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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

जांजगीर का विष्णु मंदिर

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Janjagir vishnu mandir1.jpg कल्चुरी नरेश जाज्वल्य देव प्रथम जांजगीर का विष्णु मंदिर ११ वीं शताब्दी विष्णु मध्य भारत जांजगीर, छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़ के इस दक्षिण कोशल क्षेत्र में कल्चुरी नरेश जाज्वल्य देव प्रथम ने भीमा तालाब के किनारे ११ वीं शताब्दी में एक मंदिर का निर्माण करवाया था। यह मंदिर भारतीय स्थापत्य का अनुपम उदाहरण है। मंदिर पूर्वाभिमुखी है, तथा सप्तरथ योजना से बना हुआ है। मंदिर में शिखर हीन विमान मात्र है। गर्भगृह के दोनो ओर दो कलात्मक स्तंभ है जिन्हे देखकर यह आभास होता है कि पुराने समय में मंदिर के सामने महामंडप निर्मित था। परन्तु कालांतर में नहीं रहा। मंदिर का निर्माण एक ऊँची जगती पर हुआ है। मूर्ति-शिल्प मंदिर के चारों ओर अत्यन्त सुंदर एवं अलंकरणयुक्त प्रतिमाओ का अंकन है जिससे तत्कालीन मूर्तिकला के विकास का पता चलता है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार के दोनो ओर देवी गंगा और जमुना के साथ द्वारपाल जय-विजय स्थित हैं। इसके अतिरिक्त त्रिमूर्ति के रूप में ब्रह्मा, विष्णु और महेश की मूर्ति है। ठीक इसके ऊपर गरुणासीन भगवान विष्णु की मूर्ति स्थित है। मंदिर की जगती के दोनों फलक में अलग-अलग दृश्य अंकित हैं। एक फलक पर धनुर्धारी राम, सीता, लक्ष्मण तथा रावण और मृग अंकित हैं। दूसरे फलक पर रावण का भिक्षाटन और सीता हरण के दृश्य है। मंदिर के श्री राम द्वारा मृग वध और रावण द्वारा सीता हरण के दृश्य को मंदिर के प्रवेशद्वार के दोनों पार्शवों पर दो-दो के जोड़े में अर्द्ध स्तम्भ हैं जो दो मुख्य खंडों में बँटे हैं। इसमें लंबोदर तथा त्रिशीर्ष मुकुट युक्त कुबेर का अंकन है। मंदिर के शिखर में मृदंगवादिनी, पुरुष से आलिंगनबद्ध मोहिनी, खड्गधारी, नृत्यांगना मंजुघोषा, झांझर बजाती हंसावली आदि देवांगनाएँ अंकित हैं। मंदिर की उत्तरी जंघा में आंखों में अंजन लगाती अलसयुक्त लीलावती, चंवरधारी चामरा, बांसुरी बजाती वंशीवादिनी, मृदंगवादिनी, दर्पण लेकर बिंदी लगाती विधिवेत्ता आदि देवांगनाएं स्थित हैं। दक्षिण जंघा में वीणा वादिनी सरस्वती, केश गुम्फिणी, लीलावती, हंसावली, मानिनी, चामरा आदि देवांगनाएँ स्थित हैं। मंदिर के उत्तरी, दक्षिणी और पश्चिमी जंघा में विभिन्न मुद्राओं में साधकों की मूर्तियाँ अंकित है। इसके अतिरिक्त उत्तरी जंघा के निचले छेद में स्थित मूर्ति तथा प्रवेशद्वार के दोनों पार्श्वों में अंकित संगीत समाज के दृश्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मंदिर के पृष्ठ भाग में सूर्य देव विराजमान हैं। मूर्ति का एक हाथ भग्न है लेकिन रथ और उसमें जुते सात घोड़े स्पष्ट हैं। यहीं नीचे की ओर कृष्ण कथा से सम्बंधित एक रोचक अंकन मंदिर के है, जिसमें वासुदेव कृष्ण को दोनों हाथों से सिर के ऊपर उठाए गतिमान दिखाये गये हैं। इसी प्रकार की अनेक मूर्तियाँ नीचे की दीवारों में खचित हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी समय में बिजली गिरने से मंदिर ध्वस्त हो गया था जिससे मूर्तियां बिखर गयी। उन मूर्तियों को मंदिर की मरम्मत करते समय दीवारों पर जड़ दिया गया। मंदिर के चारो ओर अन्य कलात्मक मूर्तियों का भी अंकन है जिनमे से मुख्य रूप से भगवान विष्णु के दशावतारो में से वामन, नरसिह, कृष्ण और राम की प्रतिमाएँ है। छत्तीसगढ के किसी भी मंदिर में रामायण से सम्बंधित इतने दृश्य कहीं नहीँ मिलते जितने इस विष्णु मंदिर में हैं। यहाँ रामायण के 10 से 15 दृश्यो का भव्य एवं कलात्मक अंकन देखने को मिलता है। इतनी सजावट के बावजूद मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है। यह मंदिर सूना है और एक दीप के लिए तरस रहा है। किंवदंती इस मंदिर के निर्माण से संबंधित अनेक जनुश्रुतियाँ प्रचलित हैं। एक दंतकथा के अनुसार एक निश्चित समयावधि (कुछ लोग इस छैमासी रात कहते हैं) में शिवरीनारायण मंदिर और जांजगीर के इस मंदिर के निर्माण में प्रतियोगिता थी। भगवान नारायण ने घोषणा की थी कि जो मंदिर पहले पूरा होगा, वे उसी में प्रविष्ट होंगे। शिवरीनारायण का मंदिर पहले पूरा हो गया और भगवान नारायण उसमें प्रविष्ट हुए। जांजगीर का यह मंदिर सदा के लिए अधूरा छूट गया। एक अन्य दंत कथा के अनुसार इस मंदिर निर्माण की प्रतियोगिता में पाली के शिव मंदिर को भी सम्मिलित बताया गया है। इस कथा में पास में स्थित शिव मंदिर को इसका शीर्ष भाग बताया गया है। एक अन्य दंतकथा जो महाबली भीम से जुड़ी है, भी प्रचलित है। कहा जाता है कि मंदिर से लगे भीमा तालाब को भीम ने पांच बार फावड़ा चलाकर खोदा था। किंवदंती के अनुसार भीम को मंदिर का शिल्पी बताया गया है। इसके अनुसार एक बार भीम और विश्वकर्मा में एक रात में मंदिर बनाने की प्रतियोगिता हुई। तब भीम ने इस मंदिर का निर्माण कार्य आरम्भ किया। मंदिर निर्माण के दौरान जब भीम की छेनी-हथौड़ी नीचे गिर जाती तब उसका हाथी उसे वापस लाकर देता था। लेकिन एक बार भीम की छेनी पास के तालाब में चली गयी, जिसे हाथी वापस नहीं ला सका और सवेरा हो गया। भीम को प्रतियोगिता हारने का बहुत दुःख हुआ और गुस्से में आकर उसने हाथी के दो टुकड़े कर दिया। इस प्रकार मंदिर अधूरा रह गया। आज भी मंदिर परिसर में भीम और हाथी की खंडित प्रतिमा है। चित्र दीर्घा सन्दर्भ yes श्रेणी:छत्तीसगढ़ श्रेणी:कृष्ण मन्दिर श्रेणी:स्थापत्य श्रेणी:हिन्दी विकि डीवीडी परियोजना श्रेणी:जांजगीर-चाम्पा ज़िला