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411 समाचार
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सण्डीला

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सण्डीला Sandila सण्डीला India Uttar Pradesh 27.08 N 80.52 E उत्तर प्रदेश में स्थिति हरदोई ज़िलाउत्तर प्रदेश 58,346 2011 हिन्दी उत्तर प्रदेश जिला हरदोई तहसील सण्डीला भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के हरदोई में स्थित एक नगर है। इसके अतिरिक्त संण्डीला प्रशासन प्रणाली में एक तहसील का दर्जा रखता है।। यहां के लड्डू बहुत मशहूर हैं।। आप लोग कभी भी आएं तो एक बार यहां के लड्डू जरुर खाएं और अपने अपने घर भी जरुर ले जाएं।। "Uttar Pradesh in Statistics," Kripa Shankar, APH Publishing, 1987, ISBN 9788170240716"Political Process in Uttar Pradesh: Identity, Economic Reforms, and Governance https://web.archive.org/web/20170423083533/https://books.google.com/books?id=S46rbUL6GrMC 23 अप्रैल 2017," Sudha Pai (editor), Centre for Political Studies, Jawaharlal Nehru University, Pearson Education India, 2007, ISBN 9788131707975 इतिहास ब्रिटिशकालीन Gazetteer of the Province of Oudh, Volume III (1878) के अनुसार संडीला परगना के प्रारंभिक इतिहास में अर्कवंशी (अरख/Arakh) समुदाय का महत्वपूर्ण स्थान था। गज़ेटियर में उल्लेख है कि स्थानीय परंपरा के अनुसार अर्कवंशी (अरख) समुदाय के दो भाई सलहिया और मलहिया इस क्षेत्र के प्रमुख शासक थे। इनमें सलहिया द्वारा सलहियापुर, जो आगे चलकर संडीला कहलाया, तथा मलहिया द्वारा मलिहाबाद की स्थापना किए जाने का उल्लेख मिलता है। गज़ेटियर के अनुसार अर्कवंशी (अरख) शासकों का संडीला तथा उसके आसपास के विस्तृत भूभाग पर कई पीढ़ियों तक अधिकार रहा। इस स्रोत में कहा गया है कि उनका शासन 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक बना रहा। इसके बाद दिल्ली सल्तनत के शासनकाल में सैयद मखदूम अलाउद्दीन ने संडीला पर अभियान चलाया और युद्ध के बाद इस क्षेत्र पर सल्तनत का अधिकार स्थापित हुआ। गज़ेटियर में यह भी उल्लेख है कि इस संघर्ष की स्मृति लंबे समय तक स्थानीय परंपराओं में बनी रही तथा उतरौला के अरख अपने पूर्वजों के संडीला पर अधिकार का स्मरण करते थे। इसी गज़ेटियर में यह भी दर्ज है कि स्थानीय परंपरा के अनुसार अरख (अर्कवंशी) इस क्षेत्र के सबसे प्राचीन निवासियों में माने जाते थे। ब्रिटिश प्रशासन ने संडीला के प्रारंभिक इतिहास का वर्णन करते हुए अरख समुदाय को इस क्षेत्र के आरंभिक राजनीतिक इतिहास से जोड़ा है। बाद के ब्रिटिशकालीन अभिलेखों, जैसे Regular Settlement of Hardoi District (1880) तथा The Tribes and Castes of the North-Western Provinces and Oudh में भी अरख समुदाय का उल्लेख मिलता है। इन स्रोतों में संडीला और उसके आसपास के क्षेत्रों में अरखों की ऐतिहासिक उपस्थिति का वर्णन किया गया है। संदर्भ Gazetteer of the Province of Oudh, Vol. III (N–Z), Government Press, 1878, pp. 300–301. Regular Settlement of Hardoi District, 1880. William Crooke, The Tribes and Castes of the North-Western Provinces and Oudh, Vol. I, 1896. इंडस्ट्री सण्डीला में बहुत सी बड़ी कंपनियों का निर्माण शहर है इसके लिए यहां सोना शहर प्रसिद्ध है यह बहुत से लोगो को रोजगार देता है। मां शीतला देवी का मन्दिर सण्डीला कस्बे पश्चिम सिरे पर एक विशाल सरोवर के किनारे लगभग 1000 वर्ष पुराना मां शीतला देवी का भव्य मन्दिर है। सिद्ध पीठ रूप में विख्यात यह मन्दिर विगत कई वर्षों से मां की महिमा के कारण क्षेत्र में चर्चित है। यही कारण है कि नवरात्रि के दिनों में आस - पास के जनपदों से भारी मात्रा में श्रद्धालु आते हैं और गदर्भ सवार माँ शीतला के मन्दिर में माथा टेकते हैं। माता सभी की मनोकामना पूर्ण करती है एवं उनकी खाली झोली भर जाती है। इस मन्दिर की ऐतिहासिकता के बारे में बताया जाता है कि जबसे यहां शाण्डिल्य ऋषि ने तपस्या की थी तभी से यहां मां का वास है। ब्रिटिश शासन काल में एक अंगे्रज गर्वनर यहां शिकार खेलने आया था, उसने जंगल के बीच छोटी मठिया में देवी की मूर्ति को देखा और उस मूर्ति पर पूजन सामग्री पुष्प आदि चढ़े दिखाई दिये। यह मूर्ति मां शीतला की थी जो आज भी मौजूद है। इस मूर्ति के अवतरण के बारे में कोई जानकारी नहीं है। मठिया के पास एक छोटा सा तालाब था जो आज विशाल सरोवर (तीर्थ) के रूप में विद्यमान है। माता के दर्शन के बाद उस गर्वनर पर मां का इतना प्रभाव पडा कि उसने जंगल में शिकार करने पर पाबन्दी लगा दी। उन्ही दिनों चिनहट निवासी दो भाई सण्डीला में व्यापार के सिलसिले में आये थे उनको व्यापार में लगातार घाटा हो रहा था इससे वह बेहद परेशान थे। इस परेशानी में दोनों भाई टहलते हुए जंगल की ओर निकल गये, वहां पर स्थापित मूर्ति के दर्शन कर प्रार्थना की यदि उनका व्यापार फला-फूला तो यहां पर वह भव्य मन्दिर बनवायेंगे। माता के आशीर्वाद से दोनों भाई क्रमशः लाल्ता शाह व शीतला प्रसाद शाह ने वहां पर भव्य मन्दिर व सरोवर का निर्माण कराया। अंग्रेज गर्वनर ने भी लाल्ता शाह के नाम पर 18 बीघा जमीन को पट्टा कर दिया। इन भाईयों का व्यापार कलकत्ता से चलता रहा। इसी बीच कलकत्ता के व्यापारी मनमोहन लाल जैन वसूली करने सण्डीला आये। मां शीतला के दर्शन कर वह भी मन्त्र मुग्ध हो गये। उन्होने मन्दिर के नाम 50 हजार रूपये जमा कर दिये। इनके नाम का पत्थर आज भी सरोवर के किनारे लगा हुआ है। सरोवर के उत्तर की ओर गऊ घाट, पश्चिम की ओर जनाना घाट और पूरब व दक्षिण की ओर मर्दाना घाट है। इसके बाद शाह भाइयों ने मन्दिर की देख रेख के लिए एक पुजारी नियुक्ति किया और वसीहत लिख दी कि भविष्य में उनके खानदान के लोग मन्दिर का प्रबन्धन कार्य देखेंगे। शीतला मन्दिर के चारों ओर राम जानकी मन्दिर, ठाकुर जी मन्दिर, हनुमान मन्दिर, शिव जी मन्दिर, के अतिरिक्त लगभग आधा दर्जन मन्दिर बने हुए हैं। कुछ वर्षों पूर्व इस उपेक्षित पड़े मन्दिर को शासन प्रशासन एवं युवाओं ने जीर्णोद्धार करने का प्रण किया और निर्माण कार्य प्रारम्भ करा दिया। परिसर की नई बाउन्ड्रीवाल बनवाई गई। अन्दर से लेकर बाहर तक मर्बल्स लगाये गये एवं समस्त निकासी द्वारा नये बनवाये गये। गहावर देवी का मन्दिर मां गहावर देवी जी के मंदिर का एतिहासिक महत्व है। मां गहावर देवी जी की दुर्लभ मूर्ति करीब 200 वर्ष पहले मांडर कस्बे के उत्तर पश्चिम में एक कुएं की खुदाई में मिली थी। इस सिद्धपीठ के संबंध में प्रचलित है कि इस पवित्र स्थान पर मां का स्मरण करने से उपासक के महापातक कट जाते हैं। करीब दो सौ वर्ष पूर्व मांडर में लोगों को पानी की समस्या थी। गांव के उत्तर-पश्चिम में लाला चंद्रिका प्रसाद का घना जंगल था। जंगल में एक कुआं था, जो बंद पड़ा था। ग्रामीणों ने उस कुएं की खुदाई की। जब कुआं काफी गहराई में खोदा जा रहा था, तब उसमें एक मूर्ति निकली थी। जिसकी लंबाई चार फिट और चौड़ाई तीन फिट थी। मूर्ति में शेर पर सवार माता रानी की मूर्ति थी। ग्रामीणों ने कुएं के पास ही मूर्ति की स्थापना रखी। बाबा रामशरण पाठक ने सारे ग्रामीणों को कुएं के पाए एकत्र किया और बताया कि रात में स्वप्न में मैंने देखा कि मुझसे एक देवी कह रही है कि आप लोग मेरी पूजा अर्चना गहावर देवी नाम से की जाए। तब ग्रामीणों के बुलंद सहयोग से एक मंदिर का निर्माण कराया गया तथा करीब 15 बिस्वा में बाउंड्रीवाल बनाई गई। मंदिर के नाम पर 30 बिस्वा भूमि भी कर दी गई। मंदिर के पुजारी राजेश पाठक बताते हैं कि मूर्ति रंग भी बदलती है। सुबह दूधिया दोपहर में भूरा व रात में काले रंग की दिखती है। मूर्ति देखने में अतुल शोभनीय है। मंदिर के अंदर घुसते ही गेट के पूरब में माता काली, माता शारदा देवी का छोटा मंदिर है। उसी से सटा हुआ एक छोटा शिवलिंग भी है। माता जी के उत्तर में सरस्वती माता जी का एक छोटा मंदिर बना है। इसके ठीक सामने बड़ा सा हनुमान जी का भव्य मंदिर भी बना है। यहां पर एक वर्ष में चार बार मेला लगता है। पहला मेला चैत्र की नवरात्र, दूसरा बैसाख की अष्टमी, तीसरा ज्येष्ठ की अष्टमी को और चौथा क्वार को नवरात्र में लगता है। यहां पर दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। मेले में रामलीला भी होती है। इन्हें भी देखें हरदोई ज़िला अनुज सिंह दिनकर AnuGraphy & InternetCafe सन्दर्भ श्रेणी:हरदोई ज़िला श्रेणी:उत्तर प्रदेश के नगर श्रेणी:हरदोई ज़िले के नगर