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ईड़ा
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जून 2015
कई योग शास्त्रों में ईड़ा को तीन प्रमुख नाड़ियों में से एक माना गया है। अन्य दो के नाम हैं - पिंगला और सुषुम्ना।
ईड़ा ऋणात्मक ऊर्जा का वाह करती है। शिव स्वरोदय ईड़ा द्वारा उत्पादित ऊर्जा को चन्द्रमा के सदृश मानता है अतः इसे चन्द्रनाड़ी भी कहा जाता है। इसकी प्रकृति शीतल, विश्रामदायक और चित्त को अंतर्मुखी करनेवाली मानी जाती है। इसका उद्गम मूलाधार चक्र माना जाता है - जो मेरुदण्ड के सबसे नीचे स्थित है।
स्वरयोग के अनुसार जब श्वास का प्रवाह बाईँ नसिका-रंध्र में होता है तो वह मानसिक कार्यों के हेतु मनस शक्ति प्रदान करती है। इसे मांशपेशियों में शिथिलता आती है और शरीर का तापमान कम होता है। यह इस बात का भी संकेत है कि इस अवधि में मन अन्तर्मुखी तथा सृजनात्मक होता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य को थकाने वाले और परिश्रम के कार्य को टालना चाहिए।
श्रेणी:योग