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अब्दुल्लाह बिन रवाहा
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अब्दुल्लाह बिन रवाहा عبد الله بن رواحة ar عبد الله بن رواحة.png अब्दुल्लाह बिन रवाहा का अरबी सुलेख (कैलीग्राफी) में नाम यथरिब (मदीना), अरब (वर्तमान सउदी अरब) 629 ई. (8 हिजरी) मुताह, सीरिया (वर्तमान जॉर्डन) कवि, योद्धा, इस्लामी पैगंबर मुहम्मद के सहाबी इस्लाम 'अक़बा की दूसरी बैअत' में भागीदारी, इस्लामी कविताएं, और मुताह के युद्ध में सैन्य नेतृत्व
अब्दुल्लाह बिन रवाहा (عبد الله بن رواحة; मृत्यु 629 ईस्वी) इस्लाम के प्रारंभिक इतिहास के एक प्रमुख व्यक्ति, पैगंबर मुहम्मद के प्रसिद्ध सहाबी (साथी) और एक विख्यात अरबी कवि थे। वे मदीना के अंसार (स्थानीय निवासी) समुदाय से थे और प्रतिष्ठित बनू खज़रज (Banu Khazraj) कबीले से संबंध रखते थे। इस्लाम के उदय के समय वे मदीना के उन गिने-चुने लोगों में से एक थे जो लिखना-पढ़ना जानते थे।Hassan Muhammad Raji 2012 Ensiklopedia Biografi Sahabat Nabi Penerbit Zaman Jakarta 978-979-024-295-1
प्रारंभिक जीवन और इस्लाम में प्रवेश
अब्दुल्लाह बिन रवाहा मदीना के उन शुरुआती लोगों में से थे जिन्होंने इस्लाम स्वीकार किया था। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार, वे उन 73 अंसारों में शामिल थे जिन्होंने मक्का की गुप्त यात्रा की थी और 'अक़बा की दूसरी बैअत' (The Second ‘Aqabah Pledge) में भाग लेकर पैगंबर मुहम्मद के प्रति अपनी निष्ठा की शपथ ली थी।http://www.sunnipath.com/Resources/PrintMedia/Books/B0033P0017.aspx SunniPath Library - Books - Ar-Raheeq Al-Makhtum - The Second ‘Aqabah Pledge www.sunnipath.com 2026-03-08 इस ऐतिहासिक अवसर पर, पैगंबर ने मदीना के लोगों को इस्लाम की शिक्षा देने और उनका नेतृत्व करने के लिए 12 प्रतिनिधियों (नकीब) का चुनाव किया था, जिनमें से एक अब्दुल्लाह बिन रवाहा भी थे।
पैगंबर के कवि के रूप में भूमिका
अब्दुल्लाह बिन रवाहा एक अत्यंत कुशाग्र और प्रभावशाली कवि थे। मदीना में इस्लामी राज्य की स्थापना के बाद, उन्होंने अपनी कविता का उपयोग इस्लामी संदेशों के प्रसार, मुसलमानों का मनोबल बढ़ाने और विरोधियों के दावों का कड़ा उत्तर देने के लिए किया। उन्हें हस्सान बिन साबित (Hassan ibn Thabit) और काब बिन मालिक के साथ पैगंबर मुहम्मद के तीन प्रमुख कवियों में गिना जाता था।
उनकी कविताओं में इस्लामी आस्था, आध्यात्मिक गहराई और कुरैश (मक्का के विरोधियों) के विरोध का मुखर वर्णन मिलता था। 7 हिजरी में जब मुसलमान शांतिपूर्ण 'उमरतुल कज़ा' (Umrah al-Qada) के लिए मक्का में प्रवेश कर रहे थे, तो अब्दुल्लाह बिन रवाहा पैगंबर के आगे-आगे चल रहे थे और पूरे उत्साह के साथ अपनी कविताएँ पढ़ रहे थे।
सैन्य अभियान
अब्दुल्लाह बिन रवाहा ने इस्लाम के प्रारंभिक दौर के रक्षात्मक और प्रमुख युद्धों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने बद्र का युद्ध, उहुद का युद्ध, खंदक (अहज़ाब) और खैबर के अभियानों में सक्रिय रूप से भाग लिया। खैबर की विजय के बाद, पैगंबर मुहम्मद ने उन्हें खैबर के खजूरों और फसलों की उपज का अनुमान लगाने (मूल्यांकन) के महत्वपूर्ण कार्य के लिए नियुक्त किया था, जिसे उन्होंने अत्यंत न्याय और ईमानदारी के साथ निभाया।
मुताह का युद्ध और शहादत
अब्दुल्लाह बिन रवाहा का सबसे महान और अंतिम सैन्य योगदान 629 ईस्वी (8 हिजरी) में लड़े गए 'मुताह के युद्ध' (Battle of Mu'tah) में सामने आया। इस अभियान के लिए पैगंबर मुहम्मद ने बाज़न्तीनी (Byzantine) और गस्सानिद (Ghassanid) साम्राज्य की विशाल सेना का सामना करने के लिए तीन कमांडरों को क्रमानुसार नियुक्त किया था: ज़ैद बिन हारिसा, जाफ़र इब्न अबी तालिब (जिन्हें जाफ़र अल-तय्यार भी कहा जाता है), और उनके बाद अब्दुल्लाह बिन रवाहा।https://al-islam.org/jafar-al-tayyar-kamal-al-sayyid/jafar-al-tayyar Jafar al-Tayyar 2013-01-21 al-islam.org en 2026-03-08
मुताह पहुँचने पर जब 3,000 मुस्लिम सैनिकों को यह पता चला कि उनके सामने बाज़न्तीनी साम्राज्य की एक लाख से अधिक की विशाल सेना है, तो वे कुछ समय के लिए रुक कर रणनीति पर विचार करने लगे। उस निर्णायक क्षण में, अब्दुल्लाह बिन रवाहा ने सेना का मनोबल बढ़ाते हुए एक ऐतिहासिक भाषण दिया:
"ऐ लोगों! तुम जिस चीज़ से कतरा रहे हो, वह वही शहादत है जिसकी तलाश में तुम यहाँ आए हो। हम दुश्मनों से हथियारों या संख्या के बल पर नहीं लड़ते, बल्कि हम उस धर्म के बल पर लड़ते हैं जिससे अल्लाह ने हमें सम्मानित किया है।"
युद्ध के दौरान जब पहले दो कमांडर (ज़ैद और जाफ़र) बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए, तो अब्दुल्लाह बिन रवाहा ने इस्लामी ध्वज संभाला। सामने निश्चित मृत्यु को देखकर जब एक क्षण के लिए उन्हें मानवीय झिझक महसूस हुई, तो उन्होंने अपने मनोबल को दृढ़ करने के लिए स्वयं को संबोधित करते हुए एक प्रसिद्ध कविता पढ़ी थी, जिसका अर्थ था: "ऐ मेरी आत्मा, मृत्यु तो अपरिहार्य है, इसलिए बेहतर है कि तुम शहीद हो जाओ।"http://www.islamic-council.org/lib/men/ABD-ALLAH-IBN-RAWAAHAH.html Default Normal Template www.islamic-council.org 2026-03-08 30 जून 2006 https://web.archive.org/web/20060630073952/http://www.islamic-council.org/lib/men/ABD-ALLAH-IBN-RAWAAHAH.html dead
अत्यंत बहादुरी से लड़ते हुए वे भी इस युद्ध में मारे गए। उनकी शहादत के बाद, खालिद बिन वलीद (Khalid ibn al-Walid) ने सेना की कमान संभाली और बचे हुए सैनिकों को सुरक्षित वापस निकाला। अब्दुल्लाह बिन रवाहा का नाम इस्लामी इतिहास में एक महान कवि, सच्चे आस्तिक और बहादुर कमांडर के रूप में सम्मान के साथ लिया जाता है।
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
विकिडाटा पर अब्दुल्लाह बिन रवाहा (Q1111126)
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