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प्रोटागोरस
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प्रोटागोरस (संवाद) प्लेटो प्राचीन यूनानी एथेंस (प्राचीन यूनान) दर्शनशास्त्र, नीतिशास्त्र, शिक्षा सुकराती संवाद लगभग 433 ईसा पूर्व (कैलियास का घर, एथेंस)
प्रोटागोरस (Protagoras, Πρωταγόρας) प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो द्वारा रचित सबसे प्रसिद्ध 'सुकराती संवादों' में से एक है। इसे प्लेटो के प्रारंभिक काल की रचना माना जाता है। इस संवाद में युवा सुकरात और प्राचीन यूनान के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित 'सोफिस्ट' शिक्षक प्रोटागोरस के बीच एक गहन दार्शनिक बहस को दर्शाया गया है। यह संवाद इस मूल प्रश्न पर केंद्रित है कि क्या सद्गुण (यूनानी में अरेटे) को पढ़ाया जा सकता है?Review of (N.) Denyer, "Plato, Protagoras". Cambridge: Cambridge University Press, 2008
पृष्ठभूमि और प्रोटागोरस का दावा
संवाद की शुरुआत एथेंस के एक धनी नागरिक कैलियास के घर में होती है, जहाँ कई प्रमुख सोफिस्ट दार्शनिक एकत्र हुए हैं। सुकरात अपने एक युवा मित्र हिप्पोक्रेट्स के साथ वहाँ पहुँचते हैं, जो प्रोटागोरस का शिष्य बनना चाहता है। सुकरात प्रोटागोरस से पूछते हैं कि वह अपने छात्रों को वास्तव में क्या सिखाते हैं।
प्रोटागोरस दावा करते हैं कि वह छात्रों को राजनीतिक और नागरिक कला सिखाते हैं-संक्षेप में, वह उन्हें "अच्छा नागरिक" बनना और सद्गुण सिखाते हैं। सुकरात इस दावे पर संदेह जताते हैं। उनका तर्क है कि तकनीकी कौशल (जैसे जहाज बनाना या वास्तुकला) तो सिखाए जा सकते हैं, लेकिन नैतिक सद्गुण कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे एक शिक्षक से दूसरे व्यक्ति में स्थानांतरित किया जा सके। इसके उत्तर में प्रोटागोरस एक 'महान भाषण' देते हैं, जिसमें वे एक पौराणिक कथा (प्रॉमीथियस की कहानी) के माध्यम से समझाते हैं कि न्याय और सम्मान की भावना सभी मनुष्यों में स्वाभाविक रूप से मौजूद है, लेकिन इसे शिक्षा और समाज के कानूनों द्वारा निखारा जाता है।
सद्गुणों की एकता
सुकरात चर्चा की दिशा बदलते हुए एक नया तार्किक प्रश्न उठाते हैं। प्रोटागोरस मानते हैं कि सद्गुण के कई अलग-अलग हिस्से हैं (जैसे न्याय, ज्ञान, साहस, संयम और पवित्रता), और एक व्यक्ति में एक सद्गुण हो सकता है (जैसे साहस) लेकिन दूसरा नहीं (जैसे न्याय)।
सुकरात इसके खिलाफ सद्गुणों की एकता का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। वे अपनी विशिष्ट 'द्वंद्वात्मक विधि' का उपयोग करके प्रोटागोरस को यह स्वीकार करने पर मजबूर कर देते हैं कि सभी सद्गुण वास्तव में एक ही चीज़ के अलग-अलग नाम हैं, और वह एक चीज़ है: ज्ञान । यदि कोई व्यक्ति वास्तव में जानता है कि क्या सही है, तो वह न्यायपूर्ण, साहसी और संयमी दोनों होगा।Vlastos Gregory Socrates, Ironist and Moral Philosopher https://archive.org/details/socratesironistm0000vlas Cornell University Press 1991 978-0801497872 250-255
'अक्रासिया' का खंडन और सुखवादी गणना
संवाद का सबसे प्रसिद्ध और विवादास्पद हिस्सा अक्रासिया (इच्छाशक्ति की कमजोरी) का सुकराती खंडन है। आम लोग मानते हैं कि कई बार मनुष्य जानते हुए भी बुरा काम करता है क्योंकि वह भावनाओं या "सुखों के वशीभूत" हो जाता है।
सुकरात इसे तार्किक रूप से असंभव मानते हैं। उनका तर्क है कि लोग जिसे "सुखों के वशीभूत होना" कहते हैं, वह वास्तव में केवल अज्ञानता है। वे एक सुखवादी गणना का सिद्धांत देते हैं: सभी लोग स्वाभाविक रूप से सुख चाहते हैं और दुख से बचना चाहते हैं। जब कोई व्यक्ति कोई बुरा काम (जैसे अस्वस्थ भोजन खाना) करता है, तो वह इसलिए नहीं करता कि उसकी इच्छाशक्ति कमजोर है, बल्कि इसलिए करता है क्योंकि वह तात्कालिक सुख और भविष्य में होने वाले दीर्घकालिक दुख (बीमारी) को सही ढंग से "मापने" में विफल रहता है।
अतः, कोई भी व्यक्ति जानबूझकर बुराई (या दुख) नहीं चुनता। हर पाप या गलती 'माप की कला' में कमी, यानी अज्ञानता का परिणाम है। इससे सुकरात यह सिद्ध करते हैं कि "सद्गुण ही ज्ञान है"।
निष्कर्ष और विडंबना
संवाद एक शानदार विडंबना के साथ समाप्त होता है। सुकरात, जिन्होंने शुरुआत में दावा किया था कि सद्गुण सिखाया नहीं जा सकता, अंत में यह साबित कर देते हैं कि सद्गुण पूरी तरह से 'ज्ञान' है (और ज्ञान को सिखाया जा सकता है)। दूसरी ओर, प्रोटागोरस, जिनका पेशा ही सद्गुण सिखाना था, इस निष्कर्ष का विरोध करते हुए दिखाई देते हैं कि सद्गुण केवल ज्ञान है। यह संवाद किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय दार्शनिक उलझन की स्थिति में समाप्त होता है, जो पाठकों को स्वयं सोचने के लिए प्रेरित करता है।Plato: A Guide to the Early and Middle Dialogues
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग पर प्रोटागोरस
श्रेणी:दार्शनिक साहित्य