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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

सोहनलाल पाठक

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Martyr Sohanlal Pathak.jpg 1883 01 07 yes पट्टी, लाहौर, पंजाब, (अब अमृतसर जिला, पंजाब, भारत में है) 1916 02 10 1883 01 07 yes माण्डले, बर्मा फाँसी Indian revolutionary भारतीय स्वतंत्रता का क्रांतिकारी आन्दोलन सोहनलाल पाठक (7 जनवरी 1883 - 10 फरवरी 1916) पंजाब के एक क्रांतिकारी और गदर पार्टी के सदस्य थे।Google Books Google https://www.google.co.in/books/edition/Freedom_Fighters_of_India_in_Four_Volume/vnJ0MwbAsEAC?hl=en&gbpv=1&dq=Sohanlal+Pathak&pg=PA225&printsec=frontcover Google 24 April 2026https://books.google.com/books?id=vnJ0MwbAsEAC&dq=sohanlal+pathak&pg=PA225 Freedom Fighters of India (in Four Volumes) Agrawal M. G. 2008 Gyan Publishing House 978-81-8205-468-4 en उन्होंने बर्मा में भारतीय राष्ट्रवाद के आदर्शों का प्रचार किया।https://archive.org/details/whoswhoofindianm01chop Who's Who of Indian Martyrs, Vol. 1 Chopra Pran Nath 2013 Publications Division, Ministry of Information and Broadcasting, Govt. of India Public Resource 978-81-230-1757-0https://www.scribd.com/document/394605591/Eminent-Freedom-Fighters-of-Punjab-by-Fauja-Singh-GurmatVeechar-com-pdf Eminent Freedom Fighters of Punjab by Singh Scribd en 12 July 2021 अगस्त 1915 में बर्मा में विद्रोह का आयोजन करते हुए उन्हें गिरफ्तार किया गया था। उन्हें सरकार के खिलाफ षडयन्त्र करने और राजद्रोह करने के लिए मुकदमा चलाया गया और मौत की सजा सुनाई गई।https://books.google.com/books?id=eataP-tWsMIC&q=sohanlal+pathak The Story of Freedom Fighters Pitambar Publishing 978-81-209-1304-2 en 10 फरवरी 1916 को बर्मा के माण्डले जेल में उन्हें फांसी दी गई थी।https://amritmahotsav.nic.in/unsung-heroes-detail.htm?4532 Sohan Lal Pathak Mahotsav Amrit Azadi Ka Amrit Mahotsav, Ministry of Culture, Government of India English 2024-03-06 सोहन लाल पाठक का जन्म 1883 में पंजाब के पट्टी (तब अमृतसर जिला, अब तरनतारन जिला) के एक गरीब ब्राह्मण श्री चंदा राम के घर हुआ था। एक मेधावी छात्र होने के नाते, सोहन लाल जी ने स्थानीय स्कूल में रहते हुए कई बार छात्रवृत्ति और पुरस्कार जीते। लेकिन मिडिल की परीक्षा पास करने और सिंचाई विभाग में नौकरी हासिल करने के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी। थोड़े समय के बाद उन्होंने यह सेवा छोड़ दी और लाहौर के नॉर्मल ट्रेनिंग स्कूल में दाखिला लिया। कोर्स पूरा करने पर उन्होंने एक स्कूली शिक्षक के रूप में काम करना शुरू कर दिया। वर्ष 1901 में सोहन लाल पाठक का विवाह लक्ष्मी देवी से हुआ। उनके बेटे के जन्म के बाद लक्ष्मी देवी का निधन हो गया और उनके बेटे की भी जन्म के एक सप्ताह के भीतर मृत्यु हो गई। 1905-07 के क्रांतिकारी विद्रोह ने गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने प्रधानाध्यापक द्वारा लाला लाजपत राय और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं के साथ अपने संपर्क तोड़ने के आदेश के विरोध में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। तत्पश्चात लाला लाजपत राय के अधीन कार्यरत उर्दू पत्रिका वन्दे मातरम् के संयुक्त संपादक बने। साथ ही, वह उन कक्षाओं में शामिल हो गए, जिन्हें लाला हरदयाल ने लाहौर में भारतीय युवाओं को क्रांति की आग में झोंकने के लिए शुरू किया था। वह 1913 में गदर पार्टी में शामिल होने के लिए अमेरिका के कैलिफोर्निया चले गए। १९१५ में उन्हें गदर पार्टी की तरफ से गुप्तचरी करने के लिये बर्मा भेजा गया। योजना यह थी कि 21 फरवरी, 1915 को भारत की सैनिक छावनियों में भारतीय सैनिक सशस्त्र विद्रोह करेंगे। यह बर्मा के भारतीय सैनिकों को तैयार करें कि वह भी उसी दिन सशस्त्र विद्रोह कर भारत पर आक्रमण करें । तुरंत ही अंग्रेजों ने इस खतरनाक क्रांतिकारी की गिरफ्तारी के लिए तलाश शुरू कर दी। उन पर हाथ रखना इतना आसान नहीं था, क्योंकि वे स्थानीय भाषा जानते थे और देशी लोगों के वेश में देश में स्वतंत्र रूप से घूमते थे। अंत में अंग्रेज सरकार अगस्त 1915 में मेम्यो (बर्मा) में उन्हें गिरफ्तार करने में सफल रही। ब्रिटिश सेना के एक भारतीय जमादार ने उन्हें गिरफ्तार करा दिया। मुकदमे के दौरान उन्हें मांडले के किले में हिरासत में लिया गया था। अदालत ने उसे दोषी करार दिया और मौत की सजा सुनाई। फाँसी वाले दिन जल्लाद ने भी फाँसी लगाने से इन्कार कर दिया। वह बोला, "मैं दुष्टों, अपराधियों, चोर व डकैतों को फाँसी देता हूँ । फाँसी लगाना मेरा धर्म है, मेरा फर्ज है, मगर पंडित सोहन लाल जैसे देव पुरुषों को मैं फाँसी नहीं दे सकता । " दूसरे जल्लाद ने उन्हें फाँसी दी। 10 फरवरी 1916 को उनकी मृत्यु फाँसी पर हुई। एक और महान स्वतंत्रता सेनानी जो उनके साथ फाँसी पर शहीद हुए , वे थे हरनाम सिंह सहरी। इनकी कुर्बानी रंग लाई । बर्मा आजाद हुआ लेकिन चन्द दिनों के बाद ही अंग्रेजों ने उस पर पुनः अधिकार कर लिया । वह गदर पार्टी के पहले ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्हें भारत से बाहर फांसी की सजा दी गई थी। सन्दर्भ श्रेणी:1883 में जन्मे लोग श्रेणी:ब्रिटिश भारत द्वारा फाँसी पर लटकाए गए लोग श्रेणी:ग़दर पार्टी श्रेणी:Pages with unreviewed translations