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वांग ओचॉन्चुक्गुक जॉन

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वांग ओचॉन्चुक्गुक जॉन (कोरियाई: 왕오천축국전; हंजा: 往五天竺國傳; Wang och'ŏnch'ukkuk chŏn; शाब्दिक अर्थ: 'पाँच भारतीय राज्यों की यात्रा का विवरण') सिल्ला साम्राज्य (कोरिया) के बौद्ध भिक्षु ह्येचो (Hyecho) द्वारा ७२३-७२७/७२८ ईस्वी में कोरिया से भारत की यात्रा पर लिखा गया यात्रा वृत्तांत है। Category:Pages with Korean IPA अवलोकन भाषा एवं खोज: यह रचना शास्त्रीय चीनी भाषा (तत्कालीन पूर्वी एशिया की साझा भाषा) में लिखी गई थी, जिसे लंबे समय तक लुप्त माना जाता रहा। हालाँकि, २०वीं सदी की शुरुआत में दुनहुआंग पांडुलिपियों के बीच इसकी एक प्रति प्रकाश में आई। इसे १९०८ में फ्रांसिसी खोजकर्ता व पुरातत्वविद् पॉल पेलियट ने ख़रीदा था और यह वर्तमान में फ्रांस की राष्ट्रीय पुस्तकालय (Pelliot chinois 3532) के पास सुरक्षित है।The Korea Times 06-29-2010 पांडुलिपि विवरण: यह पांडुलिपि स्क्रॉल २२७ पंक्तियों में ५,८९३ शास्त्रीय चीनी अक्षरों में है। मूलतः यह तीन खंडों में थी, लेकिन पहला खंड और तीसरे खंड का अंतिम भाग लुप्त हो गया है। इसकी चौड़ाई २८.५ सेमी और लंबाई ३५८.६ सेमी है। यह किसी कोरियाई द्वारा चीनी भाषा में लिखा जाने वाला प्रथम ज्ञात विदेशी यात्रा वृत्तांत है और उस समय भारत तथा मध्य एशिया की राजनीतिक, सांस्कृतिक व आर्थिक रीति-रिवाजों की जानकारी देता है। शीर्षक में वर्णित "पाँच भारतीय राज्य" पश्चिमी, पूर्वी, उत्तरी, दक्षिणी और मध्य भारत को संदर्भित करते हैं। इसे हिंदू दुनिया (भारतीय उपमहाद्वीप) की ओर जाने वाला पहला पूर्वी एशियाई यात्रा वृत्तांत माना जाता है। विद्वानों के अनुसार ह्येचो की पश्चिमी यात्रा का अंतिम बिंदु निशापुर (आधुनिक ईरान में) था, किंतु इसमें पूर्वी रोमन साम्राज्य (दा फू-लिन) और कई मध्य एशियाई राज्यों के बारे में भी जानकारी है।The studies in Korean Literature - Vol. 272004.12, 26-50. प्रदर्शन: इस पांडुलिपि को कोरिया के राष्ट्रीय संग्रहालय को ऋण पर दिया गया था और इसे पहली बार लिखे जाने के १२८३ वर्ष बाद, १८ दिसंबर २०१० से ३ अप्रैल २०११ तक वहाँ प्रदर्शित किया गया।The Korea Times 06-29-2010 उद्धरण: कपिशा/जिबिन पर ह्येचो (अनुच्छेद २२) ह्येचो के कार्य का एक महत्वपूर्ण अंश ७२६ ईस्वी में उनकी जिबिन (कपिशा) यात्रा से संबंधित है। उदाहरण के लिए, वह बताते हैं कि इस देश पर एक तुर्क राजा (तुर्क शाही माना जाता है) का शासन था, और उसकी रानी तथा प्रतिष्ठित लोग त्रिरत्न (三寶, तीन रत्न) का पालन करते हुए बौद्ध धर्म का अभ्यास करते थे:Kuwayama Shoshin 1976 The Turki Śāhis and Relevant Brahmanical Sculptures in Afghanistan https://www.jstor.org/stable/29756318 East and West 26 3/4 405–407 0012-8376 29756318https://books.google.com/books?id=UgOwDAAAQBAJ&pg=PT782 The Silk Road Encyclopedia Su-Il Jeong 18 July 2016 Seoul Selection 978-1-62412-076-3 782 en अंगूठाकार|ह्येचो द्वारा जिबिन भ्रमण का पाठ:वह बताते हैं कि तुर्क राजा, रानी और प्रतिष्ठित लोग बौद्ध धर्म (三寶, "त्रिरत्न") का पालन करते हैं। ७२६ ईस्वी। Kuwayama Shoshin 1976 The Turki Śāhis and Relevant Brahmanical Sculptures in Afghanistan https://www.jstor.org/stable/29756318 East and West 26 3/4 405–407 0012-8376 29756318Kuwayama, Shoshin (1976). "The Turki Śāhis and Relevant Brahmanical Sculptures in Afghanistan". East and West. 26 (3/4): 405–407. ISSN 0012-8376. JSTOR 29756318.https://books.google.com/books?id=UgOwDAAAQBAJ&pg=PT782 The Silk Road Encyclopedia Su-Il Jeong 18 July 2016 Seoul Selection 978-1-62412-076-3 782 enSu-Il, Jeong (18 July 2016). The Silk Road Encyclopedia. Seoul Selection. p. 782. ISBN 978-1-62412-076-3. मूल पाठ (चीनी): 又從此覽波國而行入山。經於八日程。至罽賓國。此國亦是建馱羅王所管。此王夏在罽賓。逐涼而坐。冬往建馱羅。趁暖而住。彼即無雪。暖而不寒。其罽賓國冬天積雪。為此冷也。此國土人是胡。王及兵馬突厥。衣著言音食飲。與吐火羅國。大同少異。無問男之與女。並皆著[疊毛]布衫袴及靴。男女衣服無有差別。男人並剪鬚髮。女人髮在。土地出駝騾羊馬驢牛[疊毛]布蒲桃大小二麥欝金香等。國人大敬信三寶。足寺足僧。百姓家各絲造寺。供養三寶。大城中有一寺。名沙糸寺。寺中貝佛螺髻骨舍利見在王官百姓每日供養。此國行小乘。亦住山裏山頭無有草木。恰似火燒山也 हिंदी अनुवाद: "लम्पका (覽波國, कश्मीर) से, मैं फिर से पहाड़ों में प्रवेश किया। आठ दिन की यात्रा के बाद मैं कपिशा (जिबिन 罽賓國) देश पहुँचा। यह देश भी गांधार (建馱羅) के राजा के अधिकार में है। गर्मियों में राजा कपिशा आता है और ठंडे तापमान के कारण यहाँ रहता है। सर्दियों में वह गांधार चला जाता है और उस गर्म स्थान पर रहता है क्योंकि वहाँ बर्फ़ नहीं पड़ती और यह गर्म व ठंड रहित होता है। कपिशा में सर्दियों में बर्फ़ जमा हो जाती है। यही ठंड का कारण है। देश के मूल निवासी हू (विदेशी) लोग हैं; राजा और घुड़सवार सेना तुर्क (突厥) हैं। यहाँ के वस्त्र, भाषा और भोजन तोख़ारिस्तान (吐火羅國) के समान हैं, हालाँकि थोड़े अंतर हैं। चाहे पुरुष हो या स्त्री, सभी सूती कमीज़, पतलून और बूट पहनते हैं। पुरुषों और महिलाओं के कपड़ों में कोई अंतर नहीं है। पुरुष अपनी दाढ़ी और बाल काटते हैं, लेकिन महिलाएँ अपने बाल रखती हैं। इस भूमि के उत्पादों में ऊँट, खच्चर, भेड़, घोड़े, गधे, सूती कपड़ा, अंगूर, जौ, गेहूँ और केसर शामिल हैं। इस देश के लोग त्रिरत्न (三寶) की बहुत पूजा करते हैं। यहाँ कई मठ और भिक्षु हैं। आम लोग मठों के निर्माण और त्रिरत्न के समर्थन में होड़ करते हैं। बड़े शहर में शाही-सी (沙糸寺) नाम का एक मठ है। इस समय, मठ में बुद्ध की घुंघराले बाल (उष्णीष, 螺髻) और अवशेष अस्थियाँ देखी जा सकती हैं। राजा, अधिकारी और आम लोग प्रतिदिन इन अवशेषों की पूजा करते हैं। इस देश में हीनयान (小乘) बौद्ध धर्म का पालन किया जाता है। भूमि पहाड़ों में स्थित है। पहाड़ों पर कोई वनस्पति नहीं है। [ऐसा लगता है] मानो धरती आग से झुलस गई हो।"  उद्धरण: गांधार पर ह्येचो (अनुच्छेद १८) अंगूठाकार|ह्येचो द्वारा गांधार (建馱羅國) भ्रमण का विवरण। मूल पाठ (चीनी): 又從迦葉彌羅國西北隔山一月程至建馱羅。此王及兵馬。總是突厥。土人是胡。兼有婆羅門。此國舊是罽賓王王化。為此突厥王阿耶領一部落兵馬。投彼罽賓王。於後突厥兵盛。便殺彼罽賓王。自為國主。因茲國境突厥覇王此國已北。並住中。其山並燋無草及樹。衣著人風言音節氣並別。衣是皮𣬼㲲衫靴袴之類土地宜大麥小麥。全無黍粟及稻。人多食麨及餅。唯除迦葉彌羅大勃小勃揚同等國。即此建馱羅國。乃至五天崑崙等國。總無蒲□□□甘蔗。此突厥王象有五頭。羊馬無數。駝騾驢等甚□多。地與胡□□□□□迴不過。向南為道路险恶。多足劫贼。從茲已北。西業者多市店之間。極多屠殺。此王雖是突厥。甚敬信三寶。王王妃王子首領等。各各造寺。供養三寶。此王每年兩迴設無遮大齋。但是緣身所受用之物。妻及象馬等。並皆捨施。唯妻及象。令僧斷價。王還自贖。自餘駝馬金銀衣物家具。聽僧貨賣。自分利養此王不同餘已北突厥也。兒女亦然。各各造寺。設齋捨施。此城俯臨辛頭大河北岸而置。此城西三日程有一大寺。即是天親菩薩無着菩薩所住之寺。此寺名葛諾歌。有一大塔。每常放光。此寺及塔。舊時葛諾歌王造。從王立寺名也。又此城東南□里。即是佛過去為尸毘王救鴿處。見有寺有僧。又佛過去捨頭捨眼餧五夜叉等處。並在此國中。在此城東南山裏。各有寺有僧。見今供養。此國大小乘俱行 हिंदी अनुवाद: "कश्मीर (迦葉彌羅國) से मैं आगे उत्तर-पश्चिम की ओर चला। पहाड़ों को पार करने में एक महीने की यात्रा के बाद मैं गांधार (建馱羅) देश पहुँचा। राजा और सैन्य कर्मी सभी तुर्क हैं। मूल निवासी हू लोग हैं; साथ ही ब्राह्मण भी हैं। यह देश पहले कपिशा के राजा के प्रभाव में था। तुर्क राजकुमार अयेह (阿耶, संभवतः बर्हा तेगिन) ने एक पराजित घुड़सवार सेना ली और कपिशा के राजा से गठबंधन कर लिया। बाद में, जब तुर्क सेना मजबूत हो गई, तो राजकुमार ने कपिशा के राजा (संभवतः घर-इलची) की हत्या कर दी और स्वयं को राजा घोषित कर दिया। इसके बाद, इस देश से उत्तर तक का पूरा क्षेत्र तुर्क राजा द्वारा शासित था, जो यहाँ भी निवास करता था। पहाड़ जले हुए हैं, घास और पेड़ नहीं हैं। यद्यपि राजा तुर्क मूल का है, वह त्रिरत्न में बहुत विश्वास और श्रद्धा रखता है। राजा, रानी, राजकुमार और प्रमुख अलग-अलग मठ बनवाते हैं और त्रिरत्न की पूजा करते हैं। यह शहर (संभवतः राजधानी उदभाण्डपुर) विशाल सिंधु नदी के उत्तरी तट पर बसा हुआ है। इस शहर से तीन दिन की यात्रा पश्चिम की ओर, एक महान मठ है जिसे कनिष्क (葛諾歌) कहा जाता है। वहाँ एक विशाल स्तूप है जो निरंतर ज्योतिर्मय होता है। मठ और स्तूप का निर्माण पूर्व राजा कनिष्क ने करवाया था, इसलिए मठ का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया। यहाँ हीनयान और महायान दोनों का पालन किया जाता है।"  संदर्भ श्रेणी:यात्रा पुस्तकें श्रेणी:लेख जिनमें कोरियाई भाषा का पाठ है