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411 समाचार
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भारत-संयुक्त राष्ट्र संघ सम्बन्ध

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भारत गणराज्य Flag of India.svg पूर्ण सदस्य 24 अक्टूबर 1945 अस्थायी टी एस तिरूमुर्ती सी पी रामास्‍वामी मुदलियार अंगूठाकार|भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी संयुक्त राष्ट्र सभा को सम्बोधित करते हुए। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों एवं सिद्धान्तों का लगातार समर्थन किया है तथा विशेष रूप से शांति स्थापना के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के लक्ष्यों को कार्यान्वित करने में महत्वपूर्ण रूप से योगदान दिया है। संयुक्त राष्ट्र के भूतपूर्व महासचिव कोफी अन्नान के अनुसार पिछले दशकों में भारत ने अपनी सरकार के प्रयासों तथा भारतीय विद्वानों, सैनिकों एवं अन्तरराष्ट्रीय सिविल कर्मचारियों के काम के माध्यम से संयुक्त राष्ट्र संध में प्रचुर योगदान किया है। भारत विकासशील देशों की ओर से संयुक्त राष्ट्र के एजेण्डा को आकार देने में इसकी सहायता करने में सबसे प्रखर आवाजों में से एक रहा है और इसके सशस्त्र बलों का अनुभव एवं व्यावसायिकता बार-बार संयुक्त राष्ट्र की शांति स्थापना से सम्बन्धित अभियानों में अमूल्य साबित हुआ है। विगत् वर्षों में भारत ने संयुक्त राष्ट्र को ऐसे मंच के रूप में देखा है जो अन्तरराष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा के गारण्टर के रूप में भूमिका निभा सकता है। वर्तमान में भारत ने विकास एवं गरीबी उन्मूलन, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, जलदस्युता, निःशस्त्रीकरण, मानवाधिकार, शान्ति निर्माण एवं शांति स्थापना की बहुपक्षीय वैश्विक चुनौतियों की भावना में संघर्ष करने के लिए संयुक्त राष्ट्र प्रणाली को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है। भारत ने हमेशा से ही संयुक्त राष्ट्र संघ में अपनी आवाज मजबूती के साथ उठायी है। भारत ने गुट-निरपेक्ष आन्दोलन तथा विकासशील देशों का समूह 77 का गठन किया जिन्होंने अधिक साम्यपूर्ण अन्तरराष्ट्रीय आर्थिक एवं राजनितिक व्यवस्था के लिए संयुक्त राष्ट्र के अन्दर दलील प्रस्तुत की। संयुक्त राष्ट चार्टर के अनुच्छेद 53 में इस बात का उल्लेख है कि बहुपक्षीय संगठन उच्च जीवन स्तर, पूर्ण रोजगार तथा आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति एवं विकास को बढ़ावा देंगे। विगत् दशकों में, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तथा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक जैसे अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार के लिए आह्वान करने के अलावा भारत ने सभी प्रकार के आतंकवाद के प्रति शून्य सहायता के दृष्टिकोण की वकालत की है। 1996 में भारत ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर एक प्रारूप व्यापक अभिसमय (सीसीआईटी) प्रस्तुत किया जिसका उद्देश्य आतंकवाद से लड़ने के लिए एक आद्योपान्त कानूनी रूपरेखा प्रदान करता है। भारत संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या निधि जैसी संयुक्त राष्ट्र निधियों में योगदान करने वाले प्रमुख देशों में से एक है। इस निधि की स्थापना 2008 में की गई थी। आज भारत लोकतान्त्रिक मूल्यों एवं प्रक्रियाओं को बढ़ावा देने के लिए इस निधि में योगदान करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। भारत 2012-15 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य था तथा इस क्षेत्र में समुद्री जल दस्युता पर एक खुली चर्चा को आगे बढ़ाया। भारत अब तक सात बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है। संयुक्त राष्ट्र सदस्यता हेतु फिलीस्तीन का आवेदन फिलीस्तीनी, जैसाकि फिलीस्तीनी प्राधिकरण द्वारा प्रतिनिधित्व, पश्चिमी बैंक, जिसमें पूर्वी जेरूसलम, और गाजा पट्टी -1967 के छह दिन के युद्ध के बाद से इजराइल द्वारा अधिकृत-भी शामिल है, में स्वतंत्र एवं संप्रभु राष्ट्र की स्थापना की एक लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं हालांकि, दो दशकों की चलने वाली कभी वार्ता शुरू-कभी बंद शांति वार्ता समस्या का समाधान प्रस्तुत करने में असफल हो गई। 2010 के उत्तरार्द्ध में फिलीस्तीनी अधिकारियों ने एक नवीन राजनयिक रणनीति का अनुसरण करना प्रारंभ कर दिया- देशों से बोलना शुरू कर दिया कि वे 1967 के सीमांकन पर एक स्वतंत्र फिलीस्तीन राष्ट्र को मान्यता दें। अब वे चाहने लगे कि संयुक्त राष्ट्र फिलीस्तीन को एक पूर्ण सदस्य राष्ट्र के तौर पर स्वीकार करे वर्तमान में फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन (पीएलओ) को मात्र पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त है। सदस्यता के अपने राजनितिक निहितार्थ होंगे जो फिलिस्तीन को संयुक्त राष्ट्र अभिकरण में शामिल होने की अनुमति देंगे और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय जैसी अंतरराष्ट्रीय संधियों का एक पक्ष बनेंगे, जहाँ वे इजराइल द्वारा अधिकृत क्षेत्रों को चुनौती देते हुए क़ानूनी कार्यवाही कर सकेंगे। फिलीस्तीन को एक सदस्य राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने के क्रम में उन्हें 15 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद्के अनुमोदन की आवश्यकता होगी। परिषद् की अनुशंसा के पश्चात् अंतिम अनुमोदन के लिए महासभा में 198 सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। प्रक्रिया के प्रारंभ में, फिलीस्तीन प्राधिकरण के अध्यक्ष, महमूद अब्बास, ने 23 सितंबर, 2011 को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान-की-मून को एक निवेदन भेजा महासचिव ने आवेदन सुरक्षा परिषद् को सौंपा। परिषद् को 15 में से 9 मतों की आवश्यकता होगी और निर्णय को पारित करने के लिए स्थायी सदस्यों में से कोई भी वीटो न करे। ब्रिटेन और फ्रांस इसका विरोध अवश्य करेंगे क्योंकि वे ऐसे राज्य की सदस्यता का समर्थन नहीं करेंगे जिसकी उन्होंने द्विपक्षीय तौर पर मान्यता नहीं दी है। यदि संयुक्त राज्य अमेरिका का वोट मिलता है तो फिलीस्तीन के पास दूसरा विकल्प आ जाएगा, यद्यपि इससे पूर्ण सदस्यता प्राप्त नहीं होगी। वे महासभा में प्रस्ताव रख सकते हैं, और प्रस्तुत करने के 48 घंटों में वोट डाले जा सकते हैं, यद्यपि इसे आम बहस के लिए सितंबर के उत्तरार्द्ध या अक्टूबर के पूर्वार्द्ध तक लम्बितं किया जा सकता है; यह बातचीत के लिए अधिक समय प्रदान करेगा जिससे इसे अधिक समर्थन मिल सके, विशेष रूप से यूरोपीय संघ से अनुमोदन के लिए उपस्थित लोगों के साधारण बहुमत की आवश्यकता होगी। इस स्थिति में कोई मतदान नहीं होगा। संयोगवश, 31 अक्टूबर, 2011 को फिलीस्तीन संयुक्त राष्ट्र सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अभिकरण (यूनेस्को) का पूर्ण सदस्य बन गया। 29 नवम्बर, 2012 को यूएनजीए ने फिलीस्तीन को एक राज्य के तौर मान्यता देने के पक्ष में मतदान किया। प्रस्ताव ने फिलीस्तीन की प्रस्थिति की नॉन मैम्बर ऑब्जर्वर एन्टीटी से उन्नत कर नॉन मेम्बर ऑब्जर्वर स्टेट कर दिया यह महासभा में मतदान नहीं कर सकता लेकिन अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय जैसे अंतर्राष्ट्रीय निकाय में शामिल हो सकता है। भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ भारत, संयुक्त राष्ट्र के उन प्रारंभिक सदस्यों में शामिल था जिन्होंने 1 जनवरी, 1942 को वाशिंग्टन में संयुक्त राष्ट्र घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे तथा 25 अप्रैल से 26 जून, 1945 तक सेन फ्रांसिस्को में ऐतिहासिक संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय संगठन सम्मेलन में भी भाग लिया था। संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत, संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों और सिद्धांतों का पुरजोर समर्थन करता है और चार्टर के उद्देश्यों को लागू करने तथा संयुक्त राष्ट्र के विशिष्ट कार्यक्रमों और एजेंसियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण राजनीतिक स्वतंत्रता और रंगभेद स्वतंत्र भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी सदस्यता को अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखने की एक महत्वपूर्ण गारंटी के रूप में देखा। भारत, संयुक्त राष्ट्र के उपनिवेशवाद और रंगभेद के विरूद्ध संघर्ष के अशांत दौर में सबसे आगे रहा। भारत औपनिवेशिक देशों और कौमों को आजादी दिए जाने के संबंध में संयुक्त राष्ट्र की ऐतिहासिक घोषणा 1960 का सह-प्रायोजक था जो उपनिवेशवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों को बिना शर्त समाप्त किए जाने की आवश्यकता की घोषणा करती है। भारत राजनीतिक स्वतंत्रता समिति की समिति का पहला अध्यक्ष भी निर्वाचित हुआ था जहां उपनिवेशवाद की समाप्ति के लिए उसके अनवरत प्रयास रिकार्ड पर हैं। भारत, दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद और नस्लीय भेदभाव के सर्वाधिक मुखर आलोचकों में से था वस्तुत भारत संयुक्त राष्ट्र (1946 में) में इस मुद्दे को उठाने वाला पहला देश था और रंगभेद के विरूद्ध आम सभा द्वारा स्थापित उप समिति के गठन में अग्रणी भूमिका निभाई थी। जब 1965 में सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन से संबंधित कन्वेंशन पारित किया गया था, भारत सबसे पहले हस्ताक्षर करने वालों में शामिल था। गुट निरपेक्ष आंदोलन और समूह-77 के संस्थापक सदस्य के रूप में संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में भारत की हैसियत, विकासशील देशों के सरोकारों और आकांक्षाओं तथा अधिकाधिक न्यायसंगत अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना के अग्रणी समर्थक के रूप में मजबूत हुई समकालीन प्राथमिकताएँ संयुक्त राष्ट्र सुधार, सतत विकास, आतंकवादरोध एवं निरस्त्रीकरण भारत को दृढ़ विश्वास है कि सयुंक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के आदर्श जिसका उसने पोषण किया है, आज की वैश्विक चुनौतियों का मुकाबला करने के सर्वाधिक प्रभावी साधन बने हुए हैं। भारत, हमारे सामने आ रही सभी समस्याओं के व्यापक और न्यायोचित समाधान के लिए बहुपक्षवाद की भावना से राष्ट्रों की समिति के साथ कार्य करने के अपने प्रयासों में अडिग है। इन समस्याओं में विकास और गरीबी उन्मूलन, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, समुद्री डकैती, निरस्त्रीकरण, शांति स्थापना और मानवाधिकार शामिल हैं। भारत यह सुनिश्चित करने के लिए समान विचारधारा वाले देशों के साथ सहयोग कर रहा है कि सतत् विकास पर चर्चा गरीबी उन्मूलन पर केंद्रित रहे और कि 2015 के पश्चात विकास की कार्यसूची को मूर्त रूप प्रदान करने से संबंधित वैश्विक संवाद में आरटीओ सिद्धांत अटल रहें। भारत समान और साझा किंतु अलग- अलग जिम्मेदारी के सिद्धांतों के आधार पर एक व्यापक, न्यायोचित और संतुलित परिणाम के जरिए जलवायु परिवर्तन के समाधान के लिए प्रतिबद्ध है। भारत सभी प्रकार के आतंकवाद के प्रति 'पूर्ण असहिष्णुता' के दृष्टिकोण का समर्थन करता रहा है। आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक व्यापक कानूनी रूपरेखा प्रदान करने के उद्देश्य से भारत ने 1996 में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के संबंध में व्यापक कन्वेंशन का मसौदा तैयार करने की पहल की थी और उसे शीघ्र अति शीघ्र पारित किए जाने के लिए कार्य कर रहा है। शांति स्थापना और निरस्त्रीकरण, संयुक्त राष्ट्र के अत्यधिक विशेष प्रयासों में शामिल है क्योंकि वे इस दुनिया को बेहतर स्थान बनाने के लिए संगठन के आश्वासन और सहज संभावना को साकार करते हैं। 43 शांति स्थापना अभियानों में भागीदारी के साथ भारत का संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना अभियानों में भागीदारी का गौरवशाली इतिहास रहा है और यह 1950 के दशक से ही इस अभियानों में शामिल होता रहा है। भारत, परमाणु हथियारों से संपन्न एक मात्र ऐसा राष्ट्र है जो परमाणु हथियारों को प्रतिबंधित करने और उन्हें समाप्त करने के लिए परमाणु अस्त्र कन्वेंशन की स्पष्ट रूप से मांग करता रहा है। भारत समयबद्ध, सार्वभौमिक, निष्पक्ष, चरणबद्ध और सत्यापन योग्य रूप में परमाणु हथियारों से मुक्त दुनिया का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है जैसा कि सन् 1998 में आम सभा के निरस्त्रीकरण से संबंधित विशेष अधिवेशन में पेश की गई राजीव गांधी कार्य योजना में प्रतिबिम्बित होता है। सन्दर्भ श्रेणी:संयुक्त राष्ट्र श्रेणी:भारत सम्बन्ध