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411 समाचार
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होलिका दहन

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होलिका दहन हिन्दू, Holi Bonfire Udaipur.jpg फाल्गुन पूर्णिमा मार्च होली के एक दिन पूर्व होली होलिका दहन, हिंदू धर्मग्रंथों (जैसे भागवत पुराण) के अनुसार, भक्त प्रह्लाद और उनके पिता हिरण्यकश्यप की कथा "बुराई पर अच्छाई की जीत" का सबसे बड़ा प्रतीक है। इसी घटना की स्मृति में प्रतिवर्ष होली और होलिका दहन का पर्व मनाया जाता है। कथा पृष्ठभूमि हिंदू पुराणों (मुख्यतः श्रीमद्भागवत पुराण) के अनुसार, प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाhttps://hindisanatan.com/ HindiSanatan 2025-08-31 hi-IN 2026-02-24म का एक शक्तिशाली असुर राजा था। उसने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करके एक विशेष वरदान प्राप्त किया था। इस वरदान के अनुसार, उसे न कोई मनुष्य मार सकता था न पशु, न दिन में न रात में, न घर के अंदर न बाहर, और न ही किसी अस्त्र या शस्त्र से उसकी मृत्यु हो सकती थी। इस वरदान के अहंकार में उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया और अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया। प्रह्लाद की विष्णु भक्ति हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। असुर कुल में जन्म लेने के बावजूद, उसके मुख पर सदैव "नारायण" का नाम रहता था। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को दैत्य गुरुओं के पास शिक्षा के लिए भेजा, ताकि वह राजनीति और असुर विद्या सीख सके, परंतु प्रह्लाद का मन केवल भक्ति में ही लगा रहा। जब हिरण्यकश्यप को पता चला कि उसका अपना पुत्र उसके शत्रु (विष्णु) की पूजा करता है, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ। यातनाएं और दैवीय रक्षा हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को भक्ति मार्ग से हटाने के लिए कई प्राणघातक प्रयास किए: उसे ऊँचे पर्वत शिखर से नीचे फिंकवाया गया। उसे विषैले साँपों के बीच छोड़ा गया। उसे मतवाले हाथियों के पैरों तले कुचलवाने की कोशिश की गई। उसे गहरे समुद्र में डुबोया गया। प्रत्येक अवसर पर भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गया, जिससे उसका विश्वास और अधिक दृढ़ हो गया। होलिका दहन की घटना अंततः, हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह अग्नि में नहीं जल सकती थी। हिरण्यकश्यप की आज्ञा से होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर जलती हुई चिता पर बैठ गई। प्रह्लाद निर्भय होकर नारायण का नाम जपते रहे। परिणाम स्वरूप, वरदान का दुरुपयोग करने के कारण होलिका स्वयं जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद आग से सुरक्षित बाहर निकल आए। इसी घटना की स्मृति में प्रतिवर्ष फाल्गुन पूर्णिमा को 'होलिका दहन' किया जाता है। भगवान नरसिंह अवतार और हिरण्यकश्यप वध अंत में, जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा कि "तेरा भगवान कहाँ है? क्या वह इस स्तंभ में भी है?", और खंभे पर प्रहार किया, तब भगवान विष्णु 'नरसिंह' अवतार (आधा सिंह, आधा मनुष्य) के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने हिरण्यकश्यप के वरदान की सभी शर्तों का सम्मान करते हुए: स्थान: उसे महल की देहरी (चौखट) पर रखा (न घर के अंदर, न बाहर)। समय: गोधूलि बेला (न दिन, न रात)। स्थिति: अपनी गोद में बिठाया (न भूमि पर, न आकाश में)। शस्त्र: अपने पैने नाखूनों का उपयोग किया (न अस्त्र, न शस्त्र)। इस प्रकार भगवान नरसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध कर अधर्म का अंत किया और भक्त प्रह्लाद की रक्षा की। सांस्कृतिक महत्व यह कथा भारतीय संस्कृति में 'बुराई पर अच्छाई की जीत' और 'अधर्म पर धर्म की विजय' का सबसे बड़ा उदाहरण मानी जाती है। इसके अगले दिन रंगों वाली होली खेली जाती है, जो जीवन में आनंद और सद्भाव का प्रतीक है। 'श्रीमद्भागवत पुराण' इन्हें भी देखें होली होलिका विष्णु प्रह्लाद हिरण्यकश्यप नृसिंह अवतार श्रेणी:होली