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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

खंड-४

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खड्‌ग बड़ा उद्धत होता है, उद्धत होते हैं राजे, इसीलिए तो सदा बनाते रहते वे रण के बाजे। और करे ज्ञानी ब्राह्मण क्या? असि-विहीन मन डरता है, राजा देता मान, भूप का वह भी आदर करता है। 'सुनता कौन यहाँ ब्राह्मण की, करते सब अपने मन की, डुबो रही शोणित में भू को भूपों की लिप्सा रण की। औ' रण भी किसलिए? नहीं जग से दुख-दैन्य भगाने को, परशोषक, पथ-भ्रान्त मनुज को नहीं धर्म पर लाने को। 'रण केवल इसलिए कि राजे और सुखी हों, मानी हों, और प्रजाएँ मिलें उन्हें, वे और अधिक अभिमानी हों। रण केवल इसलिए कि वे कल्पित अभाव से छूट सकें, बढ़े राज्य की सीमा, जिससे अधिक जनों को लूट सकें। 'रण केवल इसलिए कि सत्ता बढ़े, नहीं पत्ता डोले, भूपों के विपरीत न कोई, कहीं, कभी, कुछ भी बोले। ज्यों-ज्यों मिलती विजय, अहं नरपति का बढ़ता जाता है, और जोर से वह समाज के सिर पर चढ़ता जाता है। 'अब तो है यह दशा कि जो कुछ है, वह राजा का बल है, ब्राह्मण खड़ा सामने केवल लिए शंख-गंगाजल है। कहाँ तेज ब्राह्मण में, अविवेकी राजा को रोक सके, धरे कुपथ पर जभी पाँव वह, तत्क्षण उसको टोक सके। 'और कहे भी तो ब्राह्मण की बात कौन सुन पाता है? यहाँ रोज राजा ब्राह्मण को अपमानित करवाता है। चलती नहीं यहाँ पंडित की, चलती नहीं तपस्वी की, जय पुकारती प्रजा रात-दिन राजा जयी यशस्वी की! 'सिर था जो सारे समाज का, वही अनादर पाता है। जो भी खिलता फूल, भुजा के ऊपर चढ़ता जाता है। चारों ओर लोभ की ज्वाला, चारों ओर भोग की जय; पाप-भार से दबी-धँसी जा रही धरा पल-पल निश्चय। 'जब तक भोगी भूप प्रजाओं के नेता कहलायेंगे, ज्ञान, त्याग, तप नहीं श्रेष्ठता का जबतक पद पायेंगे। अशन-वसन से हीन, दीनता में जीवन धरनेवाले। सहकर भी अपमान मनुजता की चिन्ता करनेवाले, 'कवि, कोविद, विज्ञान-विशारद, कलाकार, पण्डित, ज्ञानी, कनक नहीं, कल्पना, ज्ञान, उज्ज्वल चरित्र के अभिमानी, इन विभूतियों को जब तक संसार नहीं पहचानेगा, राजाओं से अधिक पूज्य जब तक न इन्हें वह मानेगा, 'तब तक पड़ी आग में धरती, इसी तरह अकुलायेगी, चाहे जो भी करे, दुखों से छूट नहीं वह पायेगी। थकी जीभ समझा कर, गहरी लगी ठेस अभिलाषा को, भूप समझता नहीं और कुछ, छोड़ खड्‌ग की भाषा को। 'रोक-टोक से नहीं सुनेगा, नृप समाज अविचारी है, ग्रीवाहर, निष्ठुर कुठार का यह मदान्ध अधिकारी है। इसीलिए तो मैं कहता हूँ, अरे ज्ञानियों! खड्‌ग धरो, हर न सका जिसको कोई भी, भू का वह तुम त्रास हरो। 'नित्य कहा करते हैं गुरुवर, 'खड्‌ग महाभयकारी है, इसे उठाने का जग में हर एक नहीं अधिकारी है। वही उठा सकता है इसको, जो कठोर हो, कोमल भी, जिसमें हो धीरता, वीरता और तपस्या का बल भी। 'वीर वही है जो कि शत्रु पर जब भी खड्‌ग उठाता है, मानवता के महागुणों की सत्ता भूल न जाता है। सीमित जो रख सके खड्‌ग को, पास उसी को आने दो, विप्रजाति के सिवा किसी को मत तलवार उठाने दो। 'जब-जब मैं शर-चाप उठा कर करतब कुछ दिखलाता हूँ, सुनकर आशीर्वाद देव का, धन्य-धन्य हो जाता हूँ। 'जियो, जियो अय वत्स! तीर तुमने कैसा यह मारा है, दहक उठा वन उधर, इधर फूटी निर्झर की धारा है। 'मैं शंकित था, ब्राह्मा वीरता मेरे साथ मरेगी क्या, परशुराम की याद विप्र की जाति न जुगा धरेगी क्या? पाकर तुम्हें किन्तु, इस वन में, मेरा हृदय हुआ शीतल, तुम अवश्य ढोओगे उसको मुझमें है जो तेज, अनल। 'जियो, जियो ब्राह्मणकुमार! तुम अक्षय कीर्ति कमाओगे, एक बार तुम भी धरती को निःक्षत्रिय कर जाओगे। निश्चय, तुम ब्राह्मणकुमार हो, कवच और कुण्डल-धारी, तप कर सकते और पिता-माता किसके इतना भारी? 'किन्तु हाय! 'ब्राह्मणकुमार' सुन प्रण काँपने लगते हैं, मन उठता धिक्कार, हृदय में भाव ग्लानि के जगते हैं। गुरु का प्रेम किसी को भी क्या ऐसे कभी खला होगा? और शिष्य ने कभी किसी गुरु को इस तरह छला होगा? 'पर मेरा क्या दोष? हाय! मैं और दूसरा क्या करता, पी सारा अपमान, द्रोण के मैं कैसे पैरों पड़ता। और पाँव पड़ने से भी क्या गूढ़ ज्ञान सिखलाते वे, एकलव्य-सा नहीं अँगूठा क्या मेरा कटवाते वे?