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411 समाचार
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ग़ुलाम वंश

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مملوک ममलूक राजवंश ममलूक राजवंश एशिया भारतीय उपमहाद्वीप 1206 1292 चौहान तोमर ग़ुरिद सलतनत सेन साम्राज्य खिलजी वंश Mamluk dynasty 1206 - 1290 ad.GIF दिल्ली का ममलूक राजवंश सुन्नी इस्लाम दिल्ली सल्तनत सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक १२०६–१२१० मुईज़ुद्दीन क़ैक़ाबाद १२८६–१२९० फ़ारसी और तुर्की भाषा ममलूक राजवंश (fa مملوک) मध्यकालीन भारत का एक राजवंश था। इस वंश का पहला शासक कुतुबुद्दीन ऐबक था जिसे मोहम्मद ग़ौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराने के बाद नियुक्त किया था। इस वंश ने दिल्ली की सत्ता पर 1206-1290(84वर्ष)ईस्वी तक राज किया ऐबक को लखबक्स के नाम से भी जाना जाता ह ऐबक एक कटर धर्मालंबी शासक था। Gulam vans कुतुबुद्दीन ऐबक1206-1210 इल्तुतमिश1210-1236 रजिया सुल्तान1236-1240 मुईज़ुद्दीन बहरामशाह1240-1242 अलाऊद्दीन मसूदशाह1242-1246 नासिरूद्दीन महमूद1246-1265 गयासुद्दीन बलबन1265-1287 शमशुद्दीन क्यूम़र्श1287-1290 इसने दिल्ली की सत्ता पर करीब ८४ वर्षों तक राज किया तथा भारत में इस्लामी शासन की नींव डाली। इससे पूर्व किसी भी मुस्लिम शासक ने भारत में लंबे समय तक प्रभुत्व कायम नहीं किया था। इसी समय चंगेज खाँ के नेतृत्व में भारत के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र पर मंगोलों का आक्रमण भी हुआ। कुतुबुद्दीन ऐबक :- (1206-1210 1206 में महमूद गौरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। इसी के साथ भारत में पहली बार ममलूक राजवंश की स्थापना हुई। कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्य अभिषेक 12jun 1206 को हुआ। इसने अपनी राजधानी लाहौर को बनाया। कुतुबुद्दीन ऐबक कुत्त्बी तुर्क था।  कुतुबुद्दीन ऐबक महमूद गौरी का दास व दामाद था। कुतुबुद्दीन ऐबक को लाखबक्शा या हातिमताई की संज्ञा दी जाती थी। कुतुबुद्दीन ऐबक ने यलदोज (गजनी) को दामाद, कुबाचा (मुलतान + सिंध) को बहनोई और इल्तुतमिश को अपना दामाद बनाया ताकि गौरी की मृत्यु के बाद सिंहासन का कोई और दावेदार ना बन सके। इसने अपने गुरु कुतुबद्दीन बख्तियार काकी की याद में कुतुब मीनार की नींव रखी परंतु वह इसका निर्माण कार्य पूरा नही करवा सका। इल्तुतमिश ने कुतुब मीनार का निर्माण कार्य पूरा करवाया। दिल्ली में स्थित कवेट-उल-इस्लाम मस्जिद और  अजमेर का ढाई दिन का झोंपडा का निर्माण  कुतुबुद्दीन ऐबक ने ही करवाया था। Note:-  कवेट-उल-इस्लाम मस्जिद भारत में निर्मित पहली मस्जिद थी। 1210 में चौगान खेलते समय घोड़े से गिरकर इसकी मृत्यु हुई तथा इसे लाहौर में दफनाया गया था। (RRB 2009) इल्तुतमिश :- (1210-1236 इल्तुतमिश को ममलूक राजवंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता हैं। कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद इल्तुत्मिश 1210 ई. में  दिल्ली के सिंहासन पर बैठा। दिल्ली का शासक बनने से पहले यह बनदायू का राजा था। इसने दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के बाद राजधानी को लाहौर से दिल्ली स्थांतरित किया। इल्तुतमिश इलबरी तुर्क था जो कुतुबुद्दीन ऐबक का दामाद व दास था। इल्तुतमिश को गुलामो का ग़ुलाम कहा जाता है क्योंकि यह कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम था जो (कुतुबुद्दीन ऐबक) खुद भी महमूद गौरी का गुलाम था। इल्तुतमिश इक्ता प्रथा(नकद के बदले भूमि दान) और शुद्ध अर्बियन सिक्के चलाने वाला प्रथम शासक था । इसके द्वारा चलाए गए चांदी के सिक्कों को टंका और तांबे के सिक्कों को जीतल कहा जाता था। इसको तुर्क ए चिहालगानी का फाऊंडर कहते हैं, तुर्क ए चिहालगानी चालीस गुलामों का समूह था जो हमेशा साए की तरह इल्तुतमिश के साथ रहता था। दिल्ली में स्थित नसीरुद्दीन का मकबरा इल्तुतमिश ने सुल्तान गोरही की याद में बनवाया था, यह मकबरा भारत में निर्मित प्रथम मकबरा था। इल्तुतमिश प्रथम शासक था जिसने 1229 ई.में बगदाद के खलीफा से सुल्तान की वैधानिक उपाधि हासिल की। इसकी मृत्यु 1236 ई. में हुई। 1236 ई. में मरने से पहले इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को अपनी उतराधिकारी घोषित किया क्योंकि उसका बड़ा पुत्र महमूद मारा जा चुका था। परंतु तर्कों की व्यवस्ता के अनुसार कोई महिला उत्तराधिकारी नहीं बन सकती थी। जैसे ही इल्तुतमिश की मृत्यु हुई रजिया के उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के बाद भी इल्तुतमिश की पत्नी शाह तुरकाना के नेतृत्व में उसके छोटे पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज को सुल्तान बनाया गया। परन्तु चालीसा ने रुकनुद्दीन को गद्दी पर बिठाया। मंगबरनी की खोज में चंगेज खां (मंगोल) भारत की उत्तर–पश्चिम सीमा पर इल्तुतमिश के शासनकाल में आता है, सुल्तान रुकनुद्दीन फिरोज  (1236) रुकनुद्दीन फिरोज 1236 में अपनी माता शाह तुरकाना के संरक्षण में सुल्तान घोषित किया गया। रुकनुद्दीन फिरोज की आलसी और विलासी प्रवृति होने के कारण यह किसी भी शासन के कार्यों में भाग नहीं लेता था जिसके चलते अधिकारी वर्ग के लोग जनता पर हावी हो रहे थे।    रुकनुद्दीन फिरोज कुछ ही महीनों तक सुल्तान बना उसके बाद जनता के विद्रोह के कारण रजिया सुल्तान को सुल्ताना बनाया गया। रजिया सुल्तान (1236-40) - रज़िया ने रुकनुद्दीन को अपदस्थ करके सत्ता प्राप्त की। उत्तराधिकार को लेकर रज़िया सुल्तान को जनता का समर्थन प्राप्त था। रज़िया ने पर्दा प्रथा त्यागकर पुरुषों की भाँती पोशाक धारण करके दरबार आयोजित किया। उसने मलिक याकूत को उच्च पद प्रदान किया। रज़िया सुल्तान की इन सब गतिविधियों से अमीर समूह नाराज़ हुआ। रज़िया के शासनकाल में मुल्तान, बदायूं और लाहौर के सरदारों ने विद्रोह किया था। तत्पश्चात, रज़िया ने भटिंडा के गवर्नर अल्तुनिया से विवाह किया। रजिया को पदच्युत करने में तुर्कों का हाथ था 1240 ईसवी में कैथल में रज़िया की हत्या कर दी गयी। रजिया सुल्तान ने यकूट को अमीर- ए- आखुर(अश्वशाला का प्रधान) तथा एतगीन को अमीर- ए- हाजिब की उपाधि दी। कबीर खान को लाहौर तथा अल्तूनिया को तबरहिंद (आज का बठिंडा) का इक्तेदर बनाया।   मुइज़ुधिन बहराम शाह - (1240-42) 1240 में रजिया सुल्तान की हत्या के बाद मुइजुधिन बहराम शाह सुलतान बना।   बहराम शाह के शासन काल में 1241 में मंगोलों का आक्रमण हुआ जिसमें बहराम शाह मारा गया। मंगोलों ने पंजाब पर हमला किया था। अलाउद्दीन मसूद शाह (1242-46) बहराम शाह की मृत्यु के बाद 1242 में फिरोज शाह का पुत्र मसूद शाह सिहासन पर बैठा। मसूद शाह ने बलबन को अमीर- ए- हाजिब की उपाधि प्रदान की। मसूद शाह के सिक्कों पर बगदाद के अंतिम खलीफा का नाम सर्वप्रथम अंकित था। गयासुद्दीन बलबन (1265-1290) गयासुद्दीन बलबन दिल्ली सल्तनत का नौवां सुल्तान था। वह 1266 में दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बना। उसने अपने शासनकाल में चालीसा की शक्ति को क्षीण किया और सुल्तान को पद को पुनः गरिमामय बनाया। बलबन ममलूक राजवंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक था। बलबन, इल्तुतमिश का दास था। इल्तुतमिश ने बलबन को खासदार नियुक्त किया था। इसके बाद बलबन को हांसी का इक्तादार भी नियुक्त किया गया। बलबन ने नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। नासिरुद्दीन को सुल्तान बनाकर बलबन ने अधिकतर अधिकार अपने नियंत्रण में ले लिए थे। नासिरुद्दीन महमूद ने गियासुद्दीन बलबन को उलूग खां की उपाधि दी थी। नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद बलबन सुल्तान बना। बलबन के चार पुत्र थे सुल्तान महमूद, कैकुबाद, कैखुसरो और कैकआउस। बलबन का असली नाम बहाउधिन था । यह इल्तुतमिश के बाद  ममलूक राजवंश का दूसरा इलब्री तुर्क था।   शासक बनने के बाद इसने सबसे पहले सेना का पुर्नगठन किया। सेना को दीवाने - ए- आरिज कहा जाता था। बलबन ने सिजदा और पेबोस प्रथा की शुरुआत की। इसने जिले - ए- इलाही तथा नियाबते खुदाई की उपाधि धारण की।   बलबन ने इल्तुतमिश द्वारा बनाए गए चालीसा दल को समाप्त किया। नसीरुद्दीन ने बलबन को उलुग खां की उपाधि दी। बलबन ने पारसी त्योहार ’नवरोज’ प्रारंभ किया सीरी नामक नगर बलबन ने ही बसाया था,जहां पर बाद में अलाउद्दीन ने सिरी किला बनवाया, बलबन के शासन के सिद्धांत को राजाओं के ईश्वरीय अधिकार सिद्धांत के समान प्रतिपादित किया गया। श्रेणी:ममलूक राजवंश श्रेणी:भारत का इतिहास श्रेणी:ग़ुलाम वंश