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डूंगर सिंह
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मई 2017
'ठाकुर डूंगर सिंह शेखावतभारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे।
परिचय
डूंगजी व जवाहरजी चाचा भतीजा थे।
डूंगजी पाटोदा के डुँगजी व जवाहरजी शेखावाटी ब्रिगेड में रिसालदार थे, शेखावाटी ब्रिगेड की स्थापना का उदेश्य शेखावाटी में शांति स्थापना के नाम पर शेखावाटी में पनप रहे ब्रिटिश सत्ता विरोधी विद्रोह को कुचल कर शेखावाटी के शासन में हस्तक्षेप करना था । वि॰सं॰1891 में सीकर के राव राजा रामप्रताप सिंह जी व उनके भाई भैरव सिंह के बीच अनबन चल रही थी, इस विग्रह के सहारे अंग्रेज सत्ता सीकर में अपने हाथ पैर फेलाने में लग गयी शेखावाटी की तत्कालीन परिस्थियों को भांपते ठाकुर डूंगर सिंह जी ने अपने कुछ साथियों सहित शेखावाटी ब्रिगेड से हथियार, उंट, घोड़े लेकर विद्रोह कर दिया और अंग्रेज शासित प्रदेशों में लूटपाट आतंक फेला दिया, इनके साथ अन्य विद्रोहियों के मिल जाने से अंग्रेज सत्ता आतंकित हो इन्हे पकड़ने के लिए उतेजित हो गयी शेखावाटी ब्रिगेड के साथ ही सीकर, जयपुर, बीकानेर, जोधपुर की सेनाएं इनके खिलाफ सक्रिय हो गयी। वि॰सं॰1895 में झदवासा गावं के भैरव सिंह गौड़ जो इनका निकट संम्बन्धी था को अंग्रेजो ने आतंक व लोभ दिखा कर डूंगजी को पकड़वाने हेतु सहमत कर लिया, भैरवजी ने छल पूर्वक डूंगर सिंह को अंग्रेजों के हाथों पकड़वा दिया और अंग्रेजों ने डूंगजी को आगरा के लालकिले की जेल में बंद कर दिया इस छलाघात से डूंगजी के साथियों में भयंकर रोष भड़क उठा और आगरा के किले पर आक्रमण की योजना बना ली गयी। योजनानुसार लोठू निठारवाल व सावंता मीणा ने आगरा जाकर साधू के बेश में गुप्त रूप से किले अन्तः बाह्य जानकारी हासिल की।
वे भारतमाता कालेज की बंदर सेना के आराध्य देव है।
इन्होंने भारतमाता कालेज की बंदर सेना को राकेशासुर नामक दैत्य से बचाया था ।
आगरा की कैद से डूंगरसिंह को छुड़वाना
वि॰सं॰ 1903 /1846 में ठाकुर जवाहर सिंह के नेतृत्व में बारात का बहाना बना कर कोई चार पांच सों वीर योधावों ने आगरा प्रस्थान किया। लोटिया जाट, सावंत मीणा को आगरा जेल की जानकारी लेने के लिए आगरा भेजा गया था। सारी जानकारी इकट्ठा करने के बाद जवाहर सिंह, ठाकुर भक्तवर सिंह, ठाकुर खुमान सिंह लोदसर, कान सिंह, उजीन सिंह, जोर सिंह खरिया, हुकुम सिंह सिंगरावत, लोटिया जाट, सावंत मीणा और कुछ अन्य बिदावत और लद्दाखी ठाकुरों को कुछ 200-300 सैनिकों के साथ बनाया गया. वे दूल्हे के मामा की मौत के बहाने 15 दिन तक आगरा जेल के पास रहे। अंतिम दिन मुहर्रम के अवसर पर उन्होंने जेल पर हमला किया और डूंगर सिंह और अन्य कैदियों को मुक्त कर दिया। इस हमले में भक्तवर सिंह श्यामगढ़, उजीन सिंह मीनागना और महदू चारण की जान चली गई।स्वतंत्रता सेनानी डूंगजी जवाहरजी (1972) सौभाग्य सिंह शेखावत Deputy Director (Retd), Rajasthan Shodh Sansthan, Chopasani, Jodhpur
Ex-Chairman, Rajasthani Bhasha Sahitya Evam Sanskriti Academy, Bikaner इस साहसिक कार्य से अंग्रेज सत्ता स्तब्ध रह बौखला गयी और इन वीरों को पकड़ हेतु राजस्थान के राजाओं को सक्त आदेश भेज दिए।
अंग्रेजों की राजस्थान में नसीराबाद छावनी को लूटना
आगरा किले की विजय के कुछ दिन बाद रामगढ के सेठ अनंतराम घुरामल पोधार से 15000 रूपए की सहायता प्राप्त कर ऊंट घोड़े व शस्त्र खरीदकर राजस्थान के मध्य नसीराबाद की सैनिक छावनी पर आक्रमण कर लुट लिया व अंग्रेज सेना के तम्बू व समान जला दिए, व लुट के 27000 रुपये शाहपुरा राज्य के प्रसिद्ध देवी मंदिर धनोप में चडा दिया, इस घटना के बाद विचलित होकर कर्नल जे. सदर्लेंड ने कपतान शां, डिक्सन मेजर फार्स्तर के नेत्रत्व में अंग्रेज सेना व बीकानेर की सेना हरनाथ सिंह व जोधपुर की सेना मेहता विजय सिंह व ओनाड़ सिंह के नेत्रत्व में डूंगर सिंह को पकड़ने भेजी गयी घद्सीसर गावं में दौनों पक्षों के घमासान युद्ध हुआ जिसमे स्वतंत्रता प्रेमी योधा शासकिये सेना के घेरे में फंस गए, ठाकुर हरनाथ सिंह व कपतान शां के विश्वास, आग्रह और नम्र व्यहार से आशवस्त हो जवाहर सिंह ने आत्मसमर्पण कर दिया, बाद में बीकानेर के राजा रतन सिंह जी जवाहर सिंह जी को अंग्रेजों से छुड़वाकर ससम्मान बीकानेर ले आये।
जोधपुर रियासत के आगे आत्म-समर्पण
ठाकुर डूंगर सिंह घड़सीसर के सैनिक घेरे से निकल कर जैसलमेर की ओर चले गए लेकिन शासकीय सेनाओं ने जैसलमेर के गिरदादे गावं के पास मेडी में फिर जा घेरा दिन भर की लड़ाई के बाद ठाकुर प्रेम सिंह व निम्बी ठाकुर आदि के कठिन प्रयास से मरण का संकल्प त्याग कर डूंगर सिंह ने आत्मसमर्पण कर दिया, डूंगर सिंह को जोधपुर के किले में ताजिमी सरदारों की भांति नजर कैद की सजा मिली और उसी अवस्था में उनका देहांत हो गया इस प्रकार राजस्थान में भारतीय स्वतंत्रता का सशस्त्र आन्दोलन वि॰सं॰ 1904 में ही समाप्त हो गया लेकिन मातृ-भूमि की रक्षार्थ लड़ने वालों की कभी मृत्यु नहीं होती उनका नाम हमेशा आदर से लिया जाता है
मरे नहीं भड़ मारका, धरती बेडी धार गायिजे जस गित्डा, जग में डुंग जवार
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