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वज्जिका भाषा और साहित्य
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वज्जिका उत्तर बिहार के उस क्षेत्र की भाषा है जहाँ भगवान महावीर और बुद्ध की जन्मभूमि एवं कर्मभूमि थी तथा प्रथम गणतंत्रात्मक वज्जिसंघ का राज्य था। अत: वज्जिका की प्राचीनता एवं गरिमा वैशाली गणतंत्र के साथ जुड़ी हुई है और शायद इसका पतन भी वैशाली के पतन के साथ ही साथ ही गया। यह भाषा लोककंठ में ही जीवित रही है, लिखित साहित्य के रूप में नहीं। या ऐसा भी संभव है कि इसका लिखित साहित्य विनष्ट हो गया हो, जैसा प्राकृत अपभ्रंश के बहुतेरे ग्रंथों के साथ हुआ। वज्जिका के स्वरूप का दर्शन बौद्ध-जैन-साहित्य से लेकर संतसाहित्य तक देखा जा सकता है।
परिचय
इस भाषा के स्वतंत्र अस्तित्व की ओर संकेत करनेवाले राहुल सांकृत्यायन थे, जिन्होंने अपने लेख "मातृभाषाओं की समस्या" में भोजपुरी, मैथिली, मगही और अंगिका के साथ-साथ वज्जिका को हिंदी के अंतर्गत जनपदीय भाषा के रूप में स्वीकृत किया (पुरातत्व निबंधावली, पृ. 12, 241)। ग्रियर्सन ने कभी इसे "पश्चिमी मैथिली" कहा, कभी "मैथिल भोजपुरी"। ग्रियर्सन ने स्थूल दृष्टि से वज्जिका के क्रियापदों में "छ" देखकर इसे मैथिली समझ लिया। लेकिन वज्जिका और मैथिली के इस क्रियापद में अंतर है; जैसे - आवि रहल अछि (मैथिली) अबइछी (वज्जिका) और जहाँ इस क्रियापद का प्रयोग मैथिली में भूत और वर्तमान काल में होता हैं वहाँ वज्जिका में केवल वर्तमान काल में ही। फिर, क्रियापदों का छयुक्त रूप से भिन्न रूप देखकर उन्होंने भोजपुरी मान लिया। लेकिन उन्हें कहाँ पता था कि भोजपुरी भाषा में बहुवचनबोध चिह्र या प्रत्यय नि, न, न्ह होते हैं परंतु वज्जिका में नि के स्थान पर "नी" का प्रयोग होता है तथा अन्य दोनों चिह्र एकदम नहीं पाए जाते। फिर वे आगे लिखते हैं - "मैंने सेवेन ग्रामर्स ऑव दि बिहारी लैंग्वेजेज, भाग दो में इसे भोजपुरी का एक भेद बताया था, किंतु वर्तमान सर्वेक्षण में इसे मैथिली की विभाषा इसलिए बता रहा हूँ कि जिस क्षेत्र में वह बोली जाती है वह ऐतिहासिक दृष्टि से प्राचीन मिथिला राज्य के अंतर्गत है।"
डॉ॰ जयकांत मिश्र और डॉ॰ उदयनारायण तिवारी ने क्रमश: मैथिली और भोजपुरी में चार-चार रूपों को स्वीकार किया है- अतिह्रस्व, ह्रस्व, अतिदीर्घ, दीर्घ; जैसे घोर, घोरा, घोरवा और घोरउआ। लेकिन वज्जिका में अतिह्रस्व और अतिदीर्घ दोनों ही रूप नहीं पाए जाते। इस प्रकार इस भाषा की प्रकृति परवर्ती भाषाओं के साथ कुछ मेल खाते हुए भी एकदम भिन्न है। इस भाषा के स्वतंत्र अस्तित्व और सत्ता को स्वीकार करते हुए जगदीशचंद्र माथुर और गणेश चौबे ने तो यहाँ तक कहा है कि थारू भाषा भी वज्जिका ही है। डॉ॰ सियाराम तिवारी के अनुसार वज्जिका क्षेत्र के उत्तर में नेपाल, दक्षिण में गंगा नदी, पश्चिम में सारण और चंपारण के भाग और पूर्व में दरभंगा जिला है।
साहित्य
इस भाषा में गयाधर, हलदर दास, मँगनीराम आदि की कुछ रचनाएँ प्राप्त हुई हैं, जहाँ से वज्जिका भाषा का साहित्य प्रारंभ होता है। गयाधर का रचनाकाल 1045 ई. माना जाता है। ये वैशाली के रहनेवाले थे और बौद्ध-धर्म के प्रचारार्थ तिब्बत गए थे। इनकी कोई ठोस रचना अभी नहीं मिली है। हलधर दास का समय 1565 ई. ठहराता है, जिनका लिखा हुआ एक खंडकाव्य सुदामाचरित्र प्राप्त है, जो संपूर्ण वज्जिका में लिखा गया है। कहा जाता है इन्होंने बहुत सी रचनाएँ वज्जिका में की थीं। लेकिन अभी और कोई रचना इनकी मिली नहीं है। मँगनीराम का जीवनकाल 1815 ई. के आसपास माना जाता है जिनकी तीन पुस्तकें - मँगनीराम की साखी, रामसागर पोथी और अनमोल रतन - मिली हैं। इनके अलावा इनके भजन और साखी जनता में प्रचलित हैं, जिनका संकलन संपादन अभी नहीं हो पाया है।
वज्जिका भाषा के साहित्य का दूसरा अध्याय 20वीं शताब्दी से शुरु होता है। इस काल में बहुत सी रचना साहित्य के विभिन्न अंगों पर लिखी गई हैं और लिखी जा रही हैं। रामसंजीवन सिंह द्वारा लिखित बुद्ध वैशालिक वज्जिका भाषा का सरस एवं सफल काव्य है, जो वज्जिका भाषा की काव्यात्मकता की सफलता का द्योतक है। डॉ॰ अजितनारायण सिंह तोमर का कहानी संग्रह -"परछत के परमाण की" वज्जिका भाषासाहित्य की कहानी विधा को गौरवान्वित करता है।
श्रेणी:भारत की भाषाएँ