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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

चीनी अनुवाद सिद्धांत

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आधुनिक मानक चीनी शब्द ‘fanyi (翻譯)’ का अर्थ ‘अनुवाद’ या ‘अनुवाद करना’ है। ‘fan’ का अर्थ ‘पलटना’ या ‘पार करना’ होता है और ‘yi’ का अर्थ ‘अनुवाद करना’ या ‘व्याख्या करना’ होता है। इसके कुछ संबंधित पर्यायवाची शब्द हैं, ‘tongyi (通譯)’ जिसका अर्थ ‘व्याख्या करना’ या ‘अनुवाद करना’ है, ‘chuanyi (傳譯)’ जिसका अर्थ ‘व्याख्या करना’ या ‘अनुवाद करना’ है, और ‘zhuanyi (轉譯)’ जिसका अर्थ ‘अनुवाद करना’ या ‘पुनः अनुवाद करना’ है। चीनी शास्त्रीय ग्रंथों में ‘दुभाषिया’ या ‘अनुवादक’ के अर्थ में कई शब्द मिलते हैं। उदाहरण के लिए, ‘शरन (舌人)’ जिसका शाब्दिक अर्थ ‘जीभ व्यक्ति’ है, और ‘फानश (反舌)’ जिसका अर्थ ‘उलटी जीभ’ होता है। The Classic of Rites में चार क्षेत्रीय शब्दों का उल्लेख मिलता है। ‘ji (寄)’ जिसका अर्थ ‘भेजना, सौंपना, भरोसा करना’ है, ‘Dongyi (東夷)’ यानी ‘पूर्वी बर्बर’ के लिए प्रयुक्त होता है। ‘xiang (象)’ जिसका अर्थ ‘जैसा, समान, छवि’ है, ‘Nanman (南蠻)’ यानी ‘दक्षिणी बर्बर’ के लिए प्रयोग होता है। ‘didi (狄鞮)’ ‘Xirong (西戎)’ यानी ‘पश्चिमी बर्बर’ के लिए आता है, और ‘yi (譯)’ जिसका अर्थ ‘अनुवाद’ या ‘व्याख्या’ है, ‘Beidi (北狄)’ यानी ‘उत्तरी बर्बर’ के लिए प्रयुक्त होता है।| उन पाँचों क्षेत्रों के लोगों की भाषाएँ एक-दूसरे को समझ में नहीं आती थीं। उनकी पसंद-नापसंद और इच्छाएँ भी अलग-अलग थीं। उनके विचारों को समझने और अपनी बात पहुँचाने के लिए अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। पूर्व में उन्हें ‘प्रेषक’ कहा जाता था, दक्षिण में ‘प्रतिनिधि’, पश्चिम में ‘ती-ती’ और उत्तर में ‘दुभाषिए’।पश्चिमी हान काल की एक रचना में अनुवाद पर एक संवाद को कन्फ्यूशियस से जोड़ा गया है। कन्फ्यूशियस उस शासक को सलाह देते हैं जो विदेशी भाषाएँ सीखना चाहता है कि उसे इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए। वे शासक से कहते हैं कि वह शासन पर ध्यान दे और अनुवाद का काम अनुवादकों पर छोड़ दे। अनुवाद सिद्धांत का सबसे प्रारंभिक उल्लेख संभवतः ‘गुलियांग चुआन’ में मिलता है, जहाँ Confucius से जुड़ा एक वाक्यांश है: “नाम अपने धारकों का अनुसरण करें, जबकि वस्तुएँ चीन का अनुसरण करें” (名從主人, 物從中國)। दूसरे शब्दों में, नामों का लिप्यंतरण करना चाहिए, जबकि वस्तुओं का अनुवाद उनके अर्थ के अनुसार करना चाहिए। बाद में छिंग राजवंश और गणराज्य काल में, लिआंग छिचाओ, हु श॑ और चौऊ त्सोउरन जैसे सुधारकों ने चीनी इतिहास के महान अनुवादकों के अनुवाद-प्रयोग और सिद्धांतों का अध्ययन करना शुरू किया। ताओ आन (314-385 ई.) शब्द-क्रम में परिवर्तन: संस्कृत में शब्द-क्रम (कर्ता–क्रिया–कर्म) निश्चित नहीं होता, जबकि चीनी में शब्द-क्रम कर्ता–क्रिया–कर्म होता है। साहित्यिक अलंकरण जोड़ना: जहाँ मूल पाठ सरल शैली में है, वहाँ साहित्यिक अलंकरण जोड़े जाते हैं। तर्क में पुनरावृत्ति हटाना: तर्क में होने वाले दोहराव को समाप्त किया जाता है। सारांश भाग हटाना: सारांश वाले खंड को हटा दिया जाता है। परिचय भाग में कटौती: परिचयात्मक भाग में दोहराई गई सामग्री को हटाया जाता है। ताओ आन ने अन्य अनुवादकों की यह कहकर आलोचना की कि अनुवाद में सामग्री खो जाती है। उन्होंने यह भी पूछा कि यदि कोई अनुवादक Shijing या Classic of History जैसी कृतियों के कथित उबाऊ हिस्सों को हटा दे, तो लोगों को कैसा लगेगा? उन्होंने अनुवाद की कठिनाई पर भी विस्तार से चर्चा की, अपनी 'तीन कठिनाइयाँ' (三不易) के सिद्धांत के साथ: बुद्ध द्वारा संबोधित किए गए श्रोताओं से भिन्न श्रोताओं में धर्म का संचार करना। एक संत के शब्दों का अनुवाद करना। ऐसे ग्रंथों का अनुवाद करना जिन्हें शिष्यों की पीढ़ियों ने बड़ी मेहनत से रचा है। कुमारजीव (1444-413 ई.) कुमारजीव की अनुवाद पद्धति अर्थानुवाद पर आधारित थी। एक कथा के अनुसार, एक दिन उन्होंने अपने शिष्य सेंगरूई के “स्वर्ग मनुष्य को देखता है, और मनुष्य स्वर्ग को देखता है” (天見人, 人見天) वाले अनुवाद की आलोचना की। कुमारजीव को लगा कि “मनुष्य और स्वर्ग जुड़े हैं, और दोनों एक-दूसरे को देख सकते हैं” (人天交接, 兩得相見) अधिक स्वाभाविक और मुहावरेदार है, हालांकि पहला वाक्य भी पूरी तरह गलत नहीं था। एक अन्य कथा में कुमारजीव सूत्रों के अंत में मंत्रों के अनुवाद की समस्या पर चर्चा करते हैं। मूल पाठ में सौंदर्य पर विशेष ध्यान दिया गया है, लेकिन यह सौंदर्य और उसका साहित्यिक रूप, जो संस्कृत की विशेषताओं पर आधारित है, अनुवाद में खो जाता है। इसे वे ऐसे बताते हैं जैसे चावल चबाकर किसी को खिलाना (嚼飯與人)। हुई युऐन (334-416 ई.) हुई युऐन का अनुवाद सिद्धांत संतुलित माना जाता है। यह सुरुचिपूर्ण (文雅) और साधारण (質樸) दोनों के अतियों से बचता है। सुरुचिपूर्ण अनुवाद में भाषा मूल अर्थ से आगे बढ़ जाती है (文過其意), जबकि साधारण अनुवाद में विचार शब्दों पर हावी हो जाता है (理勝其辭)। हुई युआन के अनुसार, शब्दों से अर्थ को नुकसान नहीं होना चाहिए (文不害意)। एक अच्छे अनुवादक को मूल भाव को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए (務存其本)। सेंगरूई (371-438 ई.) सेंगरूई ने वस्तुओं के नामों के अनुवाद में आने वाली समस्याओं की जाँच की। यह एक महत्वपूर्ण पारंपरिक चिंता का विषय है, जिसका स्रोत कन्फ्यूशियस की “नामों को सुधारो” (正名) की अवधारणा में मिलता है। सेंगरूई के लिए यह केवल सैद्धांतिक विषय नहीं था, क्योंकि गलत अनुवाद बौद्ध धर्म को नुकसान पहुँचा सकता है। उन्होंने अपने गुरु कुमारजीव के नामों के अनुवाद में लापरवाही की आलोचना की और इसे इस कारण से जोड़ा कि कुमारजीव चीनी परंपरा से पूरी तरह परिचित नहीं थे, जहाँ नामों को उनके वास्तविक अर्थ (名實) से जोड़ा जाता है। सेंग्योउ (445-518 ई.) पहले के अनुवादकों की प्रारंभिक सामग्री का अधिकांश भाग सेंग्योउ ने एकत्र किया था; यदि उन्होंने ऐसा न किया होता, तो यह सामग्री खो जाती। अनुवाद के प्रति सेंग्योउ का दृष्टिकोण हुई युऐन के समान था, क्योंकि दोनों ही अच्छे अनुवाद को सुरुचिपूर्णता और सादगी के बीच का संतुलन मानते थे। हालांकि, हुई युआन के विपरीत, सेंग्योउ ने कुमारजीव के सुरुचिपूर्ण अनुवादों की प्रशंसा की। शुऐन त्सांग(600-664 ई.) शुऐन त्सांग का सिद्धांत है पाँच अनुवाद-अयोग्य शब्द (五種不翻), या पाँच ऐसे उदाहरण जहाँ लिप्यंतरण करना चाहिए: रहस्य: धारणी (陀羅尼) संस्कृत के अनुष्ठानिक वाक्य या मंत्र होते हैं, जिनमें मंत्र शामिल होते हैं। बहुवचनता: भगवन्त (薄伽梵) के कई अर्थ होते हैं, जैसे— सार्वभौम, तेजस्वी, गंभीर, कीर्तिमान, शुभ और प्रतिष्ठित। चीन में नहीं: जांबू वृक्ष (閻浮樹) चीन में नहीं पाया जाता। अतीत के प्रति सम्मान: ‘अनुत्तर-सम्यक-संबोधि’ का अनुवाद पहले से ही ‘अनुपुति’ (阿耨菩提) के रूप में प्रचलित है। सम्मान और धर्मभाव जगाने के लिए: ‘बुद्धिमत्ता’ (智慧) के स्थान पर ‘प्रज्ञा’ (般若) शब्द का प्रयोग किया जाता है। यान फू (1898) यान फू अपने अनुवाद के तीन मानदंडों के लिए प्रसिद्ध हैं, जिन्हें उन्होंने Thomas Henry Huxley की कृति Evolution and Ethics के अनुवाद की प्रस्तावना में “Xin–Da–Ya” के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, अनुवाद में तीन मुख्य बातें होती हैं, निष्ठा (信 xìn), यानी मूल के प्रति सच्चा रहना; अभिव्यक्तिशीलता या स्पष्टता (達 dá), यानी पाठक के लिए आसानी से समझ में आना; और सुंदरता (雅 yǎ), यानी भाषा का सौंदर्यपूर्ण और प्रभावी होना। तीनों पहलुओं में से, यान फू ने Evolution and Ethics के अपने अनुवाद में अभिव्यक्ति (達 dá) को सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना। उनका तर्क था कि यदि पाठक अनुवादित पाठ का अर्थ समझ ही नहीं पाए, तो अनुवाद का कोई उपयोग नहीं है। समझ को आसान बनाने के लिए शब्दों का क्रम बदला जा सकता है, चीनी उदाहरण मूल उदाहरणों की जगह ले सकते हैं, और लोगों के नाम भी चीनी में लिखे जा सकते हैं। यान फू के अनुवाद के मानदंड उनके अंग्रेज़ी से चीनी में वैज्ञानिक कृतियों के अनुवाद के अनुभव पर आधारित थे। इन मानदंडों का गलत उपयोग तब होता है जब इन्हें साहित्यिक कृतियों पर लागू कर दिया जाता है और इन्हें सार्वभौमिक सिद्धांत मान लिया जाता है। इसके अलावा, इन सिद्धांतों की दो प्रमुख गलत व्याख्याएँ हैं ; (क) सुलभता को ही स्पष्टता या अभिव्यक्तिशीलता मान लेना, और (ख) यान फू के विशेष पाठकों को सामान्य पाठक मानकर सामान्यीकरण कर देना। यान फू के अनुसार, एक ही समय में ‘शिन–दा–या’ के तीनों पहलुओं को पूरी तरह प्राप्त करना संभव नहीं है। उन्होंने इन मानदंडों का उपयोग केवल Evolution and Ethics के अपने अनुवाद के अंतिम विकल्पों को समझाने के लिए किया था। इन सीमाओं के बावजूद, यान फू के ‘शिन–दा–या’ मानदंडों ने उस समय अनुवाद को समझने का एक नया तरीका दिया और आधी सदी से अधिक समय तक अनुवाद के दृष्टिकोणों को प्रभावित किया। लियांग छिचाओ (1920) लियांग छिचाओ ने अनुवाद के इन तीन गुणों को उसी क्रम में रखा: पहले निष्ठा, फिर स्पष्टता, और अंत में सौंदर्य। लिन युथांग (1933) लिन युथांग ने मूल, पाठक और कला के प्रति अनुवादक की जिम्मेदारी पर जोर दिया। इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए अनुवादक को निष्ठा (忠實), प्रवाह (通順) और सौंदर्य (美) के मानदंडों को पूरा करना चाहिए। अनुवाद के संबंध में लू शून का सबसे प्रसिद्ध कथन है "मैं सुगमता की अपेक्षा निष्ठावान रहना पसंद करूँगा" (寧信而不順)। आइ सछी (1937) आइ सछी ने पश्चिमी अस्तित्ववाद के संदर्भ में निष्ठा, स्पष्टता और सुंदरता के बीच संबंधों का वर्णन किया, जहाँ स्पष्टता और सुंदरता का निष्ठा के साथ वही संबंध है जो गुणों का अस्तित्व के साथ होता है। चोऊ त्सुओरन ने अनुवाद को वज़न आवंटित किया: 50% वफ़ादारी, 30% स्पष्टता और 20% सुंदरता। चू ग्वांगछिऐन (1944) चू ग्वांगछिऐन ने लिखा कि अनुवाद में निष्ठा वह मूल है जिसे आप प्राप्त करने का प्रयास कर सकते हैं, लेकिन कभी प्राप्त नहीं कर सकते। यह सूत्रीकरण शायद दाओवादी दर्शन में मूल की ओर लौटने की पारंपरिक धारणा को उजागर करता है। फू लेई का मानना था कि अनुवाद चित्रकला की तरह है: जो आवश्यक है वह औपचारिक समानता नहीं बल्कि आध्यात्मिक समानता (神似) है। छिऐन झोंगशु (1964) छिऐन झोंगशू ने लिखा कि अनुवाद का सर्वोच्च मानक रूपांतरण (化, प्रकृति में रूपांतरण की शक्ति) है: शरीर त्याग दिए जाते हैं, लेकिन आत्मा (精神), रूप और अंदाज़ (姿致) पहले जैसे ही रहते हैं (故我, पुराना स्वयं). श्रेणी:अनुवाद अध्ययन