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411 समाचार
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दक्षिण गुजरात की आदिवासी होली

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दिसम्बर 2021 thumb|right|250px|गुजरात की आदिवासी महिलादक्षिणी गुजरात के धरमपुर एवं कपराडा क्षेत्रों में कुंकणा, वारली, धोडिया, नायका आदि आदिवासियों द्वारा होली कुछ अलग रूप से मनायी जाती है। धरमपुर के आदिवासियों के लिए फागुन पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला होलिका महोत्सव साल का सबसे बड़ा उत्सव है। फागुन शुक्ल प्रतिपदा से इस त्योहार की तैयारी का प्रारंभ हो जाता है। दिहाड़ी के लिए दूर गये आदिवासी अपने वतन आ पहुँचते हैं। दूर नौकरी करने गये लोग भी इस दिन अवश्य अपने घर पहुँचते हैं। जिनकी राह उनके संबंधी ही नहीं, मुहल्ले के सभी लोग देखते हैं। खावला, पीवला और नाचुला (खाने, पीने और नाचने) के लिए प्रिय ये आदिवासी होली के त्योहार के दिनों में चिंता, दुःख, दर्द और दुश्मनी को भूलकर गीत गाकर तथा तारपुं, पावी, कांहली, ढोल-मंजीरा आदि वाद्यों की मस्ती में झूमने लगते हैं तब तो ऐसा समाँ बँधता है कि मानो उनके नृत्य को देखने के लिए देवता धरती पर उतर आये हो। दक्षिणी गुजरात के हरेक गाँवों में होली मनायी जाती है। होली के गीत गाये जाते हैं। गीतों द्वारा देवियों को त्योहार के समय उपस्थित रहने के लिए विनती की जाती है। स्त्री-पुरूष एक-दूसरे की कमर में हाथ डाल कर गोलाकार घूमते हुए नाचते हुए गीत गाते हैं। यह त्योहार फागुन कृष्ण पंचमी तक मनाया जाता है। गाँवों में लगने वाले हाटो में खजूर की खूब बिक्री होती है। होली के त्योहार के सप्ताह पहले से ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती है। इसके लिए लकड़ी से भवानी, रणचंडी, अंबे माता, दस शिरों वाला रावण आदि देवी-देवताओं के चेहरे-मोहरे तथा वेशभूषा की विधिवत पूजा-अर्चना करने के बाद उसे पहन कर होली का पर्व अनोखे रूप में मनाया जाता है। वे ढोल-नगाड़ों, तूर, तारपुं, कांहळी, पावी (बाँसुरी), माँदल, चंग (बाँस से बना एक छोटा वांजित्र, जिसे लड़कियाँ होली के दिनों में बजाती रहती हैं।) आदि के साथ नाचते-कूदते-गाते हुए एक गाँव से दूसरे गाँव घूमते हुए, अबीर-गुलाल के रंगों की वर्षा करते हुए थाली लेकर फगुआ माँगते हैं। कुछ आदिवासी लकड़ी के घोडे पर सवारी करते हुए या स्त्री की वेशभूषा पहनकर आदिवासी शैली में नाचते-गाते हैं। किन्तु अब तो इनका ये नज़ारा गाँवों मे लगने वाले हाटों में ही देखने को मिलता है। गाँवों में होली दो रूपों में- छोटी और बड़ी के रूप में मनायी जाती है। छोटी और बड़ी-दोनों के स्थल अलग-अलग होते हैं। छोटी होली, बड़ी होली के अगले दिन मनायी जाती है। यह गाँव में दो-तीन स्थानों पर मनायी जाती है। होली के लिए सामान्य रूप से खजूरी के तने की लकड़ी, लंबे बाँस और पलाश के फूलों और शिंगी भरी डाली का प्रयोग किया जाता है। जिसे एक गड्ढा खोदकर खड़ा कर दिया जाता है, जिसे मुहूर्त करना कहते हैं। पहले होली की, गाँव के ओझा एवं बुजुर्गों द्वारा पूजा की जाती है। पूजा में नारियल, चावल, फूल, अगरबत्ती, खजूर, हड्डा (चीनी से बनाई जाने वाली एक मिठाई), मालपुआ आदि का उपयोग होता है। उस समय गाए जाने वाले गीतों में सुख-समृद्धि का कामना की जाती है।गीत क none लंबे बाँस की चोटी पर वाटी (सूखा नारियल) और हड्डा, खजूर आदि लटकाये जाते हैं। होली जलाने के पहले पुरूष और बच्चे पाँच फेरे लगाते हैं। उसके बाद होली को जलाया जाता है। जलती होली को पूर्व में गिराया जाता है। मान्यता है कि होली अगर जलते हुए पूरब दिशा में गिरती है तो सारा साल सुख-शांति से बीतेगा और वर्षा अच्छी होगी। बाँस की चोटी पर लटकाई गई सामग्री को पाने के लिए युवाओं में जंग-सा छिड़ता है। क्योंकि मान्यता है कि सामग्री के पाने वाले की शादी इसी साल हो जाती है। लंबे बाँस को पानेवाला युवा दौड़ते हुए होली के फेरे लेता है। कुछ लोग होली की मनौती रखते हैं। मनौती में आम, करौंदे आदि को न खाने की प्रतिज्ञा लेते हैं और होली के दिन होली माता को पहले अपनी मनौती के अनुसार आम-करौंदे अर्पित करते हैं और उसके बाद ही स्वयं भोग करते हैं। उपर्युक्त विधि के बाद गाँव के लड़के-लड़कियाँ हरेक घर से चावल या नागली का आटा माँगकर लाते हैं और वहीं रोटी पकाकर साथ में मिलकर आनंद से खाते हैं। स्त्रियाँ देर तक गीत गाती रहती हैं तो छोटे बच्चे खेल खेलते रहते हैं तो युवा लड़के-लड़कियाँ ढोल-नगाड़ों, तूर, तारपुं, कांहळी, पावी (बाँसुरी), माँदल, मंजीरा आदि के ताल पर उल्लास-उमंग में मुक्तता से नाचते-गाते रहते हैं। युवा इसी समय अपने जीवन-साथी का चुनाव भी कर लेते हैं। पूर्णिमा का यह होलिकोत्सव फागुन के कृष्ण पक्ष की पंचमी तक मनाया जाता है। होली के दूसरे दिन तो रास्ते सुनसान होते हैं क्योंकि हरेक जगह पर गाँव के बच्चे से लेकर बूढ़े तक के लोग आने-जाने वाले से फगुआ माँगते हैं और फगुआ न देने पर उन पर रंगों की वर्षा करते हैं। फगुआ पंचमी तक माँगा जाता है। इस तिथि तक सभी आदिवासी काम-काज पर नहीं जाते। पंचमी के बाद ही वे अपने अपने काम पर लौटते हैं। आदिवासियों में होली के बाद ही शादी का मौसम शुरू होता है। सन्दर्भ टीका टिप्पणी    क.    गीत क noneहोळी माताव सांगा, तुमी फूवडा मांगी ले व... होळी माताव काशेची जरूर आहे व.. होळी माताव नारेल ची जरूर आहे व... होळी माताव सांगा, तुमी नारेल मांगी ले व... होळी माताव सांगा, तुमी सेंदुर मांगी ले व... होळी माताव सांगा, तुमी अगरबत्ती मांगी ले व... होळी माताव सांगा, तुमी कोंमडा मांगी ले व... होळी माताव सांगा, तुमी फूवडा मांगी ले व... (होली माता से कह दो। तुम फूल लेकर आओ। होली को किसकी जरूरत है? होली माता को नारियेल की जरूर है। होली माता से कह दो। तुम नारियल मँगवा दो। होली माता को सिन्दूर, धूपबत्ती व मुर्गे की ज़रूरत है।) श्रेणी:होली श्रेणी:भारत के आदिवासी पर्व