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कठ
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कठ नाम पाणिनि के अष्टाध्यायी में प्राप्त होता है।। यह वेद की कठ शाखा के प्रवर्तक थे। पतंजलि के महाभाष्य के मत से कठ वैशंपायन के शिष्य थे। इनकी प्रवर्तित शाखा 'काठक' 'कठिक' वर्तमान में 'खटिक' नाम से भी प्रसिद्ध है। आजकल इस शाखा की वेदसंहिता नहीं प्राप्त होती। काठक शाखाध्यायी भी 'कठ' कहलाते हैं। इनसे सामवेद के कालाप और कौथुम शाखीय लोगों का मिश्रण हुआ।
वाल्मीकि रामायण के कठकालाप एक स्थान प्रयुक्त हैं (ये चेम कठकालापा बहवो दण्डमानवा:, अयो. 32। 18)। कठोपनिषद् से भी इनका संबध है। यह कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा के अंतर्गत आता है।
सिकंदर के विजयाभियान के इतिहासकारों ने भी इनका 'कथोई' नाम से उल्लेख किया है। कठ/काठी/खटिक जाति के लोग इरावती (रावी) नदी के पूर्वी भाग में बसे हुए थे जिसे आजकल पंजाब में 'माझा' कहा जाता है। सिकंदर के आने पर कठों ने अपनी राजधानी संगल (अथवा साँकल) के चारों ओर रथों के तीन चक्कर लगाकर शकटव्यूह का निर्माण किया और यूनानी आक्रमणकारी से डटकर लोहा लिया। पीछे से पुरु की कुमक प्राप्त होने पर ही विदेशी साँकल पर अधिकार कर सका। इसयुद्ध में कठों का विनाश हुआ, किंतु इस अवसर पर सिंकंदर इतना खीझ उठा कि साँकल को जीतने के बाद उसने उसे मिट्टी में मिला दिया। कठों के संघ के प्रत्येक बच्चा संघ माना जाता था। संघ की ओर से वहाँ गृहस्थों की संतान के निरीक्षक नियत हाते थे। सुंदरता के वे विकट रूप से पोषक थे। इनकी चर्चा करते हुए ग्रीक इतिहासकारों ने लिखा है कि इस दृष्टि से कट स्पार्त नगर के निवासियों से बहुत मिलते थे। एक महीने की अवस्था के भीतर वे जिस बच्चे को दुर्बल अथवा कुरूप पाते उसे मरवा डालते थे। युद्ध कौशल में उनकी ख्याति सभी जातियों में अधिक थी। ओनेसिक्रितोज़ के अनुसार जाति में सर्वांगसुंदर व्यक्ति को राजा बनाते थे। आज भी यह कठ क्षत्रिय गुजरात के काठियावाड़ में काठी दरबार के नाम से जाने जाते हैं काठियावाड़ नाम इन काठी दरबारो के नाम पर पड़ा हे|
इन्हें भी देखें
कठ उपनिषद्
श्रेणी:भारतीय संस्कृति
श्रेणी:पौराणिक पात्र