411 REFERENCE · Wikipedia
अपौरुषेयतावाद
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
हिन्दू धर्म में वेदों के सन्दर्भ में अपौरुषेयतावाद वह मत है जो मानती है कि वेद 'अपौरुषेय' हैं अर्थात् वेदों को किसी ने नहीं रचा है - न तो मनुष्य ने और न ही किसी दैवी शक्ति ने। वेदों को 'अपौरुषेय शब्द' से भी कहते हैं।
व्याख्या
वेद के के आविर्भाव के विषय में नैयायिकों और तद्भिन दार्शनिकों के, विशेषत: मीमांसकों के, मत में बड़ा पार्थक्य है। न्याय का मत है कि ईश्वर द्वारा रचित होने के कारण वेद 'पौरुषेय' है, परंतु सांख्य, वेदांत और मीमांसा मत में वेद का उन्मेष स्वत: ही होता है; उसके लिए किसी भी व्यक्ति का, यहाँ तक कि सर्वज्ञ ईश्वर का भी प्रयत्न कार्यसाधक नहीं है। पुरुष द्वारा उच्चरितमात्र होने से भी कोई वस्तुपौरुषेय नहीं होती, प्रत्युत् दृष्टि के समान अदृष्ट में भी बुद्धिपूर्वक निर्माण होन पर ही 'पौरुषेयता' आती है (यस्मिझदृष्टेऽपि कृतबुद्धिरुपजाएते तत् पौरुषेयम्---सांख्य सूत्र 5150)।
श्रुति के अनुसार ऋग्वेद आदि 'उस महाभूत के नि:श्वास' हैं। श्वास प्रश्वास तो स्वत: आविर्भूत होते हैं। उनके उत्पादन में पुरुष के कोई बुद्धि नहीं होती। अत: उस महाभूत के नि:श्वास रूप ये वेद अदृष्टवशात् अबुद्धिपूर्वक स्वयं आविर्भूत होते हैं। मीमांसा मत में शब्द नित्य होता है। शब्द अश्रुत होने पर भी लुप्त नहीं होता; क्रमश: विकीर्ण होने पर, बहुत स्थानों में फैल जाने पर, वह लघु और अश्रुत हो जाता हैं, परंतु कथापि लुप्त नहीं होता। 'शब्द करो' कहते ही आकाश में अंतर्हिंत शब्द तालु और जिह्वा के संयोग से आविर्भूत मात्र हो जाता हैं, उत्पन्न नहीं होता (मीमांसा सूत्र 1/1/14)। वेद नित्य शब्द की राशि होने से नित्य हैं, किसी भी प्रकार उत्पाद्य या कार्य नहीं है। तैत्तिरीय, काठक आदि नामों का संबंध भिन्न-भिन्न वैदिक संहिताओं के साथ अवश्य मिलता हैं, परंतु यह आख्या प्रवचन के कारण ही हैं, ग्रंथरचना के कारण नहीं (मी. सू. 1/1/30)। वेदों में स्थान-स्थान पर उपलब्ध बबर प्रावाहणि आदि के समान शब्द किसी व्यक्तिविशेष के वाचक न होकर नित्य पदार्थ के निर्देशक हैं (मी. सू. 1/1/31)। आध्यात्मिक ज्ञान के प्रतिपादक होनेवाले वेदों में लौकिक इतिहास खोजने का प्रयत्न एकदम व्यर्थ हैं। इस प्रकार स्वत: आविर्भूत वेद किसी पुरूष की रचना न होने से 'अपौरूषेय' हैं। इसी सिद्धांत का नाम 'अपौरुषेयतावाद' है।
बाहरी कड़ियाँ
Vedâpauruseyatva An overview of the concept, by Prof. D. Prahladachar, presented with the author's permission. 58855 bytes. (PDF)
श्रेणी:Hindu philosophical concepts
श्रेणी:Sanskrit words and phrases