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वर पाद प्रक्षालन
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thumb|alt=आशीर्वाद दिमित्री इवानोविच, 1919, अलेक्जेंड्र नोवोस्कोल'सीव द्वारा |आशीर्वाद दिमित्री इवानोविच, 1919, अलेक्जेंड्र नोवोस्कोल'सीव द्वारा
हिन्दू धर्म में; सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें। पति-पत्नी इन सन्भ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं। यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है। विवाह संस्कार में देव पूजन, यज्ञ आदि से सम्बन्धित सभी व्यवस्थाएँ पहले से बनाकर रखनी चाहिए।
विशेष व्यवस्था
विवाह संस्कार में देव पूजन, यज्ञ आदि से सम्बन्धित सभी व्यवस्थाएँ पहले से बनाकर रखनी चाहिए। सामूहिक विवाह हो, तो प्रत्येक जोड़े के हिसाब से प्रत्येक वेदी पर आवश्यक सामग्री रहनी चाहिए, कमर्काण्ड ठीक से होते चलें, इसके लिए प्रत्येक वेदी पर एक-एक जानकार व्यक्ति भी नियुक्त करना चाहिए। एक ही विवाह है, तो आचार्य स्वयं ही देख-रेख रख सकते हैं। सामान्य
व्यवस्था के साथ जिन वस्तुओं की जरूरत विशेष कमर्काण्ड में पड़ती है, उन पर प्रारम्भ में दृष्टि डाल लेनी चाहिए। उसके सूत्र इस प्रकार हैं। वर सत्कार के लिए सामग्री के साथ एक थाली रहे, ताकि हाथ, पैर धोने की क्रिया में जल फैले नहीं। मधुपर्क पान के बाद हाथ धुलाकर उसे हटा दिया जाए।
यज्ञोपवीत के लिए पीला रंगा हुआ यज्ञोपवीत एक जोड़ा रखा जाए। विवाह घोषणा के लिए वर-वधू पक्ष की पूरी जानकारी पहले से ही नोट कर ली जाए।
वस्त्रोपहार तथा पुष्पोपहार के वस्त्र एवं मालाएँ तैयार रहें। कन्यादान में हाथ पीले करने की हल्दी, गुप्तदान के लिए गुँथा हुआ आटा (लगभग एक पाव) रखें। ग्रन्थिबन्धन के लिए हल्दी, पुष्प, अक्षत, दुर्वा और द्रव्य हों। शिलारोहण के लिए पत्थर की शिला या समतल पत्थर का एक टुकड़ा रखा जाए। हवन सामग्री के अतिरिक्त लाजा (धान की खीलें) रखनी चाहिए। वर-वधू के पद प्रक्षालन के लिए परात या थाली रखे जाए। पहले से वातावरण ऐसा बनाना चाहिए कि संस्कार के समय वर और कन्या पक्ष के अधिक से अधिक परिजन, स्नेही उपस्थित रहें। सबके भाव संयोग से कमर्काण्ड के उद्देश्य में रचनात्मक सहयोग मिलता है। इसके लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही ढंग से आग्रह किए जा सकते हैं। विवाह के पूर्व यज्ञोपवीत संस्कार हो चुकता है। अविवाहितों को एक यज्ञोपवीत तथा विवाहितों को जोड़ा पहनाने का नियम है। यदि यज्ञोपवीत न हुआ हो, तो नया यज्ञोपवीत और हो गया हो, तो एक के स्थान पर जोड़ा पहनाने का संस्कार विधिवत् किया जाना चाहिए। अच्छा हो कि जिस शुभ दिन को विवाह-संस्कार होना है, उस दिन प्रातःकाल यज्ञोपवीत धारण का क्रम व्यवस्थित ढंग से करा दिया जाए। विवाह-संस्कार के लिए सजे हुए वर के वस्त्र आदि उतरवाकर यज्ञोपवीत पहनाना अटपटा-सा लगता है। इसलिए उसको पहले ही पूरा कर लिया जाए। यदि वह सम्भव न हो, तो स्वागत के बाद यज्ञोपवीत धारण करा दिया जाता है। उसे वस्त्रों पर ही पहना देना चाहिए, जो संस्कार के बाद अन्दर कर लिया जाता है। जहाँ पारिवारिक स्तर के परम्परागत विवाह आयोजनों में मुख्य संस्कार से पूर्व द्वारचार (द्वार पूजा) की रस्म होती है, वहाँ यदि हो-हल्ला के वातावरण को संस्कार के उपयुक्त बनाना सम्भव लगे, तो स्वागत तथा वस्त्र एवं पुष्पोपहार वाले प्रकरण उस समय भी पूरे कराये जा सकते हैं विशेष आसन पर बिठाकर वर का सत्कार किया जाए। फिर कन्या को बुलाकर परस्पर वस्त्र और पुष्पोपहार सम्पन्न कराये जाएँ। परम्परागत ढंग से दिये जाने वाले अभिनन्दन-पत्र आदि भी उसी अवसर पर दिये जा सकते हैं। इसके कमर्काण्ड का संकेत आगे किया गया है। पारिवारिक स्तर पर सम्पनन किये जाने वाले विवाह संस्कारों के समय कई बार वर-कन्या पक्ष वाले किन्हीं लौकिक रीतियों के लिए आग्रह करते हैं। यदि ऐसा आग्रह है, तो पहले से नोट कर लेना-समझ लेना चाहिए। पारिवारिक स्तर पर विवाह-प्रकरणों में वरेच्छा, तिलक (शादी पक्की करना), हरिद्रा लेपन (हल्दी चढ़ाना) तथा द्वारपूजन आदि के आग्रह उभरते हैं। उन्हें संक्षेप में दिया जा रहा है, ताकि समयानुसार उनका निवार्ह किया जा सके।
इसी संस्कार का बीसवां चरण है वर पाद प्रक्षालन।
पाद प्रक्षालन
आसन परिवतर्न के बाद गृहस्थाश्रम के साधक के रूप में वर-वधू का सम्मान पाद
प्रक्षालन करके किया जाता है। कन्या पक्ष की ओर प्रतिनिधि स्वरूप कोई
दम्पति या अकेले व्यक्ति पाद प्रक्षालन करे। पाद प्रक्षालीन करने वालों
का पवित्रीकरण-सिंचन किया जाए। हाथ में हल्दी, दूवार्, थाली में जल लेकर
प्रक्षालन करें। प्रथम मन्त्र के साथ तीन बार वर-वधू के पैर पखारें, फिर
दूसरे मन्त्र के साथ यथा श्रद्धा भेंट दें।
ॐ या ते पतिघ्नी प्रजाध्नी पशुघ्नी, गृहघ्नी यशोघ्नी निन्दिता,
तनूजार्रघ्नीं ततऽएनांकरोमि, सा जीयर् त्वां मया सह॥ -पार०गृ०सू० १.११
ॐ ब्रह्मणा शालां निमितां, कविभिनिर्मितां मिताम्। इन्द्राग्नी रक्षतां
शालाममृतौ सोम्यं सदः॥ -अथवर्० ९.३.१९
ध्रुव-सूर्य ध्यान
ध्रुव स्थिर तारा है। अन्य सब तारागण गतिशील रहते हैं, पर ध्रुव अपने
निश्चित स्थान पर ही स्थिर रहता है। अन्य तारे उसकी परिक्रमा करते हैं।
ध्रुव दर्शन का अर्थ है- दोनों अपने-अपने परम पवित्र कर्त्तव्यों पर उसी
तरह दृढ़ रहेंगे, जैसे कि ध्रुव तारा स्थिर है। कुछ कारण उत्पन्न होने पर
भी इस आदर्श से विचलित न होने की प्रतिज्ञा को निभाया जाए, व्रत को पाला
जाए और संकल्प को पूरा किया जाए। ध्रुव स्थिर चित्त रहने की ओर, अपने
कर्त्तव्यों पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देता है। इसी प्रकार सूर्य की अपनी
प्रखरता, तेजस्विता, महत्ता सदा स्थिर रहती है। वह अपने निधार्रित पथ्ा
पर ही चलता है, यही हमें करना चाहिए। यही भावना पति-पत्नी करें।
सूर्य ध्यान (दिन में)
ॐ तच्चक्षुदेर्वहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शतं, जीवेम
शरदः शतं, शृणुयाम शरदः शतं, प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः, स्याम शरदः शतं,
भूयश्च शरदः शतात्। -३६.२४
ध्रुव ध्यान (रात में)
ॐ ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि, ध्रुवैधि पोष्ये मयि। मह्यं त्वादात्
बृहस्पतिमर्यापत्या, प्रजावती संजीव शरदः शतम्। -पार०गृ०सू० १.८.१९
अगला कार्यक्रम
इससे अगला कार्यक्रम या चरण है विवाह शपथ आश्वासन।
अन्य चरण
इसी प्रकार हिन्दू विवाह के बाईस चरण होते हैं। इन सभी चरणों के बाद हिन्दू विवाह पूर्ण होता है।
इन्हें भी देखें
बाहरी कड़ियाँ
[https://web.archive.org/web/20170924010059/http://hindi.awgp.org/?gayatri%2FAWGP_Offers%2Fparivar_nirman%2Fsanskar%2Fmerriage%2F
गायत्री शांतिकुंज की ओर से]
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