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वीभत्स रस
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वीभत्स रस (अंग्रेजी-Odious, disgust)काव्य में मान्य नव रसों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इसकी स्थिति दु:खात्मक रसों में मानी जाती है।http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/5578/9/0#.VKAcLdAo संग्रहीत प्रति 28 दिसंबर 2014 https://web.archive.org/web/20141228164955/http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/5578/9/0#.VKAcLdAo 28 दिसंबर 2014 live इसके परिणामस्वरूप घृणा, जुगुप्सा उत्पन्न होती है।http://khabar.ibnlive.in.com/image-gallery/Moviemasala/-22682-105592-5.html?ref=hindi.in.com|वीभत्सजुलाई 2020 InternetArchiveBot रस से पैदा होती है घृणा Bhartiya Manovigyan, By Ramnath Sharma & Rachana Sharma page 349 http://www.bharatdarshan.co.nz/magazine/85/hasya-ras.html संग्रहीत प्रति 28 दिसंबर 2014 https://web.archive.org/web/20141229224517/http://www.bharatdarshan.co.nz/magazine/85/hasya-ras.html 29 दिसंबर 2014 dead http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/7588/8/08_chapter%203.pdf संग्रहीत प्रति 28 दिसंबर 2014 https://web.archive.org/web/20141228183530/http://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/7588/8/08_chapter%203.pdf 28 दिसंबर 2014 live इस दृष्टि से करुण, भयानक तथा रौद्र, ये तीन रस इसके सहयोगी या सहचर सिद्ध होते हैं। शान्त रस से भी इसकी निकटता मान्य है, क्योंकि बहुधा बीभत्सता का दर्शन वैराग्य की प्रेरणा देता है और अन्तत: शान्त रस के स्थायी भाव शम का पोषण करता है।
साहित्य रचना में इस रस का प्रयोग बहुत कम ही होता है। तुलसीदास ने रामचरित मानस के लंकाकांड में युद्ध के दृश्यों में कई जगह इस रस का प्रयोग किया है। उदाहरण- मेघनाथ माया के प्रयोग से वानर सेना को डराने के लिए कई वीभत्स कृत्य करने लगता है, जिसका वर्णन करते हुए तुलसीदास जी लिखते है-
'विष्टा पूय रुधिर कच हाडा
बरषइ कबहुं उपल बहु छाडा'
(वह कभी विष्ठा, खून, बाल और हड्डियां बरसाता था और कभी बहुत सारे पत्थर फेंकने लगता था।)
भारत के विभाजन पर लिखे साहित्य में उस समय मची मारकाट के कई वीभत्स दृश्यों का चित्रण सआदत हसन मंटो, खुशवंत सिंह, भीष्म साहनी की रचनाओं में देखा जा सकता है।
बाहरी कड़ियाँ
में वीभत्स रस, राकेश भारतीय, देशबंधु
सन्दर्भ
श्रेणी:कला शैलियाँ
श्रेणी:रस
श्रेणी:हिन्दी साहित्य