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उवसग्गहरम् स्तोत्र
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मार्च 2026
उवसग्गहरम् स्तोत्र २३वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ की स्तुति के लिये पढ़ा जाने वाला स्तोत्र है। इसकी रचना भद्रबाहु ने की थी जिनका जीवनकाल ईसापूर्व चौथी-तीसरी शताब्दी के आसपास था।Kothary 2015 88 इसकी भाषा प्राकृत है।
इस स्तोत्र का पाठ श्वेतांबर संप्रदाय के अनुयायी करते हैं। यह श्वेताम्बर सम्प्रदाय के मूर्तिपुजक उप-संप्रदाय के '''नवस्मरण''' में से एक है।https://books.google.com/books?id=2XfXAAAAMAAJ&q=%22uvasaggaharam+stotra%22+-wikipedia Nava Smaraṇa: Nine Sacred Recitations of Jainism Kapāsī Vinoda 2007 Hindi Granth Karyalay 978-81-88769-05-6 en
पाठ
उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्मघण-मुक्कं ।
विसहर-विस-निन्नासं मंगल-कल्लाण-आवासं ॥
विसहर-फुल्लिंग-मंतं कंठे धारेइ जो सया मणुओ ।
तस्स गह-रोग-मारी, दुट्ठ-जरा जंति उवसामं ॥
चिट्ठउ दूरे मंतो, तुज्झ पणामो वि बहुफलो होइ ।
नर तिरिएसु वि जीवा, पावंति न दुक्ख-दोगच्चं ॥
तुह सम्मत्ते लद्धे चिंतामणि कप्प-पायव-ब्भहिए ।
पावंति अविग्घेणं जीवा अयरामरं ठाणं ॥
इह संथुओ महायस भत्ति-भर-निब्भरेण हिअएण ।
ता देव! दिज्ज बोहिं, भवे भवे पास जिणचंद ॥
किंवदंति
किंवदंति है कि भद्रबाहु ने इस स्तोत्र की रचना करके इसका पाठ किया जिससे उस समय व्याप्त प्लेग का प्रकोप शान्त हो गया। इसमें 5 छंद हैं। किंवदंति के अनुसार, इसमें 22 छंद थे और इसका पाठ अर्ध-देवताओं और अर्ध-देवी का आवाहन करता था। बाद में 17 छंद कम कर दिए गए।
सन्दर्भ