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411 समाचार
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मालती चौधरी

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मालती चौधरी ମାଳତୀ ଚୌଧୁରୀ ओड़िआ मालती सेन २६ जुलाई १९०४ पटना, बिहार, ब्रिटिश भारत १५ मार्च १९९८ ओड़िशा, भारत भारतीय विश्वभारती, शांतिनिकेतन स्वतंत्रता सेनानी, समाजसेवी, गांधीवादी कार्यकर्ता नबकृष्ण चौधरी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, किसान आंदोलन, प्रजामंडल आंदोलन, सामाजिक सेवा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत की संविधान सभा की सदस्य १९४६ १९५० ओड़िशा जमनालाल बजाज पुरस्कारराष्ट्रीय बाल कल्याण पुरस्कारउत्कल सेवा सम्मानटैगोर साक्षरता पुरस्कार मालती चौधरी (जन्म नाम मालती सेन; २६ जुलाई १९०४ – १५ मार्च १९९८) ओड़िशा की स्वतंत्रता सेनानी, गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता और भारत की संविधान सभा की सदस्य थीं। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ किसान, आदिवासी, महिला और ग्रामीण शिक्षा से संबंधित आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। वे राणपुर, ढेंकानाल, तालचेर और नीलगिरि सहित ओड़िशा की विभिन्न देशी रियासतों में चले प्रजामंडल आंदोलन से भी जुड़ी थीं।Malati Choudhury Azadi Ka Amrit Mahotsav संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार 5 August 2022Choudhury Janmejay Role of Malati Choudhury and Her Associates in Indian National Movement Orissa Review 2022 October Government of Odisha उन्होंने १९३० के नमक सत्याग्रह में इंचुड़ी और कुजंग में महिलाओं को संगठित किया तथा १९३० के दशक में किसान आंदोलनों और प्रजामंडल आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की। १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने गांधी का करो या मरो संदेश ओड़िशा के लोगों तक पहुँचाया और ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार होकर कारावास भोगा।Women in Freedom Movement of Odisha Orissa Review 2013 August-September Government of Odisha स्वतंत्रता के बाद उन्होंने सक्रिय सत्ता की राजनीति से अधिक ग्रामीण पुनर्निर्माण, वयस्क शिक्षा, आदिवासी कल्याण और सामाजिक सेवा को प्राथमिकता दी। उन्होंने बाजी राउत के नाम पर छात्रावास तथा उत्कल नवजीवन मंडल जैसी संस्थाओं के माध्यम से शिक्षा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में काम किया।Malati Choudhury Constitution of India ConstitutionofIndia.net प्रारंभिक जीवन और शिक्षा मालती चौधरी का जन्म २६ जुलाई १९०४ को पटना में हुआ था। उनके पिता कुमुद नाथ सेन पूर्वी बंगाल से आए बैरिस्टर थे। उनका निधन तब हो गया था जब मालती लगभग ढाई वर्ष की थीं। उनकी माता स्नेहलता सेन लेखिका और शिक्षिका थीं तथा उन्होंने ही मालती का पालन-पोषण किया। उनका परिवार सामाजिक और राजनीतिक रूप से जागरूक था। पारिवारिक वातावरण और तत्कालीन राष्ट्रीय घटनाओं ने बचपन से ही उनके विचारों को प्रभावित किया। १९२१ में सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने शांतिनिकेतन स्थित विश्वभारती में प्रवेश लिया। वहाँ वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विचारों से प्रभावित हुईं। ठाकुर उन्हें स्नेहपूर्वक “मीनू” कहते थे। विश्वभारती में औपचारिक शिक्षा के साथ उन्होंने संगीत और नृत्य का भी अध्ययन किया। शांतिनिकेतन में उनकी मुलाकात नबाकृष्ण चौधरी से हुई। दोनों के विचारों में समानता थी और १९२७ में उनका विवाह हुआ। विवाह के बाद वे ओड़िशा में रहने लगीं और ग्रामीण समाज के बीच सामाजिक कार्य करने लगीं। स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश मालती चौधरी महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर दोनों के विचारों से प्रभावित थीं। विवाह के बाद उन्होंने अपने पति नबाकृष्ण चौधरी के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में काम करना शुरू किया। उनका प्रारंभिक कार्य ग्रामीण शिक्षा, स्वावलंबन और किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने से संबंधित था। १९३० में महात्मा गांधी के आह्वान पर शुरू हुए नमक सत्याग्रह में उन्होंने सक्रिय भाग लिया। बालेश्वर जिले के इंचुड़ी में हुए नमक सत्याग्रह तथा कुजंग क्षेत्र के आंदोलन में उन्होंने महिलाओं को संगठित किया। उनके प्रयासों से बड़ी संख्या में महिलाएँ अपने घरों से बाहर निकलकर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुईं।Women Participation in the Salt Satyagraha in Odisha Orissa Review 2018 August Government of Odisha उन्होंने विदेशी वस्तुओं की दुकानों के सामने धरना और बहिष्कार अभियान में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई। इस कारण उन्हें ब्रिटिश प्रशासन की कार्रवाई का सामना करना पड़ा और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वे कई बार गिरफ्तार हुईं। कांग्रेस सोशलिस्ट आंदोलन १९३० के दशक में मालती चौधरी और नबाकृष्ण चौधरी कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा से प्रभावित समूह से जुड़े। उन्होंने ओड़िशा में कांग्रेस सोशलिस्ट गतिविधियों के विस्तार में भूमिका निभाई। उन्होंने अपने पति के साथ मिलकर उत्कल कांग्रेस समाजवादी कर्मी संघ के संगठन में योगदान दिया, जो आगे चलकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की ओड़िशा शाखा से जुड़ा। उनका उद्देश्य राष्ट्रीय स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक समानता के प्रश्नों को भी आंदोलन का हिस्सा बनाना था। मालती चौधरी की राजनीति का विशेष पक्ष यह था कि उन्होंने किसान, मजदूर, आदिवासी और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों के प्रश्नों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया। किसान आंदोलन १९३० के दशक में मालती चौधरी ने ओड़िशा के किसानों की समस्याओं को लेकर सक्रिय अभियान चलाया। उन्होंने जमींदारों और साहूकारों द्वारा किसानों के शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई और किसानों को संगठित किया। वे कृषक आंदोलन के संगठन में सक्रिय थीं। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक यात्राएँ कीं और किसानों की सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियों का प्रत्यक्ष अध्ययन किया। किसान आंदोलन को उन्होंने केवल आर्थिक संघर्ष न मानकर स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना। उनके प्रयासों से ओड़िशा में किसान संगठन के विकास को बल मिला और जमींदारी व्यवस्था तथा किसानों के शोषण के विरुद्ध राजनीतिक चेतना बढ़ी। प्रजामंडल आंदोलन मालती चौधरी ने ओड़िशा की देशी रियासतों में चल रहे प्रजामंडल आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे विशेष रूप से ढेंकानाल, तालचेर और नीलगिरि रियासत में चल रहे जन आंदोलनों से जुड़ी थीं। ढेंकानाल में १२ सितंबर १९३८ को किसान आंदोलन शुरू हुआ। मालती चौधरी और नबाकृष्ण चौधरी ने इस आंदोलन के संगठन और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आंदोलन के प्रारंभिक चरण में बड़ी संख्या में किसान एकत्र हुए और रियासत के शासक के विरुद्ध अपनी माँगें रखीं। राज्य प्रशासन ने आंदोलन को दबाने के लिए दमनात्मक उपाय किए। आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई में अनेक लोग प्रभावित हुए और अंततः १२ वर्षीय बाजी राउत की हत्या ने पूरे आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कर दिया। मालती चौधरी ने दमन के बावजूद ढेंकानाल के गाँवों का दौरा जारी रखा और आंदोलनकारियों का मनोबल बनाए रखा। प्रजामंडल आंदोलन में उनकी भूमिका केवल किसी एक रियासत तक सीमित नहीं थी। उन्होंने विभिन्न रियासतों की जनता के बीच संपर्क और राजनीतिक चेतना विकसित करने में योगदान दिया। गांधी के साथ ओड़िशा में पदयात्रा १९३४ में महात्मा गांधी ने ओड़िशा के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया। मालती चौधरी इस यात्रा और गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों से निकटता से जुड़ी रहीं। उन्होंने अस्पृश्यता-निवारण, ग्रामीण पुनर्निर्माण और सामाजिक सुधार के गांधीवादी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में सहयोग किया। गांधीवादी रचनात्मक कार्यों के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण समाज में शिक्षा, स्वच्छता, महिला जागरूकता और सामाजिक समानता के लिए काम किया। बाद के वर्षों में भी गांधीवादी सामाजिक सेवा उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार बनी रही। भारत छोड़ो आंदोलन १९४२ में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने पर मालती चौधरी ओड़िशा के प्रमुख महिला नेताओं में शामिल थीं। वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के उस अधिवेशन में ओड़िशा का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिनिधियों में थीं, जिसमें भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित हुआ। अगस्त १९४२ में वे गांधी का करो या मरो संदेश लेकर ओड़िशा लौटीं और आंदोलन को सक्रिय बनाए रखने के लिए भूमिगत गतिविधियों में भी शामिल हुईं। ब्रिटिश प्रशासन ने कांग्रेस के अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था, इसलिए उन्होंने पुलिस की निगरानी से बचते हुए आंदोलनकारियों से संपर्क बनाए रखा। बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और कारावास की सजा दी गई। उपलब्ध स्रोतों में उनकी कारावास अवधि के संबंध में अलग-अलग विवरण मिलते हैं; ओड़िशा सरकार के एक शोध-लेख में उनके लगभग दो वर्ष तक कटक जेल में रहने का उल्लेख है, जबकि भारत सरकार के *आजादी का अमृत महोत्सव* स्रोत में १९४२ के आंदोलन के लिए तीन वर्ष की सजा का उल्लेख मिलता है। संविधान सभा १९४६ में मालती चौधरी को भारत की संविधान सभा के लिए ओड़िशा से चुना गया। वे संविधान सभा की महिला सदस्यों में से एक थीं। संसद के अभिलेखों में उनका नाम ९ दिसंबर १९४६ को संविधान सभा की पहली बैठक में उपस्थित महिला सदस्यों में दर्ज है।The Journal of Parliamentary Information Parliament of India 1998 September ओड़िशा से संविधान सभा के लिए १७ जुलाई १९४६ को चुने गए सदस्यों में मालती चौधरी भी शामिल थीं।Orissa and the Making of the Constitution Orissa Review 2016 November Government of Odisha हालाँकि संविधान निर्माण की संसदीय प्रक्रिया में उनकी सक्रिय भागीदारी सीमित रही। वे ग्रामीण जनता, किसानों और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के बीच प्रत्यक्ष कार्य को अधिक महत्वपूर्ण मानती थीं। बाद में उन्होंने संविधान सभा से इस्तीफा दे दिया और गांधीवादी सामाजिक कार्य को प्राथमिकता दी। स्वतंत्रता के बाद सामाजिक कार्य स्वतंत्रता के बाद मालती चौधरी ने सक्रिय सत्ता की राजनीति से दूरी बनाए रखी। उन्होंने ग्रामीण विकास, शिक्षा, महिला सशक्तीकरण, आदिवासी कल्याण और गरीबों के पुनर्वास को अपने कार्य का केंद्र बनाया। १९४६ में उन्होंने अंगुल में बाजी राउत छात्रावास की स्थापना की। इसका उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों तथा गरीब और आदिवासी बच्चों को शिक्षा एवं आवास उपलब्ध कराना था। १९४८ में उन्होंने नबाकृष्ण चौधरी और अन्य सहयोगियों के साथ उत्कल नवजीवन मंडल की स्थापना की। संस्था का उद्देश्य ग्रामीण पुनर्निर्माण, शिक्षा और आदिवासी कल्याण के क्षेत्र में कार्य करना था। उन्होंने अंगुल के निकट चंपातिमुंडा में एक पोस्ट-बेसिक विद्यालय की स्थापना में भी योगदान दिया। शिक्षा को वे ग्रामीण समाज के दीर्घकालीन परिवर्तन का प्रमुख माध्यम मानती थीं। नोआखाली शांति मिशन १९४६ में बंगाल के नोआखाली क्षेत्र में साम्प्रदायिक हिंसा के बाद महात्मा गांधी ने शांति मिशन शुरू किया। मालती चौधरी इस अभियान में शामिल हुईं और कुछ समय तक नोआखाली में रहकर शांति एवं साम्प्रदायिक सद्भाव के कार्यों में सहयोग किया। इस अनुभव ने उनके बाद के सामाजिक कार्यों को भी प्रभावित किया। उन्होंने सामाजिक विभाजन और हिंसा के विरुद्ध ग्रामीण स्तर पर संवाद और शिक्षा को महत्वपूर्ण माना। भूदान आंदोलन स्वतंत्रता के बाद मालती चौधरी विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से भी जुड़ीं। उन्होंने भूमि के स्वैच्छिक पुनर्वितरण और ग्रामीण समाज में आर्थिक समानता के उद्देश्य से चलाए गए अभियानों में भाग लिया। उनका सामाजिक कार्य गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रमों, सर्वोदयी विचार और ग्रामीण स्वावलंबन की अवधारणा से प्रभावित रहा। आपातकाल का विरोध १९७५ में आपातकाल घोषित किए जाने के बाद मालती चौधरी ने सरकार की दमनात्मक नीतियों का विरोध किया। उन्होंने नागरिक स्वतंत्रताओं के पक्ष में आवाज उठाई और आपातकाल के दौरान गिरफ्तार कर ली गईं। इस घटना ने उनके सार्वजनिक जीवन में नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। सम्मान और पुरस्कार मालती चौधरी को स्वतंत्रता आंदोलन, शिक्षा और सामाजिक सेवा में उनके योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए। प्रमुख सम्मान इस प्रकार हैं— राष्ट्रीय बाल कल्याण पुरस्कार — १९८७ जमनालाल बजाज पुरस्कार — १९८८ उत्कल सेवा सम्मान — १९९४ टैगोर साक्षरता पुरस्कार — १९९५ विश्वभारती का देशिकोत्तम — मानद डी.लिट्. १९९७ में संविधान सभा की पहली बैठक की ५०वीं वर्षगाँठ के अवसर पर लोक सभा और राज्य सभा द्वारा सम्मान।Malati Choudhury Constitution of IndiaJamnalal Bajaj Awardees Jamnalal Bajaj Foundation जमनालाल बजाज पुरस्कार १९८८ में उन्हें प्रदान किया गया था। व्यक्तित्व और विचार मालती चौधरी के सार्वजनिक जीवन की प्रमुख विशेषता यह थी कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रश्नों से जोड़कर देखा। उनके कार्य में गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रम, ग्रामीण शिक्षा, किसान संगठन, आदिवासी कल्याण और महिला जागरूकता पर विशेष बल था। उन्होंने औपचारिक राजनीतिक पदों की अपेक्षा जनता के बीच प्रत्यक्ष काम को प्राथमिकता दी। यही कारण था कि स्वतंत्रता के बाद उन्होंने संसदीय राजनीति के बजाय ग्रामीण समाज में शिक्षा और संगठन निर्माण को अपने जीवन का प्रमुख उद्देश्य बनाया। मृत्यु मालती चौधरी का निधन १५ मार्च १९९८ को हुआ। वे ९३ वर्ष की थीं। ओड़िशा सरकार के वार्षिक संदर्भ में १९९८ में उनके निधन को एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता के निधन के रूप में दर्ज किया गया है।Orissa Reference Annual 2004 Government of Odisha विरासत मालती चौधरी का नाम ओड़िशा के स्वतंत्रता आंदोलन, किसान आंदोलनों और ग्रामीण सामाजिक पुनर्निर्माण के इतिहास से जुड़ा हुआ है। विशेष रूप से महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में संगठित करने, प्रजामंडल आंदोलनों का समर्थन करने तथा किसानों और आदिवासियों के बीच काम करने में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। स्वतंत्रता के बाद उनके द्वारा स्थापित या विकसित संस्थाओं ने शिक्षा और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में काम जारी रखा। बाजी राउत छात्रावास और उत्कल नवजीवन मंडल उनके सामाजिक कार्य की प्रमुख संस्थागत विरासतों में माने जाते हैं। ओड़िशा में उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण पुनर्निर्माण की समर्थक के रूप में स्मरण किया जाता है। यह भी देखें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन भारत छोड़ो आंदोलन नमक सत्याग्रह सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ मालती चौधरी — आजादी का अमृत महोत्सव, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार Role of Malati Choudhury and Her Associates in Indian National Movement — Orissa Review मालती चौधरी — Constitution of India Journal of Parliamentary Information — Parliament of Indiaसितंबर 2026 InternetArchiveBot ओड़िशा में महिलाओं की स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका — Orissa Review श्रेणी:१९०४ में जन्मे लोग श्रेणी:१९९८ में निधन श्रेणी:ओड़िशा के स्वतंत्रता सेनानी श्रेणी:ओड़िशा की महिला स्वतंत्रता सेनानी श्रेणी:भारतीय स्वतंत्रता सेनानी श्रेणी:भारत छोड़ो आंदोलन श्रेणी:भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिज्ञ श्रेणी:भारत की संविधान सभा के सदस्य श्रेणी:गांधीवादी श्रेणी:भारतीय समाज सुधारक श्रेणी:ओड़िशा के समाजसेवी श्रेणी:भारतीय महिला समाज सुधारक श्रेणी:किसान आंदोलन श्रेणी:प्रजामंडल आंदोलन श्रेणी:जमनालाल बजाज पुरस्कार श्रेणी:विश्वभारती विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र