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पण्डित परमानन्द
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पंडित परमानन्द (६ जून १८८९ - १९८२ ) भारतीय स्वतन्त्रता के एक महान क्रान्तिकारी थे जिन्हें २३ वर्षों तक अण्डमान की सेल्युलर जेल में बन्द रखा गया। उन्होंने अपना सारा जीवन देश की आजादी की जंग में लगा दिया। आजादी के उपरान्त उन्होंने कोई सरकारी पद स्वीकार न करके अनूठे परित्याग का उदाहरण पेश किया।Pandit Parmanand: Prisons as Homes for Long Periods for India’s Freedom
जीवनी
पण्डित परमानन्द का जन्म झाँसी जिले (अब हमीरपुर जिला) के राठ के सिकरौधा गांव में 6 जून 1889 को हुआ था। वे सोलह वर्ष की उम्र से ही क्रांतिकारी गतिविधियाँ संचालित करने लगे थे। उनका स्पष्ट मानना मानना था कि आजादी सिर्फ सशस्त्र क्रांति से ही संभव है। हथियार कहाँ से लायें, यह एक महान प्रश्न था। क्रांतिकारियों के दल ने यह कार्य पं. परमानंद को सौंपा । उन्हें अमेरिका से शस्त्र लाने के साथ ही अंग्रेज सरकार की सेना के गुप्त नक्शे लाने का काम भी सौंपा गया था।
वे एक जहाज में छह हजार राइफलें गोले और हथियार लेकर लौटे और सशस्त्र क्रांति की तैयारी ही कर रहे थे कि उन्हीं के एक गद्दार साथी ने ब्रिटिश सरकार को सूचना दे दी। इससे क्रांतिकारियों की टोली पकड़ी गई। इसमें सात लोगों को फांसी की सजा दी गई। पं० परमानंद को आजीवन कारावास की सजा सुनाकर कालापानी जेल भेज दिया गया। राठ के परमानन्द ने निभाई थी आजादी में अग्रणी भूमिका
इन्हें भी देखें
भाई परमानन्द
सन्दर्भ
श्रेणी:भारतीय क्रान्तिकारी