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पुरुषोत्तमदेव (वैयाकरण)
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पुरुषोत्तमदेव बहुत बड़े वैयाकरण थे। इनको 'देव' नाम से भी पुकारा गया है। ये बंगाल के निवासी और बौद्ध धर्मावलंबी थे। बौद्धों और वैदिकों की अनबन पुरानी है। इन वातावरण के प्रभाव में पुरुषोत्तमदेव ने अष्टाध्यायी के सूत्रों में से वैदिक सूत्रों को अलग करके शेष सूत्रों पर भाष्य लिखा। इस भाष्य का नाम 'भाषावृत्ति' है।
इस ग्रंथ का बहुत बड़ा महत्त्व है। देव के समय में उपलब्ध होने वाले प्रामाणिक ग्रंथों का उल्लेख भाषावृत्ति में पाया जाता है। वे ग्रंथ अब लुप्त हो गए हैं। भाषावृत्ति का प्रमाण उत्तरवर्ती वैयाकरणों ने स्वीकार किया है। बंगाल के निवासी सृष्टिधर थे। उन्होंने भाषावृत्ति की (भाषावृत्यर्थवृत्ति) टीका की है। इसमें २३ वैयाकरण उद्धृत हैं। भाषावृत्ति के निर्माण का कारण भी लिखा है। तदनुसार राजा लक्ष्मण सेन जी की प्रेरणा से बंगाल के निवासी श्री पुरुषोत्तमदेव ने भाषावृत्ति का निर्माण किया था। अतएव राजा लक्ष्मण सेन का बौद्ध होना और पुरुषोत्तमदेव का उनके आश्रित होना प्रतीत होता है। पुरुषोत्तमदेव ने जैनधर्म को भी सादर स्मरण किया है।
राजा लक्ष्मण सेन सं. ११७४ के लगभग विद्यमान थे। इस काल सामग्री से पुरुषोत्तमदेव को १२वीं तथा १३वीं शताब्दी के मध्य होना चाहिए। बंग विहार के वैयाकरणों ने देव को बड़े संमान के साथ उद्धृत किया है। अन्यान्य वैयाकरणों तथा कोशटीकाकारों ने भी देव की प्रामाणिकता को स्वीकार किया है। शरणदेव अपने समय के बहुत बड़े ख्यातनामा वैयाकरण थे। उन्होंने सं. १२२९ में अपनी 'दुर्घटवृत्ति' में पुरुषोत्तमदेव के ग्रंथों का बार बार हवाला दिया है। अमरटीकासर्वस्वकार (सर्वानंद, सं. १२१५) ने भी देव के ग्रंथों का प्रमाण बड़े विश्वास के साथ उपस्थित किया है। इससे देव की बहुत बड़ी लोकप्रियता का पता लगता है।
देव के नाम पर प्राप्त रचनाएँ ये हैं :
भाषावृत्ति, महाभाष्यलघुवृत्ति, करककारिका, दुर्घटवृत्ति, परिभाषावृत्ति (ललितावृत्ति), ज्ञापकसमुच्चय, उणदिवृत्ति, त्रिकांडशेष, अमरकोश परिशिष्ट, हारावली कोश, वर्णदेशना, गणवृत्ति, द्विरूपकोश, अक्षरकोश, दशवालकारिका, विष्णुभक्ति कल्पलता।
सन्दर्भ
श्रेणी:वैयाकरण
श्रेणी:संस्कृत