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नवजागरण और अनुवाद
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यूरोपीय पुनर्जागरण का दार्शनिक वैज्ञानिक और गणितीय आधार 8 से 12वीं शताब्दी के अरबी अनुवाद आंदोलन से निर्मित हुआ |काहिरा दमिश्क के विद्वानों ने प्लेटो अरस्तू के ग्रंथों, चिकित्सा, बीजगणित ,रसायन ,खगोल और दर्शन के ग्रंथों का अरबी में अनुवाद किया| अंकगणित और दर्शन के ग्रंथों के बारे में कहां जाता है कि "770 ई में भारत से एक हिंदू गणित और ज्योतिष का एक-एक ग्रंथ लेकर बगदाद पहुंचा |ज्योतिष की वह वह पुस्तक सिद्धांतों की थी जिसका इब्राहिम अल फ़जरी ने तत्काल अरबी अनुवाद अल - सिंद - हिंद प्रस्तुत कर दिया |इस अनूदित ग्रंथ ने अब ज्योतिष के अध्ययन में विप्लव उपस्थित कर दिया उसी में पहले पहल भारतीय अंकों का उल्लेख हुआ यह अंक माला अल ख्वारिज्मी के ग्रंथों द्वारा पश्चिमी जगत यूरोप के देशों में प्रचलित हुई |"विश्व साहित्य के रूपरेखा उपाध्याय भगवतशरण राजपाल एंड संस 1957
इसके पश्चात 11-12वीं शताब्दी में टोलेडो व सिसली में इन अरबी ग्रंथों का विशाल लैटिन अनुवाद आंदोलन चला जिसने यूरोप को सैकड़ो वर्षों का वैज्ञानिक साहित्य प्रदान किया| "विभिन्न अनुवादकों का एक समूह टोलेडो में केंद्रित हो हो और मुख्यत: चर्च के संरक्षण में काम करते हुए खगोल विज्ञान और गणित के ग्रंथों का अनुवाद किया टोलेडो ,ईसाई और सारसेन विद्वानों के बीच बात-चीत के लिए एक आदर्श स्थान था और वहां अरबी - लैटिन विज्ञान के उदय के लिए एक नियमित विद्यालय का उदय हुआ|"The history of translation (translation in the scientific Renaissance of the middle) Charron Susan School of translation and interpretation University of ottawa 2003
12वीं शताब्दी में अरबी विज्ञान और दर्शन में एक प्रमुख योगदान देने वाले बाथ के. एलेयर्ड थे, जो एक लेखक और अनुवादक थे, जिनकी गणित और खगोल विज्ञान में गहरी पहुंच थी| इन्होंने अल - ख्वारिज्मी की महत्वपूर्ण खगोलीय तालिकाओं का अरबी से लैटिन में अनुवाद किया| एलेयर्ड ने यूक्लिड के एलिमेंट्स के अरबी पाठों का भी अनुवाद पुनर्जागरण को जन्म दिया| "टोलेडो स्कूल ऑफ ट्रांसलेटर्स के सदस्यों द्वारा की गई अनुवाद गतिविधियों का प्रभाव इतना गहरा और प्रभावशाली था कि उन्होंने यूरोप में एक ज्ञानोदय आंदोलन में प्रवेश किया जिसने यूरोप को पुनर्जागरण और सुधार की ओर अग्रसर किया"Aydin Baris can 2034 Toledo School of translation and its importance in the history of translation in the west Abant journal of translation and interpretation studies 2(2)
यूरोप में पुनर्जागरण का वास्तविक प्रारंभ इटली से हुआ, विशेष रूप से फ्लोरेंस, वेनिस और रोम में| दाते , लियोनार्दो और राफेल जैसे विचारकों और कलाकारों ने क्लासिक आदर्श को प्रस्तुत कर इटली को पुनर्जागरण का केंद्र बनाया| "यूक्लिड के लैटिन अनुवाद भी सिसली स्कूल से जुड़ें हैं| ये अनुवाद 12- 13 वीं शताब्दी के आरंभिक काल के हैं, और सीधे ग्रीक भाषा से किए गए हैं जिससे ये विचार पुष्ट होता है कि सिसली ग्रीक ,लैटिन अनुवाद के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र था"
इटली के एक शहर फ्लोरेंस में 15 वीं शताब्दी के मध्य में प्लेटोनिक ने दार्शनिक और धार्मिक कृतियों का अनुवाद करना शुरू किया, जिसमें पुनर्जागरण कलाकारों और साहित्यिक विद्वानों को प्रेरणा मिली| मर्सिलियो फिजिनो पुनर्जागरण काल के अकादमी के पहले विद्वानों में से एक थे| फिजीनो ने प्लेटो की संपूर्ण कृतियों का लैटिन में अनुवाद किया| थॉमस मेलोरी प्लोटेनिक अकादमी के एक अन्य उल्लेखनीय सदस्य थे उन्होंने राजा ऑथर की कहानियों का अनुवाद किया था| "16 वीं शताब्दी में अनुवाद के एक अंग्रेजी विद्वान विलियम टिंडेल ने अनुवाद आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई| उन्होंने न्यू टेस्टामेंट का ट्यूटर अनुवाद तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई| बिना लाइसेंस या अनुमति के धर्म ग्रंथ का उनका अनुवाद उनकी कमियों का कारण बना|" पुनर्जागरण काल में अनुवाद का इतिहास Renaissance Translations LTD https://renaissance-translations.com/the-history-of-translation-in-the-renaissance-period/ 11/04/2026 इस प्रकार हम देखते हैं कि इटली में अनुवाद ने कला, साहित्य, नाटक और दर्शन में नवीनता लाने का मार्ग खोला| "इटली वह भूमिका बनी जहां अनूदित ज्ञान ने पुनर्जागरण को प्रत्यक्ष रूप में जन्म दिया|"
जर्मनी में पुनर्जागरण का केन्द्रीय स्वरूप धार्मिक ,भाषिक और शैक्षणिक था| मार्टिन लूथर के नेतृत्व में धर्म सुधार आंदोलन ने यूरोपीय बौद्धिकता को नई दिशा दी| लूथर ने 1522 में बाइबिल का जर्मन अनुवाद किया| यह केवल धार्मिक कार्य नहीं था ,बल्कि आधुनिक जर्मन भाषा के निर्माण का क्षण था| "जर्मन बाइबिल,1522 में मार्टिन लूथर के अनुवाद का उपयोग करके अनुवाद के विद्वानों द्वारा रचित पहली भाषा थी| यह उस समय असाधारण था, क्योंकि मार्टिन लूथर ने अपने बाइबिल रूपांतरण, जिसे लूथर बाइबिल के नाम से जाना जाता है, में केवल बोलचाल की जर्मन भाषा का ही उपयोग किया है" गुटेनबर्ग की मुद्रण कला ने ज्ञान वितरण को तीव्र किया| वैज्ञानिक और दार्शनिक ग्रंथों के जर्मन अनुवाद ने जनता में तर्किक चेतना का प्रसार किया| जर्मनी का पुनर्जागरण अनुवाद , मुद्रण, धार्मिक सुधार के संयुक्त प्रभाव से बना है|
फ्रांसिसी पुनर्जागरण मुख्यत: साहित्यिक आंदोलन के रूप में प्रकट हुआ| प्लेयर्ड काव्य समूह ने फ्रांस में काव्यभाषा , छंद और काव्य सौंदर्य के नए मानक स्थापित किए| होरेस, ओविड, पिंटार और होमर जैसे कवियों ने लैटिन यूनानी ग्रंथों का फ्रांसिसी अनुवाद किया | अनूदित काव्य शास्त्र ने फ्रांस को विश्व स्तरीय लिरिक, नाट्य और दार्शनिक साहित्य दिया | फ्रांसिसी पुनर्जागरण साहित्यिक नवोन्मेष और अनूदित क्लासिकी चेतना का परिणाम था|
स्पेन में पुनर्जागरण विशेष सांस्कृतिक और राजनीतिक परिस्थितियों में विकसित हुआ, क्योंकि वहां ईसाई , मूर और यहूदी सभ्यताओं का समन्वय था| स्पेन के पुनर्जागरण में आधुनिक यूरोपीय नाट्य और उपन्यास परंपरा को आधार दिया| स्पेन का पुनर्जागरण अनुवाद के द्वारा निर्मित बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक ज्ञान संगम का परिणाम था|
अरब की अनुवाद परंपरा से आरंभ होकर इटली के मानवतावाद , जर्मनी के धार्मिक सुधार , फ्रांस की साहित्यिक क्रांति और स्पेन की राष्ट्रीय नाट्य परंपरा तक पुनर्जागरण एक बहुआयामी सांस्कृतिक घटना थी| प्रत्येक देश की भिन्न परिस्थितियों के बावजूद एक तत्व सार्वत्रिक रूप से विद्यमान था, वह था अनुवाद| अनुवाद ने न केवल ज्ञान का संचार किया , बल्कि नए चिंतन ,नई भाषा चेतना और नई साहित्यिक शैलियों के विकास को जन्म दिया| अतः कहा जा सकता है कि पुनर्जागरण केवल एक ऐतिहासिक युग नहीं, बल्कि अनुवाद का महाकाव्य है|
भारतीय सन्दर्भ में
19 वीं सदी के नवजागरण में भारतीय जीवन दर्शन निवृत्तिवाद दृष्टि से प्रवृत्ति वाद दृष्टि में परिवर्तित होने लगा था| प्राचीन धर्म, ज्ञान, विज्ञान,सामाजिक रीति रिवाजों पर आंख मूंद कर भरोसा करने के बजाय तर्क के निष्कर्ष पर कसकर उसका सूक्ष्म वैज्ञानिक आंकलन किया जाने लगा | इसी परिस्थिति में उस नवीन विचारधारा का जन्म हुआ जिसे राष्ट्रीयता का नाम दिया गया| आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी कहते हैं- " यूरोप में जन्मी हुई विचारधारा ने धीरे- धीरे भारत के विचारशील लोगों को भी प्रभावित करना शुरू किया| राष्ट्रीयता भारतवर्ष के लिए नवीन विश्वास थी, इसके पहले इस देश में यह बात अपरिचित थी| इसके पहले इस देश में यह बात अपरिचित थी| राष्ट्रीयता का अर्थ है कि प्रत्येक राष्ट्र का अंश है और इस राष्ट्र की सेवा के लिए इसको धन धान्य से समृद्ध बनाने के लिए इसके प्रत्येक नगरिक को सुखी और संपन्न बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को सब प्रकार से त्याग और कष्ट स्वीकार करने चाहिए |"हिन्दी साहित्य : उद्भव और विकास द्विवेदी हजारी प्रसाद राजकमल प्रकाशन 1952 नई दिल्ली
नवजागरण के कारण जीवन के कई क्षेत्रों में परिवर्तन की ललक दिखाई देने लगी थी| पुरानी बेड़ियों से मुक्ति की छटपटाहट,नई चेतना की स्पंदन ,नया जोश और नई उमंग दिखाई पड़ती है| एक ओर ऊंच नीच , ब्राह्मणवाद और छुआछूत जैसी व्यवस्था को बदलने का साहस दिखाया पड़ता है, तो दूसरी तरफ सामंत विरोधी और साम्राज्यवाद विरोधी विचारधारा का उद्भव होता है| सामाजिक कुरीतियों तथा प्रथाओं के खिलाफ नवजागरण का बिगुल बजाया जाता है| सामाजिक और साहित्यिक दोनों स्तर पर परिवर्तन पर परिवर्तन दिखाई देता है| शंभु नाथ के अनुसार " भारत में सामाजिक क्रांति की लहरें एक औपनिवेशिक माहौल में आई थी| प्राय: समूची पृथ्वी पर यूरोपीय शक्तियां और उनकी सभ्यता छा रही थी निश्चित ही जिन गैर यूरोपीय समाजों में पहले से उच्च परंपराएं मौजूद थीं और भारत एक ऐसा ही देश था| वहां आक्रामक यूरोपीय शक्तियां और उनकी सभ्यता से दरअसल बहुस्तरीय रिश्ता बना है| यह रिश्ता संपर्क में आने से भारतीय साहित्य में एक नई विचारधारा का सूत्रपात हुआ|"सामाजिक क्रांति के दस्तावेज़ नाथ शंभु वाणी प्रकाशन 2004