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411 समाचार
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बागड़िया

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गुजराती बागड़िया गुजराती बागड़िया भारत गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश हिन्दी, मालवा, गुजराती, राजस्थानी गुजराती बागड़िया भारत के पश्चिमी एवं मध्य भागों में निवास करने वाले चमार समुदाय की एक क्षेत्रीय पहचान के रूप में वर्णित समूह है। इस समुदाय के सदस्य मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के विभिन्न भागों में निवास करते हैं। समुदाय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, नामकरण तथा प्रवासन के संबंध में विभिन्न स्थानीय परंपराएँ और सीमित प्रकाशित विवरण उपलब्ध हैं। Imperial Gazetteer of India 1908 Clarendon Press Oxford 6 210-215 इस विषय पर व्यापक ऐतिहासिक अध्ययन की आवश्यकता मानी जाती है। नामकरण "बागड़िया" उपनाम का संबंध सामान्यतः ऐतिहासिक वागड़ (बागड़) क्षेत्र से जोड़ा जाता है। वागड़ वर्तमान दक्षिणी राजस्थान तथा उससे सटे गुजरात और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती भूभाग का एक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र रहा है। इस क्षेत्र से संबद्ध कुछ परिवारों द्वारा समय के साथ एवं यहां से स्थान परिवर्तन करने वाले को "बागड़िया" उपनाम अपनाया जाने लगा। "गुजराती" विशेषण का प्रयोग उन परिवारों अथवा शाखाओं के संदर्भ में किया जाता है जिनका ऐतिहासिक अथवा क्षेत्रीय संबंध गुजरात से माना जाता है। Briggs George W. The Chamars 1920 Association Press Calcutta 21-22 इतिहास समुदाय के इतिहास के संबंध में विभिन्न स्थानीय परंपराएँ, पारिवारिक वंशावलियाँ तथा मौखिक विवरण प्रचलित हैं। उपलब्ध प्रकाशित स्रोत समुदाय के इतिहास का सीमित उल्लेख करते हैं। परिणामस्वरूप समुदाय की उत्पत्ति, प्रवासन तथा सामाजिक विकास के अनेक पक्षों पर अभी भी विस्तृत शोध अपेक्षित है। भौगोलिक वितरण समुदाय के सदस्य मुख्यतः गुजरात, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में निवास करते हैं। समय के साथ शिक्षा, रोजगार, व्यापार तथा अन्य सामाजिक-आर्थिक कारणों से समुदाय के अनेक परिवार भारत के अन्य राज्यों में भी जाकर बसे हैं। भाषा और क्षेत्रीय पहचान समुदाय के सदस्य वागड़ क्षेत्र और वागड़ी भाषा की क्षेत्रीय पहचान को व्यक्त करने हेतु क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार वागड़, हिन्दी, गुजराती, राजस्थानी तथा अन्य स्थानीय बोलियों का प्रयोग करते हैं। वागड़ ना वासी अमां, वागड़ में वाते करूँ वागड़ी में लाख वसँ, वागड़ी में गान है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन समुदाय का सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन स्थानीय परंपराओं, पारिवारिक मूल्यों तथा धार्मिक आस्थाओं से प्रभावित है। विवाह-संस्कार, धार्मिक अनुष्ठान, पारिवारिक रीति-रिवाज तथा सामुदायिक आयोजन विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय परंपराओं के अनुरूप संपन्न होते हैं। साथ ही शिल्प और कला का जुड़ाव रहा है। सामाजिक-आर्थिक स्थिति और संगठन प्रशासनिक रूप से यह समूह संबंधित राज्यों जैसे मध्य प्रदेश की अनुसूचित जाति (SC) सूची के अंतर्गत चमार समुदाय की क्षेत्रीय उप-शाखा के रूप में समाहित है। आधुनिक काल में समुदाय के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक उत्थान के लिए विभिन्न क्षेत्रीय संगठन और सुधार समितियाँ सक्रिय हैं, जो युवाओं में शिक्षा के प्रसार और सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के लिए कार्य कर रही हैं। The Constitution (Scheduled Castes) Order, 1950 https://socialjustice.gov.in/ Ministry of Law and Justice, Government of India 2026 अनुसंधान गुजराती बागड़िया समुदाय के इतिहास, सामाजिक संरचना तथा सांस्कृतिक परंपराओं पर उपलब्ध स्वतंत्र अकादमिक साहित्य सीमित है। इस विषय के संबंध में अभिलेखीय दस्तावेज़ों, सरकारी अभिलेखों, नृवंशविज्ञान तथा इतिहास पर आधारित भविष्य के अनुसंधान से अधिक स्पष्ट जानकारी प्राप्त हो सकती है। टॉड, जेम्स (1829). Annals and Antiquities of Rajasthan. लंदन: स्मिथ, एल्डर एंड कंपनी. पृ. [पृष्ठ संख्या]. ओझा, गौरीशंकर हीराचंद (1936). डूंगरपुर राज्य का इतिहास. वैदिक यंत्रालय. ऐतिहासिक स्थान इतिहास, प्राचीन शिलालेखों और प्रांतीय गजेटियर के अनुसार, पश्चिमी और मध्य भारत के कई भौगोलिक स्थान नामों की सूची निम्नलिखित है: अनल कुंड / अग्नि कुंड: यह प्राचीन स्थल वर्तमान में राजस्थान और गुजरात की सीमा पर स्थित प्रसिद्ध पर्वतीय क्षेत्र माउंट आबू (Arbudaanchal / Mount Abu) के नाम से जाना जाता है। शामर कुंड / दामोदर कुंड: यह ऐतिहासिक एवं पवित्र कुंड गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित गिरनार (जूनागढ़) के समीप स्थित है।गौरीशंकर हीराचंद ओझा (1936). वैदिक यंत्रालय. पृ. 45-48. खेडा (खेड़ा जिला): प्राचीन 'खेटक खेडा' के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र वर्तमान गुजरात राज्य का प्रसिद्ध खेड़ा जिला (Kheda District) है। जीर्णदुर्ग / चंद्रकेतुपुर: यह ऐतिहासिक सौराष्ट्र क्षेत्र का प्रमुख प्राचीन दुर्ग और नगर है, जिसे वर्तमान में जूनागढ़ (Junagadh) के नाम से पहचाना जाता है। कर्णावती: चालुक्य राजा कर्णदेव द्वारा साबरमती नदी के तट पर स्थापित इस प्राचीन नगरी को उत्तर-मध्यकाल में अहमदाबाद (Ahmedabad) नाम दिया गया। दधिपद्र: चालुक्य नरेश सिद्धराज जयसिंहदेव के ऐतिहासिक 'देहद (दधिपद्र) शिलालेख' (विक्रम संवत् 1196) के पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार, पूर्वी गुजरात के इस प्रशासनिक क्षेत्र का प्राचीन नाम 'दधिपद्र' था, जिसे वर्तमान में दाहोद और गोधरा (Dahod / Godhra) कहा जाता है।सिद्धराज जयसिंहदेव का दाहोद (दधिपद्र) शिलालेख, विक्रम संवत् 1196–1202, छाबुआ संदर्भ। रत्नपुरी: मालवा क्षेत्र (मध्य प्रदेश) का यह ऐतिहासिक नगर वर्तमान में रतलाम (Ratlam) शहर के नाम से प्रसिद्ध है।रतलाम राज्य का इतिहास, मालवा गजेटियर (ऐतिहासिक समीक्षा), संपादन संसकरण। कृष्णगढ़: अजमेर और मालवा की ऐतिहासिक सीमा पर स्थित इस क्षेत्र को वर्तमान में किशनगढ़ क्षेत्र (Kishangarh Region) के नाम से जाना जाता है। जीर्ण खेटक (पुरानी गढ़ी): यह प्राचीन उजड़ा हुआ एक ऐतिहासिक गाँव और पुरानी गढ़ी का क्षेत्र है, जिसे स्थानीय स्तर पर जुनाखेड़ा (Junakheda) कहा जाता है।मालवा क्षेत्र के स्थानीय ऐतिहासिक अभिलेख एवं ग्राम्य वंशावली सूची। थंदोड़ा/अड़ई थड़ोदा: मालवा क्षेत्र के रतलाम और सैलाना के मध्य स्थित स्थान को वर्तमान में थंदोड़ा गाँव (Thandada Village) के नाम से जाना जाता है।रतलाम जिला गजेटियर, मध्य प्रदेश शासन, स्थानीय ग्राम्य भौगोलिक अनुभाग। जैथल: (Jaithal) क्षेत्र के अंतर्गत । इन्हें भी देखें वागड़ डूंगरपुर राज्य गुजरात राजस्थान मध्य प्रदेश अनुसूचित जाति वागडी भाषा नृवंशविज्ञान संदर्भ Anthropological Survey of India — People of India Imperial Gazetteer of India श्रेणी:भारत की जातियाँ