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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

मरुद्गण

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thumb|मरुद्गण मरुद्गण (=मरुत् + गण) एक देवगण का नाम। वेदों में इन्हें रुद्र और वृश्नि का पुत्र लिखा है और इनकी संख्या ६० की तिगुनी मानी गई है; पर पुराणों में इन्हें कश्यप और दिति का पुत्र लिखा गया है जिसे इंद्र सुक्ष्म रुप से अपनी सौतेली मा दिति के योनी से गर्भ मे प्रवेेश करके बच्चे को काटकर एक से उनचास टुकड़े कर डाले थे, जो उनचास मरुद् हुए। वेदों में मरुदगण का स्थान अंतरिक्ष लिखा है, उनके घोड़े का नाम 'पृशित' बतलाया है तथा उन्हें इंद्र का सखा लिखा है। पुराणों में इन्हें वायुकोण का दिक्पाल माना गया है। कथा प्रजापति कश्यप की दो पत्नियाँ थीं उनमें से पहली पत्नी का नाम था अदिति और दूसरी पत्नी का नाम था दिति | अदिति के गर्भ से देवताओं अथवा आदित्यों ने जन्म लिया और दिति के गर्भ से दैत्यों ने जन्म लिया | देवासुर संग्राम में देवताओं की पराजय के बाद समुद्र मंथन हुआ और उसमे प्राप्त अमृत से देवता अमर हो गए.| देवताओं ने फिर असुरों को पराजित करके उन्हें समाप्त कर दिया |दिति को अपने पुत्रों की मृत्यु से बहुत दुःख और क्रोध हुआ |उन्होंने अपने पति के पास जा कर कहा कि आपके पुत्रों ने मेरे पुत्रों का वध किया है , इस लिए तपस्या करके ऐसे पुत्र को प्राप्त करना चाहती हूँ जो इंद्र का वध कर सके | कश्यप ने कहा कि तुम्हे पहले 1000 वर्षों तक पवित्रता पूर्वक रहना होगा तब तुम मुझसे इंद्र का वध करने में समर्थ पुत्र प्राप्त कर लोगी |यह कह कर कश्यप ने दिति का स्पर्श किया और दिति भी प्रसन्न हो कर अपने पति के कहे अनुसार तप करने चली गयी | दिति को तप करता देख इंद्र भी उनकी सेवा करने लगे | जब तप समाप्ति में 1 वर्ष बाक़ी रहा तप दिति ने इंद्र से कहा कि एक वर्ष बाद जब तुम्हारे भाई का जन्म होगा तब वो तुम्हे मारने मे समर्थ होगा पर तुमने मेरी तप मे इतनी सेवा की है कि मैं उसे तुमको मारने के लिए न कहूंगी | तुम दोनों मिलकर राज्य करना |इसके बाद दिति को दिन में झपकी आ गयी और उनका सर पैरों मे जा लगा जिससे उनका शरीर अपवित्र हो गया और तप भी भंग हो गया | इधर इंद्र को भी दिति के होने वाले पुत्र से पराजय की चिंता हो गयी थी और उन्होंने इस गर्भ को समाप्त करने का निश्चय किया | दिति के निंद्रा के समय इंद्र ने सुक्ष्म रुप धारण करके दिति के योनी मे प्रवेश करके इस गर्भ के 7 टुकड़े कर दिए | दिति के जगने पर जब उन्हें गर्भ के सात टुकड़े होने की बात पता चली तब उन्होंने इंद्र से कहा कि मेरे तप भंग होने के कारण ही मेरे गर्भ के टुकड़े हो गए हैं , इसमे तुम्हारा दोष नही है | दिति ने तब कहा कि टुकड़े होने के बाद भी मेरे गर्भ के ये टुकड़े हमेशा आकाश मे विचरण करेंगे और मरुत नाम से विख्यात होंगे | ये सातों मरुत के सात सात गण होंगे जो सात जगह विचरण कर सकते हैं और इस तरह कुल ४९ मरुत बन जाते हैं | इन सात मरुतों के नाम हैं - https://sa.wikisource.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A4%AE%E0%A5%8D-_%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%83/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%83_%E0%A5%AC%E0%A5%A6 आवह, प्रवह,संवह ,उद्वह,विवह,परिवह,परावह इनके सात सात गण निम्न जगह विचरण करते हैं - ब्रह्मलोक , इन्द्रलोक ,अंतरिक्ष , भूलोक की पूर्व दिशा , भूलोक की पश्चिम दिशा , भूलोक की उत्तर दिशा और भूलोक की दक्षिण दिशा इस तरह से कुल ४९ मरुत हो जाते हैं जो देव रूप में विचरण करते हैं | परिचय वैदिक देवताओं के ये गण हैं—८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य। इनमें इंद्र और प्रजापति मिला देने से ३३ देवता होते हैं (शतपथ ब्राह्मण)। पीछे से इन गणों के अतिरिक्त ये गण और माने गए—३० तुषित, १० विश्वेदेवा, १२ साघ्य, ६४ आभास्वर, ४९ मरुत्, २२० महाराजिक। इस प्रकार वैदिक देवताओं के गण और परवर्ती देवगणों को कुल संख्या ४१८ होती है। बौद्ध और जैन लोग भी देवताओं के कई गण या वर्ग मानते हैं। चारों वेदों में मिलकर मरुद्देवता के मंत्र 498 हैं। मरुत् गणश: रहते हैं अत: इनका वर्णन संघश: ही किया जाता है-- 1. मरुतों के गणों के लिये हव्य अर्पण करो (मारुताय शर्धाय हव्या भरध्वम, ऋ. 8.20.9)! 2. मरुतों के गणों का वंदन करो (वंदस्व मारुतं गणम्, ऋ. 1.38.1)। 3. मरुतों के गणों को नमन करो (मारुतं गणं नमस्य, ऋ. 5.52.13)। 4. मरुत अपने गणों में शोभते हैं (गणश्रिय: मरुत:, ऋ. 1.64.9)। 5. मरुतों का बलवान् गण सरंक्षण करता है। (वृषा गण: अविता ऋ. 1.87.4)। सब मरुत् समान रहते हैं। सब मरुत् देखने में एक जैसे रहते हैं-- ते अज्येष्ठा अकनिष्ठास उभ्दिदो अमध्यमासो महसा विवावृधु:। (ऋ. 5.59.6) वे मरुत् श्रेष्ठ नहीं, कनिष्ठ नहीं और मध्यम भी नहीं होते। वे सब एक जैसे होते हैं और वे अपनी महती शक्ति से बढ़ते रहते हैं। उन मरुतों के सिर पर हिरणमय शिरस्त्रारण होता है। (ऋ. 5.54.77)। समान गणवेश सब मरुतों का गणवेश समान रहता है। 1. इनके गणवेश समान रीति से शोभते हैं। 2. इनकी छाती पर पदक और गले में मालाएँ चमकती हैं। 3. इनके पाँवों में भूषण और छाती पर पदक आभूषण से दीखते हैं--(ऋ. 5.54.11)। शस्त्रास्त्र सब मरुतों के शस्त्रास्त्र समान रहते हैं। कंधों पर भाले और हाथों में अग्नि के समान तेजस्वी शस्त्र रहते हैं। अपने हाथों में वे कुठार और धनुष रखते हैं। हाथों में चाबुक धारण करते हैं। मरुतों के रथ 1. मरुत् अपने रथों में घोड़े जोतते हैं। 2. रथों में धब्बोंवाली हिरनियाँ जोतते हैं। 3. उनके रथ को हिरन खींचता है (ऋ. 2.34, 8.7, 1.39)। मरुतों का रथ बिना घोड़ों के भी चलनेवाला था। किसी पशु पक्षी के जोतने के बिना वह चलता था। हे मरुतो! तुम्हारा रथ (अन्:-एन:) निर्दोष है, (अन्-अश्व:) इसमें घोड़े नहीं जोते जाते, तथापि वह (अजति) चलता है। वह रथ (अ-रथी:) रथी बिना भी चलता है। (अन्-अवस:) रक्षक की जिसको जरूरत नहीं है, (अन् अभीशु:) लगाम भी नहीं है, ऐसा तुम्हारा रथ (रजस्तू:) धूलि उड़ाता हुआ (रोदसी पथ्या) आकाश मार्ग से (साधन् याति) अपना अभीष्ट सिद्ध करता हुआ जाता है।" आशय यह कि मरुतों के चार प्रकार के रथ थे-- (1) अश्व रथ, (2) हरिणियों से चलनेवाला रथ, (3) अनश्व रथ अर्थात् घोड़े के बिना वेग से चलनेवाला रथ, (4) आसमान में (रोदसी) उड़नेवाला रथ अर्थात् वायुयान (ऋ. 6.66.7) शत्रु पर आक्रमण मरुत् देवों के सैनिक थे अत: उनके लिये शत्रु पर हमला करना आवश्यक होता था। मरुत् मनुष्य थे इस विषय में वेद के वचन देखिए। मरुतों के गुण मरुत् ज्ञानी है (प्रचेतस: मरुत:)। वे दूरदर्शी हैं ("दूरे दृश:")। वे कवि है--(कवय: मरुत:)। मरुत अत्यंत कुशल, उत्तम सैनिक हैं। मरुत् उग्र है (उग्रा: मरुत:)। शत्रु को जड़ मूल से उखाड़कर फेंकनेवाले मरुत् है (सुमाया मरुत:)। स्थिर शत्रु को भी अपनी शक्ति से ये मरुत् स्थानभ्रष्ट करते हैं। (ऋ. 1.85.4)। एक पंक्ति में सात--मरुत् अपनी पंक्ति में ही रहते थे। यह इनकी पंक्ति सात की होती थी। ऐसी सात पंक्तियों का एक गण होता था। अत: कहा है-- 1. गणशो हि मरुत:। (तांड्य ब्रा. 19.14.2) 2. मरुतो गणानां पतय: (तै. अ. 3.11.4.2) 3. सप्त गणा वै मरुत:। (तै. ब्रा. 1.6.2.3) मरुतो का संघ होता है, अर्थात् मरुत् गणश: रहते हैं। मरुतों का गण सात सात का होता है। इस कारण उनको "सप्ती" कहते हैं : सात सात सैनिकों की सात पंक्तियों में ये 49 रहते हैं। और प्रत्येक पंक्ति के दोनों ओर एक एक पार्श्व रक्षक रहता है। अर्थात् ये रक्षक 14 होते हैं। इस तरह सब मिलकर 49 अ 14 उ 63 सैनिकों का एक गण होता है। "गण" का अर्थ "गिने हुए सैनिकों का संघ" है। इन मरुतों के संघ इस तरह 63 सैनिकों के होते थे। मरुतों के विमान मरुतों के विमान भी होते थे, जैसा ऊपर कह चुक हैं। हे मरुतो! तुम अंतरिक्ष से हमारे पास आओ। (ऋ. 5.53.8) अंतरिक्ष से संचार करनेवाले आकाशयान उनके पास थे। मरुतों का स्तोता अमर होता है। ये मरुत मानव थे। आप मनुष्य हैं पर आपकी स्तुति करनेवाला अमर होता है। आप रुद्र के मनुष्य रूपी पुत्र हैं। (ऋ. 1.38.4, 1.64.2)। इस तरह वेद में मरुतों का वर्णन "सैनिकीय गण" के रूप में किया गया है। वह देखने योग्य और राष्ट्रीय दृष्टि से विचार करने योग्य है। सन्दर्भ श्रेणी:वेद श्रेणी:हिन्दू धर्म