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चाणक्य
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आचार्य चाणक्य property raw P18 properties linked references P569 properties linked references linked P19 properties linked references edit linked P1477 properties linked references edit linked P2048 properties linked references edit linked P2048 properties linked references edit linked P27 properties linked references edit linked P69 properties linked references edit linked P108 आचार्य चणक माता शकुंतला properties linked references edit P570 properties linked references edit P20 properties linked references edit linked P172 properties linked references edit P102 properties references edit P1196 properties references edit P509 properties linked references edit linked P106 properties linked references edit linked P26 properties linked references edit linked P40 properties linked references edit linked P166 properties linked references edit linked P551 मौर्य साम्राज्य की स्थापना तथा अर्थशास्त्र, चाणक्य नीति की रचना properties linked references edit linked P2218 properties linked references edit linked P140(शैव) property raw P109 properties linked references edit linked P856 properties linked references edit linked P7047 properties linked references edit linked P39 properties linked references edit linked P119
चाणक्य (ई.पु ३७५ - २८३ ) चाणक्य प्राचीन भारतीय राजनेता, दार्शनिक, लेखक, अर्थशास्त्री, धर्मगुरु तथा शाही सलाहकार थे। वे प्रारंभिक जीवन में तक्षशिला विश्वविद्यालय के प्राध्यापक थे, उन्होंने अर्थशास्त्र तथा चाणक्यनीति जैसे प्रसिद्धि ग्रंथों की भी रचना की है। चाणक्य अखंड भारत के स्वप्नदृष्टा थे, उन्होंने चन्द्रगुप्त की सहायता से नंदवंश का नाश कर के मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी। अपनी राष्ट्रनिष्ठा, देशप्रेम, बुद्धिमानी, निडरता के कारण भारतीय सभ्यता में उनका स्थान एकमेव तथा अद्वितीय है।
मगध में जन्मे चाणक्य का बचपन गरीबी में बीता, शिक्षा तक्षशिला में ग्रहण की और वहीं पर अर्थशास्त्र के प्राध्यापक भी बने। उन्होंने एक तथा अखंड भारतवर्ष का सपना सजोया था, इसी लिए अत्याचारी नंदवंश का नाश करने का संकल्प लिया और उसे पूर्ण कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना कर अपने शिष्य चंद्रगुप्त को राजा बना कर अखंड भारत का सपना साकार किया। चाणक्य के प्रयासों से ही चंद्रगुप्त मौर्य के नेतृत्व में मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई और यह एक कुशल शासन का आदर्श बना.
अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के बाद, चाणक्य एक तपस्वी के रूप में वन में चले गए, जहाँ उन्होंने अपना शेष जीवन बिताया.
परिचय
thumb|चंद्रगुप्त मौर्य, बिरला मन्दिर, शैल-चित्र
चन्द्रगुप्त के साथ चाणक्य की मैत्री की कथा इस प्रकार है-
पाटलिपुत्र के नंद वंश के राजा धनांद के यहाँ आचार्य एक अनुरोध लेकर गए थे। आचार्य ने अखण्ड भारत की बात की और कहा कि वह पोरव राष्ट्र से यमन शासक सेल्युकस को भगा दे किन्तु धनानंद ने नकार दिया क्योंकि पोरस राष्ट्र के राजा की हत्या धनानंद ने यमन शासक सेल्युकस से करवाई थी। जब यह बात आचार्य को खुद धनानंद ने बोला तब क्रोधित होकर आचार्य ने यह प्रतिज्ञा की कि जब तक मैं नंदों का नाश न कर लूँगा तब तक अपनी शिखा नहीं बाँधूंंगा। उन्हीं दिनों राजकुमार चंद्रगुप्त राज्य से निकाले गए थे। चंद्रगुप्त ने चाणक्य से मिलकर म्लेच्छ राजा पर्वतक की सेना लेकर पाटलिपुत्र पर चढ़ाई की और नंदों को युद्ध में परास्त करके मार डाला।
नंदों के नाश के संबंध में कई प्रकार की कथाएँ हैं। कहीं लिखा है कि चाणक्य ने महानन्द के यहाँ निर्माल्य भेजा जिसे छूते ही महानंद और उसके पुत्र मर गए। कहीं विषकन्या भेजने की कथा लिखी है। मुद्राराक्षस नाटक के देखेने से जाना जाता है कि नंदों का नाश करने पर भी महानंद के मंत्री राक्षस के कौशल और नीति के कारण चंद्रगुप्त को मगध का सिंहासन प्राप्त करने में बड़ी बड़ी कठिनाइयाँ पड़ीं। अंत में चाणक्य ने अपने नीतिबल से राक्षस को प्रसन्न किया और चंद्रगुप्त का मंत्री बनाया। बौद्ध ग्रंथो में भी इसी प्रकार की कथा है, केवल 'महानंद' के स्थान पर 'धनानन्द' शब्द है।
कुछ विद्वानों के अनुसार कौटिल्य का जन्म पंजाब के 'चणक' क्षेत्र में हुआ था अर्थात आज का चंडीगढ, जबकि कुछ विद्वान मानते हैं कि उनका जन्म दक्षिण भारत में हुआ था। कई विद्वानों का यह मत है कि वह कांचीपुरम के रहने वाले द्रविण ब्राह्मण । वह जीविकोपार्जन की खोज में उत्तर भारत आया थे। कुछ विद्वानों के मतानुसार केरल भी उनका जन्म स्थान बताया जाता है। इस संबंध में उनके द्वारा चरणी नदी का उल्लेख इस बात के प्रमाण के रूप में दिया जाता है। कुछ सन्दर्भों में यह उल्लेख मिलता है कि केरल निवासी चाणक्य वाराणसी आया था, जहाँ उसकी पुत्री खो गयी। वह फिर केरल वापस नहीं लौटा और मगध में आकर बस गया। इस प्रकार के विचार रखने वाले विद्वान उन्हे केरल के निषाद कुतुल्लूर नामपुत्री वंश का वंशज मानते हैं। कई विद्वानों ने उन्हे मगध का ही मूल निवासी माना है। कुछ बौद्ध साहित्यों ने उन्हे तक्षशिला का निवासी बताया है। कौटिल्य के जन्मस्थान के संबंध में अत्यधिक मतभेद रहने के कारण निश्चित रूप से यह कहना कि उनका जन्म स्थान कहाँ था, कठिन है, परंतु कई सन्दर्भों के आधार पर तक्षशिला को उनका जन्म स्थान मानना ठीक होगा।
वी. के. सुब्रमण्यम ने कहा है कि कई सन्दर्भों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सिकन्दर को अपने आक्रमण के अभियान में युवा कौटिल्य से भेंट हुई थी। चूँकि अलेक्जेंडर का आक्रमण अधिकतर तक्षशिला क्षेत्र में हुआ था, इसलिए यह उम्मीद की जाती है कि कौटिल्य का जन्म स्थान तक्षशिला क्षेत्र में ही रहा होगा। कौटिल्य के पिता का नाम चणक था। वह एक गरीब द्रविड़ ब्राह्मण थे और किसी तरह अपना गुजर-बसर करता थे। अतः स्पष्ट है कि कौटिल्य का बचपन गरीबी और दिक्कतों में गुजरा होगा। कौटिल्य की शिक्षा-दीक्षा के संबंध में कहीं कुछ विशेष जिक्र नहीं मिलता है, परन्तु उनकी बुद्धि की प्रखरता और उनकी विद्वता उनके विचारों से परिलक्षित होती है। वह कुरूप होते हुए भी शारीरिक रूप से बलिष्ठ थे। उनके ग्रंथ 'अर्थशास्त्र' के अवलोकन से उनकी प्रतिभा, बहुआयामी व्यक्तित्व और दूरदर्शिता का पूर्ण आभास होता है।
कौटिल्य के बारे में यह कहा जाता है कि वह बड़े ही स्वाभिमानी एवं राष्ट्रप्रेमी व्यक्ति थे। एक किंवदंती के अनुसार एक बार मगध के राजा महानंद ने श्राद्ध के अवसर पर कौटिल्य को अपमानित किया था, जबकि तथ्यों से उजागर होता है कि धनानंद की प्रजा विरोधी नीतियों के कारण ब्राह्मण चणक, जो कि विष्णुगुप्त (चाणक्य) के पिता थे, द्वारा विरोध करने पर उन्हें कारगर में बंदी बनाकर उनके, परिवार को देश निकाला दे दिया गया था. तथापि राष्ट्र हित में चाणक्य ने धनानंद से सीमान्त देशों के लिए सैनिक सहायता के लिए विनती की, जिससे बाहरी आततायी भारतीय जन का अशुभ न कर सकें। परन्तु मद में अंधे धनानंद ने उनका अपमान कर उन्हें राजमहल से निकाल दिया। कौटिल्य ने क्रोध के वशीभूत होकर अपनी शिखा खोलकर यह प्रतिज्ञा की थी कि जब तक वह नंदवंश का नाश नहीं कर देंंगे तब तक वह अपनी शिखा नहीं बाँधेंगे। कौटिल्य के व्यावहारिक राजनीति में प्रवेश करने का यह भी एक बड़ा कारण था। नंदवंश के विनाश के बाद उन्होने चन्द्रगुप्त मौर्य को राजगद्दी पर बैठने में हर संभव सहायता की। चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा गद्दी पर आसीन होने के बाद उसे पराक्रमी बनाने और मौर्य साम्राज्य का विस्तार करने के उद्देश्य से उन्होने व्यावहारिक राजनीति में प्रवेश किया। वह चन्द्रगुप्त मौर्य के मंत्री भी बने।
कई विद्वानों ने यह कहा है कि कौटिल्य ने कहीं भी अपनी रचना में मौर्यवंश या अपने मंत्रित्व के संबंध में कुछ नहीं कहा है, परंतु अधिकांश स्रोतों ने इस तथ्य की संपुष्टि की है। 'अर्थशास्त्र' में कौटिल्य ने जिस विजिगीषु राजा का चित्रण प्रस्तुत किया है, निश्चित रूप से वह चन्द्रगुप्त मौर्य के लिये ही संबोधित किया गया है।
भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के कारण छोटे-छोटे राज्यों की पराजय से अभिभूत होकर कौटिल्य ने व्यावहारिक राजनीति में प्रवेश करने का संकल्प किया। उनकी सर्वोपरि इच्छा थी भारत को एक गौरवशाली और विशाल राज्य (अखण्ड भारत) रूप में देखना। निश्चित रूप से चन्द्रगुप्त मौर्य उनकी इच्छा का केन्द्र बिन्दु था। आचार्य कौटिल्य को एक ओर पारंगत और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ के रूप में मौर्य साम्राज्य का संस्थापक और संरक्षक माना जाता है, तो दूसरी ओर उन्हे संस्कृति साहित्य के इतिहास में अपनी अतुलनीय एवं अद्भुत कृति के कारण अपने विषय का एकमात्र विद्वान होने का गौरव प्राप्त है। कौटिल्य की विद्वता, निपुणता और दूरदर्शिता का बखान भारत के शास्त्रों, काव्यों तथा अन्य ग्रंथों में परिव्याप्त है। कौटिल्य द्वारा नंदवंश का विनाश और मौर्यवंश की स्थापना से संबंधित कथा विष्णु पुराण में आती है।
अति विद्वान और मौर्य साम्राज्य का महामंत्री होने के बावजूद कौटिल्य का जीवन सादगी का जीवन था। वह 'सादा जीवन उच्च विचार' का सही प्रतीक थे। उन्होने अपने मंत्रित्वकाल में अत्यधिक सादगी का जीवन बिताया। वह एक छोटा-से मकान में रहते थे और कहा जाता है कि उनके मकान की दीवारों पर गोबर के उपले थोपे रहते थे।
उनकी मान्यता थी कि राजा या मंत्री अपने चरित्र और ऊँचे आदर्शों के द्वारा लोगों के सामने एक प्रतिमान दे सकता है। उन्होंने सदैव मर्यादाओं का पालन किया और कर्मठता की जिंदगी बितायी। कहा जाता है कि बाद में उन्होंने मंत्री पद त्यागकर वानप्रस्थ जीवन व्यतीत किया था। वस्तुतः उन्हें धन, यश और पद का कोई लोभ नहीं था। सारतत्व में वह एक वितरागी, तपस्वी, कर्मठ और मर्यादाओं का पालन करनेवाले व्यक्ति थे, जिनका जीवन आज भी अनुकरणीय है।
एक प्रकांड विद्वान तथा एक गंभीर चिंतक के रूप में कौटिल्य तो विख्यात है ही, एक व्यावहारिक एवं चतुर राजनीतिज्ञ के रूप में भी उन्हे ख्याति मिली है। नंदवंश के विनाश तथा मगध साम्राज्य की स्थापना एवं विस्तार में उनका ऐतिहासिक योगदान है। सालाटोर के कथनानुसार प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में कौटिल्य का सर्वोपरि स्थान है। कौटिल्य ने राजनीति को नैतिकता से पृथक कर एक स्वतंत्र शास्त्र के रूप में अध्ययन करने का प्रयास किया है। जैसा कि कहा जाता है चाणक्य एक महान आचार्य थे।
नाम, जन्मतिथि और जन्मस्थान
कौटिल्य का नाम, जन्मतिथि और जन्मस्थान तीनों ही विवाद के विषय रहे हैं। कौटिल्य के नाम के संबंध में विद्वानों के बीच मतभेद पाया जाता है। कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' के प्रथम अनुवादक पंडित शामाशास्त्री ने कौटिल्य नाम का प्रयोग किया है। 'कौटिल्य नाम' की प्रामाणिकता को सिद्ध करने के लिए पंडित शामाशास्त्री ने विष्णु-पुराण का हवाला दिया है जिसमें कहा गया है—
तान्नदान् कौटल्यो ब्राह्मणस्समुद्धरिष्यति।
इस संबंध में एक विवाद और उत्पन्न हुआ है और वह है कौटिल्य और कौटल्य का। गणपति शास्त्री ने 'कौटिल्य' के स्थान पर 'कौटल्य' को ज्यादा प्रामाणिक माना है। उनके अनुसार कुटल गोत्र होने के कारण कौटल्य नाम सही और संगत प्रतीत होता है। कामन्दकीय नीतिशास्त्र के अन्तर्गत कहा गया है—
कौटल्य इति गोत्रनिबन्धना विष्णु गुप्तस्य संज्ञा।
सांबाशिव शास्त्री ने कहा है कि गणपतिशास्त्री ने संभवतः कौटिल्य को प्राचीन संत कुटल का वंशज मानकर कौटल्य नाम का प्रयोग किया है, परन्तु इस बात का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता है कि कौटिल्य संत कुटल के वंश और गोत्र का था। 'कोटिल्य' और 'कौटल्य' नाम का विवाद और भी कई विद्वानों ने उठाया है। वी. ए. रामास्वामी ने गणपतिशास्त्री के कथन का समर्थन किया है। आधुनिक विद्वानों ने दोनों नामों का प्रयोग किया है। पाश्चात्य लेखकों ने कौटिल्य नाम का ही प्रयोग किया है। भारत में विद्वानों ने दोनों नामों का प्रयोग किया है, बल्कि ज्यादातर कौटिल्य नाम का ही प्रयोग किया है। इस संबंध में राधाकांत का कथन भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसने अपनी रचना 'शब्दकल्पद्रम' में कहा है
अस्तु कौटल्य इति वा कौटिल्य इति या चाणक्यस्य गोत्रनामधेयम्।
कौटिल्य के और भी कई नामों का उल्लेख किया गया है। जिसमें चाणक्य नाम प्रसिद्ध है। कौटिल्य को चाणक्य के नाम से पुकारने वाले कई विद्वानों का मत है कि चाणक निषाद का पुत्र होने के कारण यह चाणक्य कहलाया। दूसरी ओर कुछ विद्वानों के कथानानुसार उसका जन्म पंजाब के चणक क्षेत्र के निषाद बस्ती में हुआ था जो वर्तमान समय में चंडीगढ़ के मल्लाह नामक स्थान से सूचित किया जाता है, इसलिए उन्हे चाणक्य कहा गया है, यद्यपि इस संबंध में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। एक बात स्पष्ट है कि कौटिल्य और चाणक्य एक ही व्यक्ति है।
उपर्युक्त नामों के अलावा उसके और भी कई नामों का उल्लेख मिलता है, जैसे विष्णुगुप्त। कहा जाता है कि उनका मूल नाम विष्णुगुप्त ही था। उनके पिता ने उनका नाम विष्णुगुप्त ही रखा था। कौटिल्य, चाणक्य और विष्णुगुप्त तीनों नामों से संबंधित कई सन्दर्भ मिलते हैं, किंतु इन तीनों नामों के अलावा उसके और भी कई नामों का उल्लेख किया गया है, जैसे वात्स्यायन, मलंग, द्रविमल, अंगुल, वारानक्, कात्यान इत्यादि इन भिन्न-भिन्न नामों में कौन सा सही नाम है और कौन-सा गलत नाम है, यह विवाद का विषय है। परन्तु अधिकांश पाश्चात्य और भारतीय विद्वानों ने 'अर्थशास्त्र' के लेखक के रूप में कौटिल्य नाम का ही प्रयोग किया है।
कुछ पाश्चात्य विद्वानों ने कौटिल्य के अस्तित्व पर ही प्रश्नवाचक चिह्न लगा दिया है। विन्टरनीज, जॉली और कीथ के मतानुसार कौटिल्य नाम प्रतीकात्मक है, जो कूटनीति का प्रतीक है। पांतजलि द्वारा अपने महाभाष्य में कौटिल्य का प्रसंग नहीं आने के कारण उनके मतों का समर्थन मिला है। जॉली ने तो यहाँ तक कह डाला है कि 'अर्थशास्त्र' किसी कौटिल्य नामक व्यक्ति की कृति नहीं है। यह किसी अन्य आचार्य का रचित ग्रंथ है। शामाशास्त्री और गणपतिशास्त्री दोनों ने ही पाश्चात्य विचारकों के मत का खंडन किया है। दोनों का यह निश्चय मत है कि कौटिल्य का पूर्ण अस्तित्व था, भले ही उसके नामों में मतांतर पाया जाता हो। वस्तुतः इन तीनों पाश्चात्य विद्वानों के द्वारा कौटिल्य का अस्तित्व को नकारने के लिए जो बिंदु उठाए गए हैं, वे अनर्गल एवं महत्त्वहीन हैं। पाश्चात्य विद्वानों का यह कहना है कि कौटिल्य ने इस बात का कहीं उल्लेख नहीं किया है कि वह चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में अमात्य या मंत्री था, इसलिए उन्हे 'अर्थशास्त्र' का लेखक नहीं माना जा सकता है यह बचकाना तर्क है। कौटिल्य के कई सन्दर्भों से यह स्पष्ट हो चुका है कि उन्होने चन्द्रगुप्त मौर्य की सहायता से नंदवंश का नाश किया था और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी।
चाणक्य को कौटिल्य उनके कुटिल व्यवहार के कारण भी कहा गया हो सकता है।
कौटिल्य की कृतियाँ
कौटिल्य की कृतियों के संबंध में विद्वानों के बीच मतभेद पाया जाता है। कौटिल्य की कितनी कृतियाँ हैं, इस संबंध में कोई निश्चित सूचना उपलब्ध नहीं है। कौटिल्य की सबसे महत्त्पूर्ण कृति अर्थशास्त्र की चर्चा सर्वत्र मिलती है, किन्तु अन्य रचनाओं के संबंध में कुछ विशेष उल्लेख नहीं मिलता है।
चाणक्य के शिष्य कामंदक ने अपने 'नीतिसार' नामक ग्रंथ में लिखा है कि विष्णुगुप्त चाणक्य ने अपने बुद्धिबल से अर्थशास्त्र रूपी महोदधि को मथकर नीतिशास्त्र रूपी अमृत निकाला। चाणक्य का 'अर्थशास्त्र' संस्कृत में राजनीति विषय पर एक विलक्षण ग्रंथ है। इसके नीति के श्लोक तो घर घर प्रचलित हैं। पीछे से लोगों ने इनके नीति ग्रंथों से घटा बढ़ाकर वृद्धचाणक्य, लघुचाणक्य, बोधिचाणक्य आदि कई नीतिग्रंथ संकलित कर लिए। चाणक्य सब विषयों के पंडित थे। 'विष्णुगुप्त सिद्धांत' नामक इनका एक ज्योतिष का ग्रंथ भी मिलता है। कहते हैं, आयुर्वेद पर भी इनका लिखा 'वैद्यजीवन' नाम का एक ग्रंथ है। न्याय भाष्यकार वात्स्यायन और चाणक्य को कोई-कोई एक ही मानते हैं, पर यह भ्रम है जिसका मूल हेमचंद का यह श्लोक है:
वात्स्यायन मल्लनागः, कौटिल्यश्चणकात्मजः। द्रामिलः पक्षिलस्वामी विष्णु गुप्तोऽंगुलश्च सः॥यों धातुकौटिल्या और राजनीति नामक रचनाओं के साथ कौटिल्य का नाम जोड़ा गया है। कुछ विद्वानों का यह मानना है कि 'अर्थशास्त्र' के अलावा यदि कौटिल्य की अन्य रचनाओं का उल्लेख मिलता है, तो वह कौटिल्य की सूक्तियों और कथनों का संकलन हो सकता है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र
अर्थशास्त्र ग्रन्थ
अर्थशास्त्र, चाणक्य द्वारा रचित संस्कृत का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसमें राज्यव्यवस्था, कृषि, न्याय एवं राजनीति आदि के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है। अपने तरह का (राज्य-प्रबन्धन विषयक) यह प्राचीनतम ग्रन्थ है। इसकी शैली उपदेशात्मक और सलाहात्मक (instructional) है। मौर्य वंश के इतिहास-लेखन हेतु चाणक्य के अर्थशास्त्र को एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में स्वीकार किया जाता है। इस कृति को 15 अधिकरणों तथा 180 प्रकरणों में विभाजित किया गया है।
चाणक्य की राज्य की अवधारणा
राज्य की उत्पत्ति के सन्दर्भ में कौटिल्य ने स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा किन्तु कुछ संयोगवश की गई टिप्पणियों से स्पष्ट होता है कि वह राज्य के दैवी सिद्धांत के स्थान पर सामाजिक समझौते का पक्षधर था। हॉब्स, लॉक तथा रूसो की तरह राज्य की उत्पत्ति से पूर्व की प्राकृतिक दशा को वह अराजकता की संज्ञा देता है। राज्य की उत्पत्ति तब हुई जब 'मत्स्य न्याय' कानून से तंग आकर लोगों ने मनु को अपना राजा चुना तथा अपनी कृषि उपज का छठा भाग तथा स्वर्ण का दसवा भाग उसे देना स्वीकार किया। इसके बदले में राजा ने उनकी सुरक्षा तथा कल्याण का उत्तरदायित्व सम्भाला। कौटिल्य राजतंत्र का पक्षधर है।
चाणक्य की विचारधारा
ऋण, शत्रु और रोग को शेष नहीं रखना चाहिये (समाप्त कर देना चाहिए)।
• वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते है।
• शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें।
• सिंह भूखा होने पर भी तिनका नहीं खाता।
• एक ही देश के दो शत्रु परस्पर मित्र होते है।
• आपातकाल में स्नेह करने वाला ही मित्र होता है।
• एक बिगड़ैल गाय सौ कुत्तों से ज्यादा श्रेष्ठ है। अर्थात एक विपरीत स्वाभाव का परम हितैषी व्यक्ति, उन सौ लोगों से श्रेष्ठ है जो आपकी चापलूसी करते है।
• आग सिर में स्थापित करने पर भी जलाती है। अर्थात दुष्ट व्यक्ति का कितना भी सम्मान कर लें, वह सदा दुःख ही देता है।
• अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।
• सभी प्रकार के भय से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है।
• सोने के साथ मिलकर चांदी भी सोने जैसी दिखाई पड़ती है अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवश्य पड़ता है।
• ढेकुली नीचे सिर झुकाकर ही कुँए से जल निकालती है। अर्थात कपटी या पापी व्यक्ति सदैव मधुर वचन बोलकर अपना काम निकालते है।
• जो जिस कार्ये में कुशल हो उसे उसी कार्ये में लगना चाहिए।
• कठोर वाणी अग्निदाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुंचाती है।
• शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करे।
• चाणक्य ने कभी भी अग्नि, गुरू, ब्राह्मण, गौ, कुमारी कन्या, वृद्ध और बालक पर पैर न लगाने को कहा है. इन्हें पैर से छूने से आप पर बदकिस्मती का पहाड़ टूट सकता है.
• कहा जा सकता है कि ऋण मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यदि जीवन में खुशहाल रहना है तो ऋण की एक फूटी कौड़ी भी पास नहीं रखनी चाहिए। मनुष्य सबसे दुखी भूतकाल और भविष्यकाल की बातों को सोचकर होता है। केवल वर्तमान के विषय में सोचकर अपने जीवन को सफल बनाया जा सकता
• आचार्य चाणक्य कहते हैं कि शिक्षा ही मनुष्य की सबसे अच्छी और सच्ची दोस्त होती है क्योंकि एक दिन सुंदरता और जवानी छोड़कर चली जाती है परन्तु शिक्षा एक मात्र ऐसी धरोहर है जो हमेशा उसके साथ रहती है।
• व्यवसाय में लाभ से जुड़े अपने राज किसी भी व्यक्ति के साथ साझा करना आर्थिक दृष्टी से हानिकारक हो सकती है। अत: व्यवसाय की वास्तविक ज्ञान को अपने तक ही सीमित रखें तो उत्तम होगा।
• किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले कुछ प्रश्नों का उत्तर अपने आप से जरुर कर लें कि- क्या तुम सचमुच यह कार्य करना चाहते हैं? आप यह काम क्यों करना चाहते हैं? यदि इन सब का जवाब सकारात्मक मिलता है तभी उस काम की शुरुआत करनी चाहिए।
राज्य के तत्त्व : सप्तांग सिद्धांत
कौटिल्य ने पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तकों द्वारा प्रतिपादित राज्य के चार आवश्यक तत्त्वों - भूमि, जनसंख्या, सरकार व सम्प्रभुता का विवरण न देकर राज्य के सात तत्त्वों का विवेचन किया है। इस सम्बन्ध में वह राज्य की परिभाषा नहीं देता किन्तु पहले से चले आ रहे साप्तांग सिद्धांत का समर्थन करता है। कौटिल्य ने राज्य की तुलना मानव-शरीर से की है तथा उसके सावयव रूप को स्वीकार किया है। राज्य के सभी तत्त्व मानव शरीर के अंगो के समान परस्पर सम्बन्धित, अन्तनिर्भर तथा मिल-जुलकर कार्य करते हैं-
स्वाम्यमात्यजनपददुर्गकोशदण्डमित्राणि प्रकृतयः ॥अर्थशास्त्र ०६.१.०१॥
(1) स्वामी (राजा) शीर्ष के तुल्य है। वह कुलीन, बुद्धिमान, साहसी, धैर्यवान, संयमी, दूरदर्शी तथा युद्ध-कला में निपुण होना चाहिए।
(2) अमात्य (मंत्री) राज्य की आँखे हैं। इस शब्द का प्रयोग कौटिल्य ने मंत्रीगण, सचिव, प्रशासनिक व न्यायिक पदाधिकारियों के लिए भी किया है। वे अपने ही देश के जन्मजात नागरिक, उच्च कुल से सम्बंधित, चरित्रवान, योग्य, विभिन्न कलाओं में निपुण तथा स्वामीभक्त होने चाहिए।
(3) जनपद (भूमि तथा प्रजा या जनसंख्या) राज्य की जंघाएँ अथवा पैर हैं, जिन पर राज्य का अस्तित्व टिका है। कौटिल्य ने उपजाऊ, प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण, पशुधन, नदियों, तालाबों तथा वन्यप्रदेश प्रधान भूमि को उपयुक्त बताया है।
जनसंख्या में कृषकों, उद्यमियों तथा आर्थिक उत्पादन में योगदान देने वाली प्रजा सम्मिलित है। प्रजा को स्वामिभक्त, परिश्रमी तथा राजा की आज्ञा का पालन करने वाला होना चाहिए।
(4) दुर्ग (किला) राज्य की बाहें हैं, जिनका कार्य राज्य की रक्षा करना है। राजा को ऐसे किलों का निर्माण करवाना चाहिए, जो आक्रमक युद्ध हेतु तथा रक्षात्मक दृष्टिकोण से लाभकारी हों। कौटिल्य ने चार प्रकार के दुर्गों-औदिक (जल) दुर्ग, पर्वत (पहाड़ी) दुर्ग, वनदुर्ग (जंगली) तथा धन्वन (मरुस्थलीय) दुर्ग का वर्णन किया है।
(5) कोष (राजकोष) राज्य के मुख के समान है। कोष को राज्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना गया है, क्योंकि राज्य के संचालन तथा युद्ध के समय धन की आवश्यकता होती है। कोष इतना प्रचुर होना चाहिए कि किसी भी विपत्ति का सामना करने में सहायक हो। कोष में धन-वृद्धि हेतु कौटिल्य ने कई उपाय बताए हैं। संकटकाल में राजस्व प्राप्ति हेतु वह राजा को अनुचित तरीके अपनाने की भी सलाह देता है।
(6) दण्ड (बल, डण्डा या सेना) राज्य का मस्तिष्क हैं। प्रजा तथा शत्रु पर नियंत्रण करने के लिए बल अथवा सेना अत्यधिक आवश्यक तत्त्व है। कौटिल्य ने सेना के छः प्रकार बताए हैं। जैसे-वंशानुगत सेना, वेतन पर नियुक्त या किराए के सैनिक, सैन्य निगमों के सैनिक, मित्र राज्य के सैनिक, शत्रु राज्य के सैनिक तथा आदिवासी सैनिक। संकटकाल में वैश्य तथा शूद्रों को भी सेना में भर्ती किया जा सकता है। सैनिकों को धैर्यवान, दक्ष, युद्ध-कुशल तथा राष्ट्रभक्त होना चाहिए। राजा को भी सैनिकों की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना चाहिए। कौटिल्य ने दण्डनीति के चार लक्ष्य बताए हैं- अप्राप्य वस्तु को प्राप्त करना, प्राप्त वस्तु की रक्षा करना, रक्षित वस्तु का संवर्धन करना तथा संवख्रधत वस्तु को उचित पात्रों में बाँटना।
(7) सुहृद (मित्र) राज्य के कान हैं। राजा के मित्र शान्ति व युद्धकाल दोनों में ही उसकी सहायता करते हैं। इस सम्बन्ध में कौटिल्य सहज (आदर्श) तथा कृत्रिम मित्र में भेद करता है। सहज मित्र कृत्रिम मित्र से अधिक श्रेष्ठ होता है। जिस राजा के मित्र लोभी, कामी तथा कायर होते हैं, उसका विनाश अवश्यम्भावी हो जाता है।
इस प्रकार कौटिल्य का सप्तांग सिद्धांत राज्य के सावयव स्वरूप (Organic form) का निरूपण करते हुए सभी अंगो (तत्त्वों) की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालता है। यद्यपि यह सिद्धांत राज्य की आधुनिक परिभाषा से मेल नहीं खाता, किन्तु कौटिल्य के राज्य में आधुनिक राज्य के चारों तत्त्व विद्यमान हैं। जनपद भूमि व जनसंख्या है, अमात्य सरकार का भाव है तथा स्वामी (राजा) सम्प्रभुत्ता का प्रतीक है। कोष का महत्त्व राजप्रबन्ध, विकास व संवर्धन में है तथा सेना आन्तरिक शान्ति व्यवस्था तथा बाहरी सुरक्षा के लिए आवश्यक है। विदेशी मामलों में मित्र महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, किन्तु दुर्ग का स्थान आधुनिक युग में सुरक्षा-प्रतिरक्षा के अन्य उपकरणों ने ले लिया है।
राज्य का कार्य
प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन का अनुकरण करते हुए कौटिल्य ने भी राजतंत्र की संकल्पना को अपने चिंतन का केन्द्र बनाया है। वह लौकिक मामलों में राजा की शक्ति को सर्वोपरि मानता है, परन्तु कर्त्तव्यों के मामलों में वह स्वयं धर्म में बँधा है। वह धर्म का व्याख्याता नहीं, बल्कि रक्षक है। कौटिल्य ने राज्य को अपने आप में साध्य मानते हुए सामाजिक जीवन में उसे सर्वोच्च स्थान दिया है। राज्य का हित सर्वोपरि है जिसके लिए कई बार वह नैतिकता के सिद्धांतो को भी परे रख देता है।
कौटिल्य के अनुसार राज्य का उद्देश्य केवल शान्ति-व्यवस्था तथा सुरक्षा स्थापित करना नहीं, वरन् व्यक्ति के सर्वोच्च विकास में योगदान देना है। कौटिल्य के अनुसार राज्य के कार्य हैं-
सुरक्षा सम्बन्धी कार्य
वाह्य शत्रुओं तथा आक्रमणकारियों से राज्य को सुरक्षित रखना, आन्तरिक व्यवस्था न्याय की रक्षा तथा दैवी (प्राकृतिक आपदाओं) विपत्तियों- बाढ़, भूकंप, दुर्भिक्ष, आग, महामारी, घातक जन्तुओं से प्रजा की रक्षा राजा के कार्य हैं।
स्वधर्म का पालन कराना
स्वधर्म के अन्तर्गत वर्णाश्रम धर्म (वर्ण तथा आश्रम पद्धति) पर बल दिया गया है। यद्यपि कौटिल्य मनु की तरह धर्म को सर्वोपरि मानकर राज्य को धर्म के अधीन नहीं करता, किन्तु प्रजा द्वारा धर्म का पालन न किए जाने पर राजा धर्म का संरक्षण करता है।
सामाजिक दायित्व
राजा का कर्त्तव्य सर्वसाधारण के लिए सामाजिक न्याय की स्थापना करना है। सामाजिक व्यवस्था का समुचित संचालन तभी संम्भव है, जबकि पिता-पुत्र, पति-पत्नी, गुरु-शिष्य आदि अपने दायित्वों का निर्वाह करें। विवाह-विच्छेद की स्थिति में वह स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों पर बल देता है। स्त्रीवध तथा ब्राह्मण-हत्या को गम्भीर अपराध माना गया है।
जनकल्याण के कार्य
कौटिल्य के राज्य का कार्य-क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। वह राज्य को मानव के बहुमुखी विकास का दायित्व सौंपकर उसे आधुनिक युग का कल्याणकारी राज्य बना देता है। उसने राज्य को अनेक कार्य सौंपे हैं। जैसे- बाँध, तालाब व सिंचाई के अन्य साधनों का निर्माण, खानों का विकास, बंजर भूमि की जुताई, पशुपालन, वन्यविकास आदि। इनके अलावा सार्वजनिक मनोरंजन राज्य के नियंत्रण में था। अनाथों निर्धनों, अपंगो की सहायता, स्त्री सम्मान की रक्षा, पुनख्रववाह की व्यवस्था आदि भी राज्य के दायित्व थे।
इस प्रकार कौटिल्य का राज्य सर्वव्यापक राज्य है। जन-कल्याण तथा अच्छे प्रशासन की स्थापना उसका लक्ष्य है, जिसमें धर्म व नैतिकता का प्रयोग एक साधन के रूप में किया जाता है। कौटिल्य का कहना है,
‘‘प्रजा की प्रसन्नता में ही राजा की प्रसन्नता है। प्रजा के लिए जो कुछ भी लाभकारी है, उसमें उसका अपना भी लाभ है।’’
एक अन्य स्थान पर उसने लिखा है।
‘‘बल ही सत्ता है, अधिकार है। इन साधनों के द्वारा साध्य है प्रसन्नता।’’
इस सम्बन्ध में सैलेटोरे का कथन है, ‘‘जिस राज्य के पास सत्ता तथा अधिकार है, उसका एकमात्र उद्देश्य अपनी प्रजा की प्रसन्नता में वृद्धि करना है। इस प्रकार कौटिल्य ने एक कल्याणकारी राज्य के कार्यों को उचित रूप में निर्देषित किया है।’’
कूटनीति तथा राज्यशिल्प
कौटिल्य ने न केवल राज्य के आन्तरिक कार्य, बल्कि वाह्य कार्यो की भी विस्तार से चर्चा की है। इस सम्बन्ध में वह विदेश नीति, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों तथा युद्ध व शान्ति के नियमों का विवेचन करता है। कूटनीति के सम्बन्धों का विश्लेषण करने हेतु उसने मण्डल सिद्धांत प्रतिपादित किया है |
मण्डल सिद्धांत
मण्डल (राजनैतिक मॉडल)
कौटिल्य ( चाणक्य) ने अपने मण्डल सिद्धांत में विभिन्न राज्यों द्वारा दूसरे राज्यों के प्रति अपनाई नीति का वर्णन किया। प्राचीन काल में भारत में अनेक छोटे-छोटे राज्यों का अस्तित्व था। शक्तिशाली राजा युद्ध द्वारा अपने साम्राज्य का विस्तार करते थे। राज्य कई बार सुरक्षा की दृष्टि से अन्य राज्यों में समझौता भी करते थे। कौटिल्य के अनुसार युद्ध व विजय द्वारा अपने साम्राज्य का विस्तार करने वाले राजा को अपने शत्रुओं की अपेक्षाकृत मित्रों की संख्या बढ़ानी चाहिए, ताकि शत्रुओं पर नियंत्रण रखा जा सके। दूसरी ओर निर्बल राज्यों को शक्तिशाली पड़ोसी राज्यों से सतर्क रहना चाहिए। उन्हें समान स्तर वाले राज्यों के साथ मिलकर शक्तिशाली राज्यों की विस्तार-नीति से बचने हेतु एक गुट या ‘मंडल’ बनाना चाहिए।
कौटिल्य ने 4 मंडलों का उल्लेख किया है-
प्रथम मंडल- इसमें स्वयं विजिगीषु, उसका मित्र, उसके मित्र का मित्र शामिल है।
द्वितीय मंडल- इस मंडल में विजिगीषु का शत्रु शामिल होता है, साथ ही विजिगीषु के शत्रु का मित्र और शत्रु के मित्र का मित्र सम्मिलित किया जाता है।
तृतीय मंडल- इस मंडल में मध्यम, उसका मित्र एवं उसके मित्र का मित्र शामिल किया जाता है।
चतुर्थ मंडल- इस मंडल में उदासीन, उसका मित्र और उसके मित्र का मित्र शामिल किया जाता है।विजिगीषु- ऐसा राजा जो विजय का इच्छुक है और अपने राज्य में उत्तम शासन स्थापित करना चाहता है।अरि - ऐसा नृपति जिसका राज्य विजिगीषु की सीमा के साथ लगा हो अर्थात वह विजिगीषु का स्वाभाविक शत्रु है।मध्यम - ऐसा नृपति जिसका राज्य विजिगीषु और उसके शत्रु दोनों की सीमाओं से लगा हो। अतः वह इनमे से किसी का भी शत्रु या मित्र हो सकता है।उदासीन- ऐसा नृपति जिसके राज्य की स्थिति विजिगीषु के शत्रु और मध्यम दोनों से परे हो परन्तु वह इतना बलशाली हो की वह संकट के समय किसी की भी सहायता या विरोध करने में समर्थ हो। इसलिए उसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती है।पार्षिंग्राह- ऐसा नृपति जिसका राज्य विजिगीषु के राज्य के पीछे की ओर सीमा से लगा हो। अतः वह युद्ध के समय पीछे से उपद्रव खड़ा कर सकता है। वह स्वाभाविक रूप से विजिगीषु का शत्रु होता है।आक्रन्द- ऐसा नृपति जिसका राज्य पार्षिंग्राह की राज्य की सीमा के साथ लगा हो अतः वह पार्षिंग्राह का स्वाभाविक शत्रु होता है और विजिगीषु का स्वाभाविक मित्र होता है।पार्षिंग्राहासागर- ऐसा नृपति जिसका राज्य आक्रन्द की सीमा के साथ लगा हो अतः वह आक्रन्द का शत्रु होता है पार्शिनग्राह का परोक्ष मित्र होता है और विजिगीषु का परोक्ष शत्रु होता है।आक्रंदासार- ऐसा नृपति जिसका राज्य पार्षिंग्राहासागर के राज्य के सीमा के साथ लगा हो, अतः वह पार्षिंग्राहासागर का स्वाभाविक शत्रु होता है; आक्रन्द का और विजिगीषु का परोक्ष मित्र होता है।इन चारों मंडलों के संयोग से वृहद् राजयमंडल की रचना होती है। चूँकि प्रत्येक मंडल में ३-३ राज्य आते हैं, इसलिए वृहद् राजयमंडल में 12 राज्य आ जाते हैं। इन्हे राज्य प्रकृतियाँ कहा जाता है।
कौटिल्य का यह सिद्धांत यथार्थवाद पर आधारित है, जो युद्धों को अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की वास्तविकता मानकर संधि व समझौते द्वारा शक्ति-सन्तुलन बनाने पर बल देता है।
छः सूत्रीय विदेश नीति
कौटिल्य ने विदेश सम्बन्धों के संचालन हेतु छः प्रकार की नीतियों का विवरण दिया है-
(1) संधि शान्ति बनाए रखने हेतु समतुल्य या अधिक शक्तिशाली राजा के साथ संधि की जा सकती है। आत्मरक्षा की दृष्टि से शत्रु से भी संधि की जा सकती है। किन्तु इसका लक्ष्य शत्रु को कालान्तर निर्बल बनाना है।
(2) विग्रह या शत्रु के विरुद्ध युद्ध का निर्माण।
(3) यान या युद्ध घोषित किए बिना आक्रमण की तैयारी,
(4) आसन या तटस्थता की नीति,
(5) संश्रय अर्थात् आत्मरक्षा की दृष्टि से राजा द्वारा अन्य राजा की शरण में जाना,
(6) द्वैधीभाव अर्थात् एक राजा से शान्ति की संधि करके अन्य के साथ युद्ध करने की नीति।
कौटिल्य के अनुसार राजा द्वारा इन नीतियों का प्रयोग राज्य के कल्याण की दृष्टि से ही किया जाना चाहिए।
कूटनीति आचरण के चार सिद्धांत
कौटिल्य ने राज्य की विदेश नीति के सन्दर्भ में कूटनीति के चार सिद्धांतों साम (समझाना, बुझाना), दाम (धन देकर सन्तुष्ट करना), दण्ड (बलप्रयोग, युद्ध) तथा भेद (फूट डालना) का वर्णन किया।
कौटिल्य के अनुसार प्रथम दो सिद्धांतों का प्रयोग निर्बल राजाओं द्वारा तथा अंतिम दो सिद्धांतों का प्रयोग सबल राजाओं द्वारा किया जाना चाहिए, किन्तु उसका यह भी मत है कि साम दाम से, दाम भेद से और भेद दण्ड से श्रेयस्कर है। दण्ड अर्थात् युद्ध का प्रयोग अन्तिम उपाय के रूप में किया जाए, क्योंकि इससे स्वयं की भी क्षति होती है।
गुप्तचर व्यवस्था
कौटिल्य ने गुप्तचरों के प्रकारों व कार्यों का विस्तार से वर्णन किया है। गुप्तचर विद्यार्थी गृहपति, तपस्वी, व्यापारी तथा विष -कन्याओं के रूप में हो सकते थे। राजदूत भी गुप्तचर की भूमिका निभाते थे। इनका कार्य देश-विदेश की गुप्त सूचनाएँ राजा तक पहुँचाना होता था। ये जनमत की स्थिति का आंकलन करने, विद्रोहियों पर नियंत्रण रखने तथा शत्रु राज्य को नष्ट करने में योगदान देते थे। कौटिल्य ने गुप्तचरों को राजा द्वारा धन व मान देकर सन्तुष्ट रखने का सुझाव दिया है।
चाणक्य के विचार
लोगो के जीवन में महापुरुषों के विचारो का काफी प्रभाव होता है। चाणक्य के विचारो ने भी कई लोगो के जीवन को उन्नत किया है। चाणक्य की कूटनीति और इसके सिध्धांतो के बारे में कई पुस्तके लिखी गयी है।चाणक्य के जीवन को पढ़नेवाला और इसका अनुसरण करनेवाला एक बड़ा वर्ग है। चाणक्य के विचारो को अनमोल कहा जाता है। चाणक्य के विचार अध्यापक, राजनीतिज्ञ और व्यवसायिक लोगो को काफी पसंद है।
आचार्य चाणक्य का गौरवशाली व्यक्तित्व के बारे में पढ़ने से नई ऊर्जा का संचार होता है। कौटिल्य के विचार आज भी प्रेरणादायी बनते है।
चाणक्य और मकियावेली
यह सत्य है कि कौटिल्य ने राष्ट्र की रक्षा के लिए गुप्त प्रणिधियों के एक विशाल संगठन का वर्णन किया है। शत्रुनाश के लिए विषकन्या, गणिका, औपनिषदिक प्रयोग, अभिचार मंत्र आदि अनैतिक एवं अनुचित उपायों का विधान है और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए महान धन-व्यय तथा धन-क्षय को भी (सुमहताऽपि क्षयव्ययेन शत्रुविनाशोऽभ्युपगन्तव्य:) राष्ट्र-नीति के अनुकूल घोषित किया है।
‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में ऐसी चर्चाओं को देखकर ही मुद्राराक्षसकार कवि विशाखादत्त चाणक्य को कुटिलमति (कौटिल्य: कुटिलमतिः) कहा है और बाणभट्ट ने ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ को ‘निर्गुण’ तथा ‘अतिनृशंसप्रायोपदेशम्’ (निर्दयता तथा नृशंसता का उपदेश देने वाला) कहकर निन्दित बतलाया है। 'मंजुश्री मूलकल्प' नाम की एक नवीन उपलब्ध ऐतिहासिक कृति में कौटिल्य को ‘दुर्मति’, क्रोधन और ‘पापक’ पुकारकर गर्हा का पात्र प्रदर्शित किया गया है।
प्राच्यविद्या के विशेषज्ञ अनेक आधुनिक पाश्चात्य विद्वानों ने भी उपर्युक्त अनैतिक व्यवस्थाओं को देखकर कौटिल्य की तुलना यूरोप के प्रसिद्ध लेखक और राजनीतिज्ञ मेकियावली से की है, जिसने अपनी पुस्तक ‘द प्रिन्स’ में राजा को लक्ष्य-प्राप्ति के लिए उचित अनुचित सभी साधनों का आश्रय लेने का उपदेश दिया है। विण्टरनिट्ज आदि पाश्चात्य विद्वान् कौटिल्य तथा मेकियावली में निम्नलिखित समानताएं प्रदर्शित करते हैं:
(क) मेकियावली और कौटिल्य दोनों राष्ट्र को ही सब कुछ समझते हैं। वे राष्ट्र को अपने में ही उद्देश्य मानते हैं।
(ख) कौटिल्य-नीति का मुख्य आधार है, ‘आत्मोदय: परग्लानि;’ अर्थात् दूसरों की हानि पर अपना अभ्युदय करना। मेकियावली ने भी दूसरे देशों की हानि पर अपने देश की अभिवृद्धि करने का पक्ष-पोषण किया है। दोनों एक समान स्वीकार करते हैं कि इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए कितने भी धन तथा जन के व्यय से शत्रु का विनाश अवश्य करना चाहिए।
(ग) अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए किसी भी साधन, नैतिक या अनैतिक, का आश्रय लेना अनुचित नहीं है। मेकियावली और कौटिल्य दोनों का मत है कि साध्य को सिद्ध करना ही राजा का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। साधनों के औचित्य या अनौचित्य की उसे चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
(घ) दोनों युद्ध को राष्ट्र-नीति का आवश्यक अंग मानते हैं। दोनों की सम्मति में प्रत्येक राष्ट्र को युद्ध के लिए उद्यत रहना चाहिए, क्योंकि इसी के द्वारा देश की सीमा तथा प्रभाव का विस्तार हो सकता है।
(ङ) अपनी प्रजा में आतंक स्थापित करके दृढ़ता तथा निर्दयता से उस पर शासन करना दोनों एक समान प्रतिपादित करते हैं। दोनों एक विशाल सुसंगठित गुप्तचर विभाग की स्थापना का समर्थन करते हैं, जो प्रजा के प्रत्येक पार्श्व में प्रवेश करके राजा के प्रति उसकी भक्ति की परीक्षा करे और शत्रु से सहानुभूति रखने वाले लोगों को गुप्त उपायों से नष्ट करने का यत्न करे।
कौटिल्य तथा मेकियावली में ऐसी सदृशता दिखाना युक्तिसंगत नहीं। निस्सन्देह कौटिल्य भी मेकियावली के समान यथार्थवादी था और केवल आदर्शवाद का अनुयायी न था। परन्तु यह कहना कि कौटिल्य ने धर्म या नैतिकता को सर्वथा तिलांंजलि दे दी थी, सत्यता के विपरीत होगा। कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ के प्रथम अधिकरण में ही स्थापना की है;तस्मात् स्वधर्म भूतानां राजा न व्यभिचारयेत्।स्वधर्म सन्दधानो हि, प्रेत्य चेह न नन्दति॥ (1/3)
अर्थात्- राजा प्रजा को अपने धर्म से च्युत न होने दे। राजा भी अपने धर्म का आचरण करे। जो राजा अपने धर्म का इस भांति आचरण करता है, वह इस लोक और परलोक में सुखी रहता है।
इसी प्रथम अधिकरण में ही राजा द्वारा अमर्यादाओं को व्यवस्थित करने पर भी बल दिया गया है और वर्ण तथा आश्रम-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए आदेश दिया गया है। यहां पर त्रयी तथा वैदिक अनुष्ठान को प्रजा के संरक्षण का मूल आधार बतलाया गया है। कौटिल्य ने स्थान-स्थान पर राजा को वृद्धों की संगत करने वाला, विद्या से विनम्र, जितेन्द्रिय और काम-क्रोध आदि शत्रु-षड्वर्ग का दमन करने वाला कहा है। ऐसा राजा अधार्मिक अथवा अत्याचारी बनकर किस प्रकार प्रजा-पीड़न कर सकता है ? इसके विपरीत राजा को प्रजा के लिए पितृ-तुल्य कहा गया है, जो अपनी प्रजा का पालन-पोषण, संवर्धन, संरक्षण, भरण, शिक्षण इत्यादि वैसा ही करता है जैसा वह अपनी सन्तान का करता है।
यह ठीक है कि कौटिल्य ने शत्रुनाश के लिए अनैतिक उपायों के करने का भी उपदेश दिया है। परन्तु इस सम्बन्ध में अर्थशास्त्र के निम्न वचन को नहीं भूलना चाहिए:एवं दूष्येषु अधार्मिकेषु वर्तेत, न इतरेषु।'' (5/2)
अर्थात्- इन कूटनीति के उपायों का व्यवहार केवल अधार्मिक एवं दुष्ट लोगों के साथ ही करे, धार्मिक लोगों के साथ नहीं। (धर्मयुद्ध में भी अधार्मिक व्यवहार सर्वथा वर्जित था। केवल कूट-युद्ध में अधार्मिक शत्रु को नष्ट करने के लिए इसका प्रयोग किया जा सकता था।)
मूल्यांकन
right|thumb|300px|चाणक्य की नीति का प्रभाव : २५० ईसापूर्व में मौर्य साम्राज्य ; अपने चरमोत्कर्ष पर यह साम्राज्य मुगल साम्राजय या ब्रिटिश साम्राज्य से भी विशाल था।
कौटिल्य का राज्य-सिद्धांत भारतीय राजनीतिक चिन्तन हेतु महत्त्वपूर्ण देन है। उन्होंने राजनीतिक शास्त्र को धार्मिकता की ओर अधिक झुके होने की प्रवृत्ति से मुक्त किया। यद्यपि वह धर्म व नैतिकता का विरोध नहीं करता, किन्तु उन्होंने राजनीति को साधारण नैतिकता के बन्धनों से मुक्त रखा है। इस दृष्टि से उनके विचार यूरोपीय दार्शनिक मैकयावली के विचारों का पूर्व संकेत प्रतीत होते हैं। इस आधार पर उसे ‘‘भारत का मैकयावली’’ भी कहा जाता है। सेलीटोर का मत है कि कौटिल्य की तुलना अरस्तु से करना उचित होगा, क्योंकि दोनों ही सत्ता हस्तगत करने के स्थान पर राज्य के उद्देश्यों को अधिक महत्त्व देते हैं। यथार्थवादी होने के नाते कौटिल्य ने राज्य के व्यवहारिक पक्ष पर अधिक ध्यान केन्द्रित किया है। कौटिल्य का राज्य यद्यपि सर्वाधिकारी है, किन्तु वह जनहित के प्रति उदासीन नहीं है।
इन्हें भी देखें
अर्थशास्त्र ग्रन्थ
चाणक्यनीति
चन्द्रगुप्त मौर्य
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
चाणक्य भारतवर्ष (टीवी सीरीज)
चाणक्य नीति (गूगल पुस्तक)
श्रेणी:भारत के अर्थशास्त्री
श्रेणी:भारत का इतिहास
श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना
श्रेणी:सैन्य-सिद्धान्तकार