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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

इंशा अल्ला खाँ

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इंशा अल्ला खाँ 'इंशा' (१७५६ - १८१७) हिन्दी साहित्यकार और उर्दू कवि थे। वे लखनऊ तथा दिल्ली के दरबारों में कविता करते थे। उन्होने दरया-ए-लतफत नाम से उर्दू का प्रथम व्याकरण की रचना की थी। हिन्दी में उन्होने 'रानी केतकी की कहानी' नामक कथाग्रन्थ की रचना की। यह उर्दू लिपि में लिखी गयी थी। बाबू श्यामसुन्दर दास इसे हिन्दी की पहली कहानी मानते हैं। जीवन मुर्शिदाबाद में पैदा हुए और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के काल में दिल्ली आ गए। अपने चातुर्य और मसखरेपन की वजह से छा गए। दरबारी और बाहरी शायरों से बड़ी नोक झोंक रखते थे। शाहआलम की आर्थिक स्थिति ख़राब होने की हालत में लखनऊ आ गए जहाँ आसिफुद्दौला का शासन था। यहाँ भी शाह आलम के पुत्र मिर्ज़ा सुलेमान शिकोह के दरबार में प्रभुत्व जमा लिया। यहाँ मुसहफ़ी जैसे विद्वान पहले से थे, पर इन्हें नीचा दिखाकर अपना स्थान हथिया लिया। धीरे-धीरे सआदत अली खान के दरबार में आ गए लेकिन नवाब के दिल में इनके लिए बाल आ गया और इनका अन्त बहुत निर्धनता में बीता। इंशा जानकार और चतुर थे। ऐसी कोई बात न थी जिसे वो शेर में न कह सकते थे, पर ग़ज़ल की ख्याति उन्हें न मिल सकी। समीक्षकों का मानना है कि इस योग्यता का उपयोग न करके वे मसखरे पन में व्यस्त रहेशेर ओ सुख़न अयोध्याप्रसाद गोयलीय २०७ । इंशा मुशायरे में जाते तो एक तरफ़ किसी की तारीफ़ करते और एक तरफ़ मुँह चिढ़ा देते। मुसहफ़ी ने इनके बारे में कहा था - वल्लाह कि शायर नहीं है तू, भाँड है भड़वे। नवाब से अनबन होने के बाद इनको काफ़ी दुःख दर्द देखने पड़े। इन दिनों लिखे शेर इनको अबतक ख्याति दिला रहे हैं - कमर बाँधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैंबहुत आगे गए बाक़ी, जो हैं तैयार बैठे हैं। न छेड़ ऐ निकहते बादेबहारी, राह लग अपनीतुझे अठखेलियाँ सूझी है, हम बेज़ार बैठे हैं। तसव्वुर अर्श पर है और सर है पाए साक़ी परगरज़ कुछ और धुन में और इस घड़ी मयख़्वार बैठे हैं। इन्हें भी देखें रानी केतकी की कहानी सन्दर्भ श्रेणी:उर्दू शायर श्रेणी:१७५६ में जन्म श्रेणी:१८१७ में निधन