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फिजी का इतिहास
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इतिहास
फिजी के पहले निवासियों का आगमन यूरोपीय अन्वेषकों से बहुत पहले ही हो गया था जो कि सत्रहवीं शताब्दी में फिजी आये थे। मिट्टी के बर्तनों की खुदाई से पता चलता है कि 1000 ई.पू के आसपास भी फिजी में निवासी रहा करते थे, हालाँकि अभी भी उनके फिजी प्रवास के विषय मे कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। डच अन्वेषक हाबिल टैस्मान सन 1643 में जब दक्षिणी महाद्वीप की तलाश में निकले थे तब उन्होनें फिजी का दौरा किया था। उन्नीसवीं सदी तक यूरोपीय स्थायी रूप से द्वीप पर नहीं बसे थे।
1874 में ब्रिटेन ने इस द्वीप को अपने नियंत्रण मे लेकर इसे अपना एक उपनिवेश बना लिया। ब्रिटिश लोग भारतीय मजदूरों को यहाँ ठेके पर गन्ने के खेतों में काम करने के लिये ले आये। सन 1970 में इस देश को ब्रिटेन ने स्वतंत्रता दी। सन 1987 में देश का लोकतांत्रिक शासन दो सैन्य विद्रोहों से बाधित हुआ क्योंकि पहले तख्तापलट में ऐसा माना गया की तत्कालीन सरकार मे भारतीय फ़ीजियों का प्रभुत्व था तथा दूसरे में ब्रिटिश राजशाही और गवर्नर जनरल की जगह एक गैर कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति हुई। इसके बाद देश का नाम परिवर्तित करके 'फिजी गणराज्य' कर दिया गया (1997 में इसे बदलकर फ़िजी द्वीप समूह गणराज्य कर दिया गया)। इस तख्तापलट के कारण भारतीयों ने बडी़ संख्या मे देश छोड़ दिया जिसके परिणामस्वरूप मेलानेशियाई लोगों का बहुमत हो गया।
thumb|left|लेवुका, 1842.
1990 में नए संविधान के द्वारा राजनीतिक व्यवस्था मे फिजी मूल के लोगों का वर्चस्व स्थापित किया गया। रंगभेद विरोधी समूह (GARD) का गठन एकतरफा थोपे गये संविधान का विरोध करने और 1970 के संविधान की बहाली के लिये किया गया। 1987 के तख्तापलट को अंजाम देने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल सितिवेनी रेबूका नए संविधान के तहत हुये चुनाव के बाद 1992 में प्रधानमंत्री बने। तीन साल बाद, सितिवेनी रेबूका ने संविधान समीक्षा आयोग की स्थापना की, जिसके फलस्वरूप 1997 में एक नया संविधान अस्तित्व में आया साथ ही इस संविधान को फिजी भारतीय और फिजी स्वदेशी समुदायों के नेताओं का समर्थन भी मिला। फिजी को एक बार फिर से राष्ट्रमंडल के एक राष्ट्र के रूप में सवीकृति मिल गयी।
नई सहस्राब्दी में देश ने फिर ने फिर से एक तख्तापलट देखा। इस तख्तापलट में जॉर्ज स्पीट ने तत्कालीन प्रधान मंत्री महेंद्र चौधरी, की सरकार को उखाड़ फेंका जो 1997 के संविधान के बाद निर्वाचित हुयी थी। कमोडोर फ्रैंक बैनीमरामा ने राष्ट्रपति मारा के इस्तीफे जो संभवतः मजबूरी में दिया गया था के बाद कार्यकारी शक्ति ग्रहण कर लीं। सन 2000 में सुवा की महारानी एलिजाबेथ बैरकों में हुए दो सैनिक विद्रोहों ने फिजी को हिला कर रख दिया जब विद्रोही सैनिकों ने शहर में हुड़दंग मचा दिया। उच्च न्यायालय ने संविधान की बहाली का आदेश दिया और, सितंबर 2001 में, लोकतंत्र को बहाल करने के लिए आम चुनाव आयोजित किये गये, जो अंतरिम प्रधानमंत्री लेसीनिया करासे की सोकोसोको दुआवाता नी लेवेनिवानुआ पार्टी ने जीते।
सन 2005 में, बहुत विवादों के बीच, करासे सरकार ने एकता आयोग बनाने का एक प्रस्ताव रखा जिसके अन्तर्गत सन 2000 के तख्तापलट के पीड़ितों को मुआवजा दिलाने के साथ इसके उत्तरदायी लोगों के लिए माफी की सिफारिश की गयी थी। इस प्रस्ताव का सेना और विशेष रूप से सेना के कमांडर फ्रैंक बैनीमारामा ने पुरजोर विरोध किया। फ्रैंक बैनीमारामा ने आलोचकों के साथ सहमति जताई कि वर्तमान सरकार के समर्थकों जिन्होने तख्तापलट में एक निर्णायक भूमिका निभाई को क्षमा दान देना अनुचित है। उन्होने सरकार पर अपने हमले मई से जुलाई तक लगातार जारी रखे जिसके कारण उनके संबंध सरकार से जो पहले से तनावपूर्ण थे और तनावपूर्ण हो गये। नवम्बर 2006 के अंत और दिसम्बर, 2006 के शुरू में, तख्तापलट फिजी d' état के लिये बैनीमारामा मुख्य रूप से उत्तरदायी था। बैनीमारामा ने अपनी मांगों की सूची करासे सरकार को सोंप दी जिसके बाद करासे सरकार संसद में एक विधेयक लेकर आयी जिसमे 2000 में तख्तापलट के प्रयास मे शामिल लोगों को क्षमादान देने की पेशकश की गयी थी। उस ने करासे को 4 दिसम्बर तक इन माँगों को स्वीकार करने या अपने पद से इस्तीफा देने का अल्टीमेटम दे दिया। करासे ने माँगों को स्वीकार करने या इस्तीफा देने से साफ् इनकार कर दिया। 5 दिसम्बर को राष्ट्रपति रातु जोसेफा इलोइलो, जिन्होने बैनीमारामा से मुलाकात के बाद संसद भंग करने के एक कानूनी आदेश पर हस्ताक्षर कर दिये।
अपने आकार के हिसाब से, फिजी का सशस्त्र बलों का बेड़ा काफी बड़ा है और संयुक्त राष्ट्र के दुनिया के विभिन्न भागों में चल रहे शांति अभियानों मे इसने प्रमुख योगदान दिया है। इसके अलावा, इराक में 2003 के अमेरिकी नेतृत्व वाले आक्रमण के बाद इसके कई भूतपूर्व सैनिक इराक के सुरक्षा क्षेत्र की सेवा मे तैनात हैं।