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शिखरजी
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श्री सम्मेत/सम्मेद शिखरजी Shikharji Parasnath Giridih.jpg पारसनाथ पहाड़ पर जैन मंदिर 1350 Jharkhand Tourism:District Profiles https://web.archive.org/web/20130120025338/http://jharkhandtourism.in/profiles/?url=giridih.asp 20 जनवरी 2013 , Jharkhandtourism.in, Accessed 2012-05-26 India Jharkhand झारखंड में पारसनाथ की स्थिति 300 right झारखंड, छोटा नागपुर पठार 23.9611 86.1371 region:IN inline,title
शिखरजी या श्री शिखरजी भारत के झारखंड राज्य के गिरिडीह ज़िले में छोटा नागपुर पठार पर स्थित एक पहाड़ी है जो विश्व का सबसे महत्वपूर्ण जैन तीर्थ स्थल भी है। 'श्री सम्मेत् शिखर जी' के रूप में चर्चित इस पुण्य क्षेत्र में जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थंकरों (सर्वोच्च जैन गुरुओं) ने मोक्ष की प्राप्ति की। यहीं 23 वें तीर्थकर भगवान पार्श्वनाथ ने भी निर्वाण प्राप्त किया था। माना जाता है कि 24 में से 20 जैन तीर्थंकरों ने यहां पर मोक्ष प्राप्त किया था।जो चार हजार सिडीयो पर स्थित हैOn a spiritual odyssey - Hindustan Times Travel https://web.archive.org/web/20120824015528/http://travel.hindustantimes.com/travelogues/on-a-spiritual-odyssey-1.php 24 अगस्त 2012 , Travel.hindustantimes.com, Accessed 2012-07-07 1,350 मीटर (4,430 फ़ुट) ऊँचा यह पहाड़ झारखंड का सबसे ऊंचा स्थान भी है।
स्थिति
शिखरजी जैन धर्म के अनुयायिओं के लिए एक महतवपूर्ण तीर्थ स्थल है। पारसनाथ पर्वत विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ हर साल लाखों जैन धर्मावलंबियों आते है, साथ-साथ अन्य पर्यटक भी पारसनाथ पर्वत की वंदना करना जरूरी समझते हैं। गिरिडीह स्टेशन से पहाड़ की तलहटी मधुवन तक क्रमशः 14 और 18 मील है। पहाड़ की चढ़ाई उतराई तथा यात्रा करीब 18 मील की है।
सम्मेद शिखर जैन धर्म को मानने वालों का एक प्रमुख तीर्थ स्थान है। यह जैन तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। जैन धर्मशास्त्रों के अनुसार जैन धर्म के 24 में से 20 तीर्थंकरों और अनेक संतों व मुनियों ने यहाँ मोक्ष प्राप्त किया था। इसलिए यह 'सिद्धक्षेत्र' कहलाता है और जैन धर्म में इसे तीर्थराज अर्थात् 'तीर्थों का राजा' कहा जाता है। यह तीर्थ भारत के झारखंड प्रदेश के गिरिडीह जिले में मधुबन क्षेत्र में स्थित है। यह जैन धर्म का प्रमुख तीर्थ है। इसे 'पारसनाथ पर्वत' के नाम से भी जाना जाता है। सम्मेत शिखर जी#cite note-1
thumb|right|शिखर जी पहाड़ी
शाश्वत तीर्थ
जैन ग्रंथों के अनुसार सम्मेत्/सम्मेद शिखर और अयोध्या, इन दोनों का अस्तित्व सृष्टि के समानांतर है। इसलिए इनको 'शाश्वत' माना जाता है। प्राचीन ग्रंथों में यहाँ पर तीर्थंकरों और तपस्वी संतों ने कठोर तपस्या और ध्यान द्वारा मोक्ष प्राप्त किया। यही कारण है कि जब सम्मेद शिखर तीर्थयात्रा शुरू होती है तो हर तीर्थयात्री का मन तीर्थंकरों का स्मरण कर अपार श्रद्धा, आस्था, उत्साह और खुशी से भरा होता है।
thumbnail|right|शिखर जी, पारसनाथ हिल
मान्यताएँ
जैन धर्म शास्त्रों में लिखा है कि अपने जीवन में सम्मेत्त शिखर तीर्थ की एक बार भावपूर्ण यात्रा करने पर मृत्यु के बाद व्यक्ति को पशु योनि और नरक प्राप्त नहीं होता। यह भी लिखा गया है कि जो व्यक्ति सम्मेद/सम्मेत् शिखर आकर पूरे मन, भाव और निष्ठा से भक्ति करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है और अनंत काल के लिए संसार में जन्म- मरण के दुखों से मुक्त हो जाता है। यह सब तभी संभव होता है, जब यहाँ पर सभी भक्त तीर्थंकरों को स्मरण कर उनके द्वारा दिए गए उपदेशों, शिक्षाओं और सिद्धांतों का शुद्ध आचरण के साथ पालन करें। इस प्रकार यह क्षेत्र बहुत पवित्र माना जाता है। इस क्षेत्र की पवित्रता और सात्विकता के प्रभाव से ही यहाँ पर पाए जाने वाले शेर, बाघ आदि जंगली पशुओं का स्वाभाविक हिंसक व्यवहार नहीं देखा जाता। इस कारण तीर्थयात्री भी बिना भय के यात्रा करते हैं। संभवत: इसी प्रभाव के कारण प्राचीन समय से कई राजाओं, आचार्यों, भट्टारक, श्रावकों ने आत्म-कल्याण और मोक्ष प्राप्ति की भावना से तीर्थयात्रा के लिए विशाल समूहों के साथ यहाँ आकर तीर्थंकरों की उपासना, ध्यान और कठोर तप किया।http://religion.bhaskar.com/2010/04/09/shrisammed-856616.html संग्रहीत प्रति 10 जनवरी 2015 https://web.archive.org/web/20160305030718/http://religion.bhaskar.com/2010/04/09/shrisammed-856616.html 5 मार्च 2016 dead
मोक्ष स्थान
जैन नीति शास्त्रों में वर्णन है कि जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से प्रथम तीर्थंकर भगवान 'आदिनाथ' अर्थात् भगवान ऋषभदेव ने अष्टापद कैलाश पर्वत पर, 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य ने चंपापुरी, 22वें तीर्थंकर भगवान अरिष्ट नेमि
ने गिरनार पर्वत और 24वें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने पावापुरी में मोक्ष प्राप्त किया। शेष 20 तीर्थंकरों ने सम्मेत्त शिखर में मोक्ष प्राप्त किया। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ ने भी इसी तीर्थ में कठोर तप और ध्यान द्वारा मोक्ष प्राप्त किया था। अत: भगवान पार्श्वनाथ की टोंक इस शिखर पर स्थित है। पार्श्वनाथ का प्रतीक चिन्ह सर्प है thumb|right|जल मंदिरhttp://hi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%A6_%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%B0 संग्रहीत प्रति 15 जून 2020 https://web.archive.org/web/20140813134055/http://hi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%A6_%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%B0 13 अगस्त 2014 dead
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"Indiapedia, Jainism." https://web.archive.org/web/20150420153255/http://books.google.com.au/books?id=LS9nAQAAQBAJ&pg=PT123&dq=shikharji&hl=en&sa=X&ei=W6RXU4vcL8utlQWXpoGICQ&ved=0CC4Q6AEwAA#v=onepage&q=shikharji&f=false 20 अप्रैल 2015 Hachette UK, 2013 ISBN 9350097664, 9789350097663.
इन्हें भी देखें
पारसनाथ
जैन धर्म
पंचेंद्रीय (जैन)
सन्दर्भ
श्रेणी:जैन तीर्थ
श्रेणी:झारखंड
श्रेणी:गिरिडीह ज़िला