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श्री हरिराय जी
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गोस्वामी श्री हरिरायजी (संवत १६४७ – १७७२) (सन १५९१-१७१६) सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के पुष्टिमार्ग आचार्य, विद्वान, धर्मोपदेशक, अनेक ग्रंथों के रचयिता और संस्कृत, प्राकृत, गुजराती तथा ब्रजभाषा के साहित्यकार थे। श्रीहरिरायजी का जीवन चरित्र - ‘प्रगटे पुष्टिमहारस देन’, श्रीवल्लभ स्मृति ग्रंथमाला, पुष्प ९, श्रीवल्लभ-ग्रन्थ-प्रकाशन कार्यालय, सूरत, १९८५ श्री हरिरायजी - <https://pushtimarg.net/personalities/shri-hariraiji https://web.archive.org/web/20191002130656/http://pushtimarg.net/personalities/shri-hariraiji/ 2 अक्तूबर 2019 > वे महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी) के द्वितीय पुत्र गोस्वामी गोविन्दराय जी के पौत्र और गोस्वामी कल्याणराय जी तथा श्रीमती यमुना बहूजी के पुत्र थे। उनका जन्म आश्विन (गुर्जर कलेंडर के अनुसार भाद्रपद) कृष्ण पंचमी, विक्रम संवत १६४७ (तदनुसार सन १५९१) को गोकुल में हुआ था। श्रीहरिरायजी महाप्रभुजी का जीवन चरित्र - ‘प्रगटे पुष्टिमहारस देन’, श्रीवल्लभ स्मृति ग्रंथमाला, पुष्प ९, श्रीवल्लभ-ग्रन्थ-प्रकाशन कार्यालय, सूरत, १९८५
अपने जीवनकाल में वे श्री वल्लभाचार्य जी की ही तरह दैवी जीवों के उद्धार और भगवत रसानुभूति में निरंतर लगे रहते थे, अतः वल्लभ सम्प्रदाय में आपको “श्री हरिराय जी महाप्रभु” श्री हरिरायजी की बधाई, पुष्टिमार्गीय कीर्तन संग्रह, भाग २, प्रकाशक कृष्णार्पण ट्रस्ट, मुम्बई, १९९५, पेज २३२. कह कर वैसा ही गरिमामय सम्मान दिया जाता है। गुसाईं जी श्री विट्ठलनाथ जी की तरह उनकी भगवत् सेवा भावना व संगठन क्षमता होने के कारण उन्हें “प्रभुचरण” के नाम से भी संबोधित किया जाता है।“पुष्टिमार्ग : पुष्टिमार्ग के कतिपय महान् आचार्य”<https://www.nathdwaratemple.org/pushtimarg/the-great-aacharya-of-pushtimarg https://web.archive.org/web/20191228112003/https://www.nathdwaratemple.org/pushtimarg/the-great-aacharya-of-pushtimarg 28 दिसंबर 2019 >
एक पूज्य धर्माचार्य और उत्कृष्ट विद्वान होने के उपरांत भी श्री हरिराय जी अत्यंत सरल हृदय के व्यक्ति थे तथा उच्च कोटि का दैन्य भाव और पतितों के प्रति करुणा भाव रखते थे। वैष्णवों के प्रति उनके स्नेह, विनयशीलता और दैन्य भाव की पराकाष्ठा तो उनके इस पद में स्पष्ट रूप से व्यक्त होती है – “हों वारौं इन वल्लभीयन पर, मेरे तन को करौं बिछौना, शीश धरौं इनके चरणनतर”।“पुष्टिमार्ग : पुष्टिमार्ग के कतिपय महान् आचार्य” - <https://www.nathdwaratemple.org/pushtimarg/the-great-aacharya-of-pushtimarg https://web.archive.org/web/20191228112003/https://www.nathdwaratemple.org/pushtimarg/the-great-aacharya-of-pushtimarg 28 दिसंबर 2019 >
श्री हरिराय जी का अधिकांश जीवन गोकुल में ही बीता जहाँ वे सं. १७२६ तक रहे। सं. १७२६ में तत्कालीन मुग़ल शासक औरंगज़ेब की अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णुता की नीतियों के कारण पुष्टि संप्रदाय के सेव्य स्वरूप श्रीनाथजी को जतीपुरा और गोकुल से नाथद्वारा में स्थानांतरित किया गया। उन्हीं के साथ तब हरिरायजी भी नाथद्वारा चले गए। हरिराय – “श्रीनाथ जी की प्राकट्य वार्ता”, विद्याविभाग, मंदिर मंडल, नाथद्वारा, विक्रम संवत २०५३.
श्रीकृष्ण के चरणों में सम्पूर्ण समर्पण के साथ भक्तिरस में ओतप्रोत रहते हुए श्री हरिराय जी १२५ वर्ष की सुदीर्घ आयु का रचनाशील और प्रेरणास्पद जीवन प्राप्त करके संवत १७७२ में गोलोक सिधारे।<http://www.ignca.nic.in/coilnet/brij406.htm#shree https://web.archive.org/web/20161030060715/http://www.ignca.nic.in/coilnet/brij406.htm#shree 30 अक्तूबर 2016 >
साहित्यिक अवदान
श्री हरिराय जी का साहित्यिक अवदान विपुल और अमूल्य है, जिनमें कई भाषाओँ में लिखे गए उनके ग्रन्थ व अन्य रचनाएं शामिल हैं। उन्होंने संस्कृत, प्राकृत, ब्रजभाषा, पंजाबी, मारवाड़ी, एवं गुजराती आदि भारतीय भाषाओँ में लगभग 300 ग्रंथों की रचना की है। इनमें से १६६ ग्रन्थ संस्कृत भाषा में हैं। एक अन्य अनुमान के अनुसार तो उनका रचना संसार विभिन्न भाषाओँ में, विधाओं में और गद्य-पद्यात्मक शैलियों में १००० से अधिक छोटे बड़े ग्रंथों और रचनाओं तक फैला हुआ है।“पुष्टिमार्ग : पुष्टिमार्ग के कतिपय महान् आचार्य” -
<https://www.nathdwaratemple.org/pushtimarg/the-great-aacharya-of-pushtimarg https://web.archive.org/web/20191228112003/https://www.nathdwaratemple.org/pushtimarg/the-great-aacharya-of-pushtimarg 28 दिसंबर 2019 > इनमें से बहुत सी पुस्तकें और रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं, किन्तु अभी बहुत सी अप्रकाशित भी हैं।Shri Harirayji – A Divine Personality, Chapter 3, Shodhganga<https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/87133/7/07_chapter%203।pdf श्री हरिरायजी - <https://pushtimarg.net/personalities/shri-hariraiji/ https://web.archive.org/web/20191002130656/http://pushtimarg.net/personalities/shri-hariraiji/ 2 अक्तूबर 2019 >
श्री हरिराय जी ने श्रीमद्वल्लभाचार्य के षोडश ग्रंथों की टीकाएँ लिखीं हैं जो पुष्टिमार्ग सम्प्रदाय की प्रमुख पुस्तकों में गिनी जाती हैं। इनके अतिरिक्त वार्ताओं और हिंदी ग्रंथों की टीकाओं की लेखन विधा के भी वे प्रारम्भिक लेखकों में थे।http://www.ignca.nic.in/coilnet/brij406.htm#shree संग्रहीत प्रति 8 जून 2020 https://web.archive.org/web/20161030060715/http://www.ignca.nic.in/coilnet/brij406.htm#shree 30 अक्तूबर 2016 dead पुष्टिमार्गीय साहित्य, शुद्धाद्वैत दर्शन, और भगवत सेवा प्रणाली के प्रसार और प्रचार में उनके द्वारा प्रणीत ग्रंथों, विज्ञप्तियों, स्पष्टीकरण टीकाओं, टिप्पणियों, और विवेचन पुस्तकों का बड़ा योगदान है, जो उनके अभी तक प्रकाशित साहित्य से दृष्टिगोचर होता है।
ब्रजभाषा साहित्य को देन
महाप्रभु हरिरायजी का बाल्यकाल गोकुल में ही बीता था जहाँ वे अपने पितामह के छोटे भाई गोस्वामी श्री गोकुलनाथ जी के साथ रहते थे। इस क्षेत्र के बोलचाल की भाषा ब्रजभाषा ही है। उल्लेखनीय है कि वचनामृत के रूप में कही गई मौखिक वार्ताओं के लिए प्रसिद्ध श्री गोकुलनाथ जी की वार्ताओं - 'दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता'’दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता’ (तीन जन्म की लीला भावना वाली), तीन खण्ड, प्रथम प्रकाशक शुद्धाद्वैत अकादमी, काँकरोली, पुनः प्रकाशन वैष्णव मित्रमंडल, इंदौर तथा अंतर्राष्ट्रीय पुष्टिमार्गीय वैष्णव परिषद्, शाखा इंदौर, विक्रम संवत २०५३. और ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’“चौरासी वैष्णवन की वार्ता”, सं. द्वारकादास पारिख, प्रकाशक श्री गोवर्धन ग्रन्थमाला कार्यालय, मथुरा, १९७०. के संकलन और संपादन का श्रमसाध्य और अत्यंत उपयोगी कार्य श्री हरिराय जी ने ही किया था। ज्ञातव्य है कि ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ में महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के चौरासी सेवक वैष्णवों और ‘दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता’ में गुसाईं जी विट्ठलनाथ जी के दो सौ बावन शिष्य भक्तों का चरित्र वर्णन है, जिन्होंने उक्त आचार्यों से पुष्टिमार्गीय दीक्षा और शिक्षा ग्रहण की थी। इन वार्ताओं के अतिरिक्त श्री हरिराय जी ने स्वयं 'निज वार्ता', ‘घरू वार्ता’, 'बैठक चरित्र', 'वचनामृत' आदि अन्य वार्ताओं का सृजन किया है, जिनके द्वारा पुष्टिमार्ग के विचार और आचार को जन-जन तक पहुँचाने में अद्भुत सफलता मिली है। उन्होंने गद्य की अधिकांश शैलियों में लिखा है, जिनमें विशेषकर वार्ता साहित्य में उपन्यास तत्व, एकांकी व नाटक तत्व, कहानी तत्व, समालोचना तत्व तथा व्याख्या तत्व उनके लेखन में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। कुछ अन्य शैलियाँ भी – जैसे उपदेशात्मक, गवेषणात्मक तथा तथ्यनिरूपण प्रधान आदि भी देखी जा सकती हैं और कई जगह हिंदी की प्रारंभिक भाषा शैली का भी दिग्दर्शन होता है। हरिराय जी का गद्य सौष्ठव, अध्याय 8, पेज ४१९-४३९, शोधगंगा,
<https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/60612/10/10_chapter%208.pdf>
हरिरायजी ने अपनी रचनाएँ हरिराय, हरिधन, हरिदास एवं रसिक आदि कई नामों से भी की थीं, अतः वे पुष्टि संप्रदाय के कुछ अध्ययनशील व्यक्तियों के अतिरिक्त जन-साधारण के लिए अपरिचित से बने हुए हैं। पुष्टिमार्ग के गूढ़ भावों को स्पष्ट करने के लिए हरिराय जी ने “भाव-प्रकाश” नामक ग्रंथ लिखा जिसमें विभिन्न वार्ताओं में वर्णित भक्तों के जीवन वृत्तान्त की खोज करके विशेष सूचना के साथ उनका दिग्दर्शन कराया गया है। भाव-प्रकाश जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक का प्रथम प्रकाशन “प्राचीन वार्ता साहित्य’ के नाम से संवत १९९६ में ही कांकरोली के विद्याविभाग द्वारा हुआ। द्वारकादास पुरुषोत्तम पारिख, प्रकाशक श्री विद्याविभाग, कांकरोली प्राचीन वार्ता साहित्य, प्रथम भाग, संवत १९९६. < http://www.pushtigranth.com/book/shiksha-vachnamrut-varta/prachin-varta-rahasya-1-1419/51439628 https://web.archive.org/web/20200608111720/http://www.pushtigranth.com/book/shiksha-vachnamrut-varta/prachin-varta-rahasya-1-1419/51439628 8 जून 2020 >
"भाव प्रकाश" का महत्त्व इसलिए भी अधिक है कि संभवतः इसके द्वारा ही हिंदी भाषा में टीकाएँ लिखने की पद्धति प्रारभ हुई, जिनमें बाद में नाभाजी कृत ‘भक्तमाल’ पर प्रियादास ने पद्यात्मक टीका लिखी और केशव, बिहारी आदि कवियों पर आगे चल कर गद्य-पद्यात्मक टीकाएँ लिखी गयीं। किन्तु जितनी प्रभावशाली गद्य शैली में भाव प्रकाश टीका लिखी गयी है, वैसी अन्यत्र नहीं देखी गयी। http://www.ignca.nic.in/coilnet/brij406.htm#shree संग्रहीत प्रति 8 जून 2020 https://web.archive.org/web/20161030060715/http://www.ignca.nic.in/coilnet/brij406.htm#shree 30 अक्तूबर 2016 dead
ब्रजभाषा साहित्य, विशेषकर गद्य साहित्य में ‘वार्ता’ लिखने की शैली के प्रतिपादन का श्रेय श्री हरिराय जी को दिया जाना चाहिए। संस्कृति मंत्रालय के इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अनुसार – “खेद है इतने बड़े साहित्यकार होने पर भी हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रंथों में उनके महत्व का दिग्दर्शन नहीं कराया गया है। पं. रामचंद्र शुक्ल और डॉ. श्यामसुंदर दास के सुप्रसिद्ध इतिहास ग्रंथों में उनका नामोल्लेख भी नहीं है और मिश्र-बंधुओं एवं रसालजी के इतिहास ग्रंथों में उनका वर्णन अधूरी सूचना के साथ दिया गया है।“अष्टछाप संबंधी वार्ताओं के रचयिता”, वार्ता साहित्य और अष्टछाप, इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र,<“http://www.ignca.nic.in/coilnet/brij406.htm#shree https://web.archive.org/web/20161030060715/http://www.ignca.nic.in/coilnet/brij406.htm#shree 30 अक्तूबर 2016 > डॉ. धीरेन्द्र वर्मा, डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि विद्वानों ने भी जिन्होंने जहाँ भी वार्ता-साहित्य का उल्लेख किया है, वहां वे महाप्रभु वल्लभाचार्य, गुसाईं जी विट्ठलनाथ और गोस्वामी गोकुलनाथ तक ही सीमित रहे हैं।Shri Harirayji – A Divine Personality, Chapter 3, Shodhganga <https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/87133/7/07_chapter%203.pdf>
श्री “हरिरायजी के 41 शिक्षापत्र” के नाम से उनके शिक्षापत्र प्रभाशंकर जयशंकर पाठक – हरिरायजी के “बड़े शिक्षापत्र”, श्री गोपेश्वर जी कृत ब्रजभाषा टीका सहित, चतुर्थ संस्करण, जगदीश्वर प्रिंटिंग प्रेस, गिरगाँव, मुंबई, सन १९३६. भी बहुत प्रसिद्ध हैं, जो वैष्णवों के घरों में नित्यनियम से पढ़े जाते हैं। इन शिक्षापत्रों में पुष्टिमार्ग के भाष्यों, सुबोधिनीजी, षोडशग्रन्थ आदि में प्रतिपादित सभी सिद्धांत सरल भाषाशैली में समझाये गये हैं। ये इस शैली का अद्भुत नमूना हैं, जिसके पीछे कहा जाता है उन्होंने ये पत्र अपने छोटे भाई गोपेश्वर जी की युवा पत्नी की अवश्यम्भावी मृत्यु से होने वाले दुःख से उन्हें उबारने के लिए पहले से ही लिख कर रख दिए थे। ये शिक्षापत्र तब वास्तव में शीघ्र ही न केवल गोपेश्वर जी के लिए अत्यंत लाभकारी साबित हुए, बल्कि भविष्य के लिए पूरे वैष्णव समाज और पुष्टिमार्ग के अनुयायियों के लिए सिद्धांतों के मार्गदर्शन में सहायक बन गए। कंठमणि शास्त्री – “अष्टछाप प्राचीन वार्ता रहस्य, (द्वितीय भाग), विद्याविभाग, कांकरोली, द्वितीय संस्करण, विक्रम संवत २००९.
हरिराय जी का पद साहित्य
श्री हरिराय जी ने सहस्रों पदों की भी रचना की थी जो आज तक वैष्णवों द्वारा प्रतिदिन गाये जाते हैं। “गो.हरिराय जी का पद-साहित्य, संकलयिता और संपादक प्रभुदयाल मीतल, प्रकाशक: साहित्य संस्थान, मथुरा, प्रथम संस्करण १४ जनवरी १९६२. <https://epustakalay.com/book/4906-harirai-ji-ka-padsahitya-by-prabhudayal-meetal/> हवेली संगीत के अंतर्गत गाये जाने वाले नित्यपदों को कई राग रागिनियों में निबद्ध किया गया है। भक्तिरस से ओतप्रोत श्रीकृष्ण आराधना तथा वल्लभाचार्यजी और विट्ठलनाथ जी के स्वरूप वर्णन के ये पद वल्लभ संप्रदाय में बहुत महत्त्व रखते हैं।“गोस्वामी हरिराय जी और उनका ब्रजभाषा साहित्य”, विष्णु चतुर्वेदी, प्रकाशक – जवाहर पुस्तकालय, मदुरई, १९७६. <https://find.uoc.ac.in/Record/90399/Similar https://web.archive.org/web/20200608111737/https://find.uoc.ac.in/Record/90399/Similar 8 जून 2020 > भक्ति संगीत के क्षेत्र में भी हरिराय जी का विशिष्ट योगदान था। भक्तिसंगीत के विकास में श्री हरिराय जी का योगदान – “Contribution of Shri Harirayji in the Growth of Bhakti Sangeet, Thesis Submitted to The Maharaja Sayajirao University of Baroda for the Degree of Doctor of Philosophy in Music, RESEARCH BY Ms. Lalita Manhas, RESEARCH GUIDE Dr. Shri Ashwini Kumar Singh Ph.D. (Associate Professor), Department of Indian Music (Vocal-Tabla), Faculty of Performing Arts, M.S. University of Baroda, Vadodara (Gujarat) Year : July – 2015.
ब्रजभाषा के अलावा आपने पंजाबी, मारवाड़ी, और गुजराती में भी अनेक पदों की रचना की है।<https://www.nathdwaratemple.org/pushtimarg/the-great-aacharya-of-pushtimarg https://web.archive.org/web/20191228112003/https://www.nathdwaratemple.org/pushtimarg/the-great-aacharya-of-pushtimarg 28 दिसंबर 2019 >
हरिराय जी के उपलब्ध ग्रंथों की सूची
श्री हरिराय जी की सम्पूर्ण रचनाओं का उल्लेख करना यहाँ संभव नहीं है, पर जिन पुस्तकों आदि के बारे में जानकारी उपलब्ध हैShri Harirayji – A Divine Personality, Chapter 3, Shodhganga <https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/87133/7/07_chapter%203.pdf>
श्री हरिराय जी <https://pushtimarg.net/personalities/shri-hariraiji/ https://web.archive.org/web/20191002130656/http://pushtimarg.net/personalities/shri-hariraiji/ 2 अक्तूबर 2019 > उनकी सूची दी जा रही है।
अन्तरंग-बहिरंग-प्रपंच-विवेकः
अष्टाक्षर-मंत्रार्थः
अष्टाक्षर-शरणमन्त्र-पूर्वपक्ष-निरासः
अष्टपदी
बहिर्मुखत्व-निरुपणम्
बहिर्मुखत्व-निवृत्तिः
भगवच्छास्त्र निर्णयः
भगवत-प्रकृति-वर्णनम्
भगवच्चरणचिन्ह वर्णनं
भगवत-प्रादुर्भाव-सिद्धान्तः
भक्तानाम् दुस्संग विज्ञान प्रकार निरूपणम्
भक्तिद्वैविध्य-निरुपणम्
भक्तिमार्गे पुष्टिमार्गत्व-निरूपणम्
भक्तिमार्गे पुष्टिमार्गत्व निश्चय
भावपोषकम्
भाव-साधक-बाधक-निरूपणम्
भुजंगप्रयताष्टकम्
ब्रह्मसम्बंध-वाक्य-कठिनांश-विवेचनम्
चतुर्भुजस्वरूप विचारः
चतुःश्लोकी
वृत्रासुर चतुःश्लोकी टीका
दैन्याष्टकम्
दुस्संग-विज्ञान-प्रकार-निरुपणम्
द्वितीय श्रीकृष्णशरणाष्टकम्
द्वितीयम्
द्वितीयं भगवदीय परिशिक्षणम्
द्वितीय-स्वप्रभु विज्ञप्ति
द्वितीय गोपीजनवल्लभाष्टकम्
द्वितीय श्रीकृष्णाष्टकम्
द्वितीय स्वप्रभुविज्ञप्ति
गद्यार्थः
गर्वापहाराष्टकम्
गौणस्वरूप वर्णन
गोपीजनवल्लाभाष्टकम्
हा हा दैन्याष्टकम्
जन्म-वैफल्य-निरूपणाष्टकम्
जप-समये स्वरूपध्यानं
कामख्या-दोष-विवरणम्
कर्पण्योक्तिः
कथा-श्रवण-बाधक-निर्णयःमदत्याग-हेतुः
मधुराष्टक-तात्पर्यम्
मध्यान्हलीला
मार्गस्वरूप निर्णयः
मार्गस्वरूप निरूपणम्
मूलरूप-संशय-निराकरणम्
नैवेद्यसम्बन्धी स्तोत्रं
निष्काम-लीला
निवेदन-तात्पर्यार्थः
पञ्चामृतगर्भ स्तोत्रं
फलविवेकः
प्रभाताष्टकम्
प्रभु-प्रादुर्भाव-विचारः
प्रभु-प्राकट्य-समय-विचारः
प्रभुस्वरूप निरूपणाष्टकम्
प्रामाणिकाष्टकम्
प्रार्थनाष्टकम्
प्रातःस्मरणम्
प्रातर्युगलस्मरण
प्रथमं भगवदीय परिशिक्षणम्
प्रथमं सिद्धांत-संक्षेप-निरूपणम्
पुष्टिमार्गीय-ध्यान-प्रकार-विवेचनम्
पुष्टिमार्गीय-स्वरूप-निरुपणम्
पुष्टिपथ-मर्म-निरुपणम्
राजभोग भावना
रसात्मक-भावस्वरूप विज्ञप्ति
सर्वभोग्यसुधा आधिक्य निरूपणम्
सर्वात्मभाव-निरुपणम्
सर्वात्मभाव विवेचनम्
सत्संग-निर्णयः
शिक्षापत्र
षोडश स्तोत्रम्
श्रीभगवत पुश्टक नित्यपूजन विधि
श्री गुरुदेवाष्टकम्
श्रीकृष्णचरण विज्ञप्ति
श्रीकृष्ण शब्दार्थानि
श्री मुख्यशक्ति स्तोत्रम्
श्री नृसिंहवामन जयंती उत्सव व्रत वैशिष्ट्य निरूपणम्
श्री पञ्चाक्षर गर्भ
श्री पुरुषोत्तम स्वरूप आविर्भाव निर्णयश्रीस्वामिनी प्रार्थना
श्रीमदाचार्य चरणानां सकलावतार साम्य निरूपणम्
श्रीमधुराष्टकम्
श्रीमत्प्रभोसर्वतर
श्रीमत्प्रभोश्चिन्तनम्
श्रीमत्प्रभु प्राकट्यहेतु निरूपणम्
श्रीमत्स्वमार्गीय भक्ति द्वैविध्या विवेक
श्री विट्ठलेश्वर अष्टोत्तर नामावली
श्रीगिरिधराष्टकम्
श्री गोकुलेश स्वरूप निरूपणम्
श्रीगुरुदेवाष्टकम्
श्री महाप्रभोः अष्टोत्तरशत नामानि
श्रीनागरी-नागर स्तोत्रम्
श्रीस्वामिनीप्रार्थनाष्टकम्
श्रीवैश्वानराष्टकम्
श्रीवल्लभचरण विज्ञप्ति
श्रीवल्लभशरणाष्टकम्
श्री विट्ठलेश्वर अष्टोत्तरशत नामावली
श्रीयमुना विज्ञप्ति
श्रीगोकुल-प्रवेश लीला
श्री गोकुलेश सेवःनिकम
श्रीगोपीजनवल्लभाष्टकम्
श्रीकृष्णचरण विज्ञप्ति
श्रीकृष्ण शब्दार्थ निरूपणम्
श्रीकृष्णशरणाष्टकम्
श्रीमदाचार्य सकल अवतार साम्य निरूपणम्
श्रीमदाचार्य चिंतनम्
श्रीमद् राधाष्टकम्
श्रीमंदोकुचन्द्राष्टकम्
श्रीमत्प्रभोः प्रादुर्भाव-प्रकार-निरूपणम्
श्रीमत्प्रभोः सर्वान्तरत्व निरूपणम्
श्रीमत-प्रभोर्वायोर्निरूपणम्
श्रीमत-प्रभोष-चिंतन-प्रकारः
श्रीमत-प्रभु-प्राकट्य-हेतु-निर्णयः
श्रीमत-पुरुषोत्तम-स्वरूप-अविभाव-निर्णयः
श्रीमुख्यशक्ति स्तोत्रम्
श्रीनवनीतप्रियाष्टकम्
श्रीनिजचार्याष्टकम्
श्री-पुष्टिमार्ग-लक्षणानि
श्रीवल्लभ-भावाष्टकम्श्रीवल्लभ-पञ्चाक्षर-स्तोत्रम्
स्मरणाष्टकम्
स्तोत्रम्
स्वमार्ग-मर्यादा-निरुपणम्
स्वमार्ग-मूल-निरुपणम्
स्वमार्ग-रहस्य-निरूपणम्
स्वमार्ग सर्वस्वम्
स्वमार्ग-शरणद्वय-निर्णयः
स्वमार्गीय-भक्तिद्वैविध्य-विवेकः
स्वमार्गीय-भावना-स्वरूप-निरूपणम्
स्वमार्गीय-कर्तव्य-निर्णयम्
स्वमार्गीय-मुक्तिद्वैविध्य-निरूपणम्
स्वमार्गीय-साधन-निरूपणम्
स्वमार्गीय-संन्यास-वैलक्षण्य-निरूपणम्
स्वमार्गीय-सेवाफल-निरुपणम्
स्वमार्गीय-शरण-समर्पण-सेवा-आदि-निरूपणम्
स्वमार्गीय-स्वरूप-स्थापन-प्रकारः
स्वप्रभु विज्ञप्ति
स्वरूप-तारतम्य-निर्णयः
स्व-स्वामी पाणियुगलाष्टकम्
स्वतन्त्र लेखाः
स्वमार्गीय कर्तव्य निरूपक
स्वमार्गीय मुक्ति द्वैविध्य कारणम्
स्वमार्गीय रहस्य निरूपणम्
स्वमार्गीय साधन
स्वमार्गीय संन्यास वैलक्षण्य निरूपणम्
स्वमार्गीय शरण समर्पण सेवा आदि निरूपणम्
स्वमार्गीय स्वरूप स्थापन प्रकार
स्वमार्ग मर्यादानि
स्वमार्ग मूलस्वरूप निरूपक
स्वमार्ग सेवाफलरूप
स्वमार्गशरणम् द्वैयानि
स्वप्रभुस्वरूप निरूपणम्
स्वप्रभुविज्ञप्ति
स्वस्वामिपाणियुगलः
तृतीयम्
तृतीयं तदीयनम् शिक्षणम्
वक्चक्षुर्मुख्यत्व निरुपणम्
विज्ञप्ति
विपरीत-श्रृंगार फलम्
वीटिका-समर्पणभाव-निरूपणम्
हरिराय जी की ‘बैठकें’
पुष्टिमार्ग में ‘बैठक’ वह स्थान है, जहाँ आचार्यों ने कुछ समय व्यतीत करके वैष्णवों और सम्प्रदाय के भक्तों को अपने वचनामृत से लाभान्वित किया हो और अपने विभिन्न धार्मिक व अन्य कार्यकलापों द्वारा पुष्टिमार्ग के सिद्धांतों के प्रतिपादन में योगदान दिया हो। पुष्टिमार्ग के अनुयायियों के लिए ये स्थान अत्यंत पवित्र और पूजनीय होते हैं, जिनकी तीर्थस्थान के रूप में ही वे यात्रा करते हैं। श्री हरिराय की सात बैठकें हैं। श्रीहरिरायजी महाप्रभु का जीवन चरित्र - ‘प्रगटे पुष्टिमहारस देन’, श्रीवल्लभ स्मृति ग्रंथमाला, पुष्प ९, श्रीवल्लभ-ग्रन्थ-प्रकाशन कार्यालय, सूरत, १९८५ गुजरात के सावली में निवास के दौरान आपने सेवा की भाव-भावना का ग्रन्थ ‘श्रीसहस्त्री भावना’ रचा था। जम्बूसर में युगल-गीत की कथा द्वारा उन्होंने अद्भुत रसवर्षा की एवं डाकोर में प्रभु श्री रणछोड़रायजी का मंदिर बनवा कर वहां की सेवा का प्रकार प्रारंभ किया।श्री हरिराय - भारतीय संस्कृति के रक्षक संत, शम्भुनाथ श्रीवास्तव, प्रभात प्रकाशन, ISBN 9387968111 <https://books.google.co.in/books?id=MRNxDwAAQBAJ&pg=PT157&lpg=PT157&dq=%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A5%80&source=bl&ots=xoxSIi5snp&sig=ACfU3U2L9M1hunPj_-z-mWjCZGeiIjeUMQ&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjjod2KzrjpAhWMTX0KHQwiDDo4FBDoATAHegQICBAB#v=onepage&q=%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%9C%E0%A5%80&f=false> गुजरात के इन तीनों स्थानों पर आपकी बैठक हैं। इसके अलावा व्रज में गोकुल, मेवाड़ में खमनोर तथा नाथद्वारा, और मारवाड़ में जैसलमेर में भी आपकी बैठक हैं।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
1. “श्री हरिराय महाप्रभु का आभामंडल” https://web.archive.org/web/20180409014119/http://rsaudr.org/show_artical.php
2. पुष्टिमार्ग के प्रमुख रचनाकार<https://sg.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/59290/7/07_chapter%205.pdf https://web.archive.org/web/20200608113222/https://sg.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/59290/7/07_chapter%205.pdf 8 जून 2020 >
3. बसो बावन वैष्णवनी वार्ता, (त्रण जन्मानी लीलाभावनावली ४ भाग), कोठारी, १९९३.
4. गो. हरिरायजी - पुष्टिमार्ग लक्षणानि, निरुद्धाचार्य कृत प्रकाश टीका, १९१०.
<http://www.pushtisahitya.org/Gujarati/granthas/other/ShreeHariraiji/PushtimargLakshani.pdf>
5. हरिराय जी कृत कामाख्यादोष विवरण (गुजराती संस्करण) – लल्लूभाई प्राणवल्लभदास पारेख तथा
त्रिभुवनदास प्राणवल्लभदास पारेख, सत्यविजय प्रिंटिंग प्रेस, अहमदाबाद, १९०८
6. Shree Harirai Vangmuktavali Granth Series <http://www.pushtisahitya.org/HariraiVangmuktavali.shtml>
7. http://hdl.handle.net/10108/13458
श्रेणी:साहित्यकार
श्रेणी:धर्मोपदेशक
श्रेणी:धर्म प्रवर्तक
श्रेणी:पुष्टिमार्ग
श्रेणी:शुद्धाद्वैत
श्रेणी:भाष्यकार
श्रेणी:सत्रहवीं शताब्दी के लेखक