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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

बैकुण्ठ चतुर्दशी मेला, श्रीनगर

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उत्तराखण्ड के गढ़वाल अंचल में श्रीनगर में बैकुंठ चतुर्दशी का मेला प्रतिवर्ष लगा करता है। विभिन्न पर्वों की भांति वैकुण्ठ चतुर्दशी वर्षभर में पडने वाला हिन्दू समाज का महत्वपूर्ण पर्व है। सामान्यतः दीपावली तिथि से 14 वे दिन बाद आने वाले साल का यह पर्व धार्मिक महत्व का है। इस अवसर पर विभिन्न शिवालयों में पूजा/अर्चना साधना का विशेष महत्व है। गढवाल जनपद के प्रसिद्ध शिवालयों श्रीनगर में कमलेश्वर तथा थलीसैण में बिन्सर शिवालय में इस पर्व पर अधिकाधिक संख्या में श्रृद्धालु दर्शन हेतु आते हैं तथा इस पर्व को आराधना व मनोकामना पूर्ति का मुख्य पर्व मानते हैं। श्रीनगर स्थित कमलेश्वर मन्दिर पौराणिक मन्दिरों में से है। इसकी अतिशय धार्मिक महत्ता है, किवदंती है कि यह स्थान देवताओं की नगरी भी रही है। इस शिवालय में भगवान विष्णु ने तपस्या कर सुदर्शन-चक्र प्राप्त किया तो श्री राम ने रावण वध के उपरान्त ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति हेतु कामना अर्पण कर शिव जी को प्रसन्न किया व पापमुक्त हुए। कथा वैकुण्ठ चतुर्दशी कथा का एक वर्णन इस प्रकार है- दिया था चक्र शुक्ता कार्तिक को, करी जब भाव से पूजा श्री चोदश शुक्ला कार्तिक को, दिया जब दर्शन शिव गिरिजा। तभी से शुक्ला चौदश का हुआ विख्यात यह मेला। पुत्र वरदान शंकर दे, काटकर पाप का झेला। स्पष्ट है कि इस स्थान की प्राचीन महत्ता के कारण कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की चौदवीं तिथि को भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र प्राप्ति का पर्व माना गया है। इसे उपलब्धि का प्रतीक मानकर आज भी श्रृद्धालू पुत्र प्राप्ति की कामना से प्रतिवर्ष इस पर्व पर रात्रि में साधना करने हेतु मन्दिर में आते हैं। तो अनेक श्रृद्धालु दर्शन व मोक्ष के भाव से इस मन्दिर में आते हैं। जिससे उत्तराखण्ड के गढवाल क्षेत्र में यह मेला एक विशिष्ठ धार्मिक मेले का रूप ले चुका है। ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि वैकुण्ठ चतुर्दशी मेले के महत्व के साथ-साथ कमलेश्वर मंदिर के महत्व का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को भी समझना आवश्यक है। श्रीनगर जो प्राचीन काल में श्री क्षेत्र कहलाता था। त्रेता युग में रावण वधकर रामचन्द्र जी द्वारा यहाँ पर 108 कमल प्रतिदिन एक माह तक भगवान शिव का अर्पण किया जाने का वर्णन मिलता है। प्रतिवर्ष कार्तिक मास की त्रिपुरोत्सव पूर्णमासी को जब विष्णु भगवान ने सहस कमल पुष्पों से अर्चनाकर शिव को प्रसन्न कर सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था, उस आधार पर वैकुण्ठ चतुर्दशी पर्व पर पुत्र प्राप्ति की कामना हेतु दम्पत्ति रात्रि को हाथ में दीपक धारण कर भगवान शंकर को फल प्राप्ति हेतु प्रसन्न करते हैं। वर्तमान वैकुण्ठ चतुर्दशी मेला वैकुण्ठ चतुर्दशी मेला वर्तमान में एक पर्व व पूजा आराधना तक सीमित नहीं है। श्रीनगर की बढती आबादी व गढवाल के इस शहर की केन्द्रीय भौगोलिक स्थिति व इस शहर के शैक्षणिक केन्द्र (विश्व विद्यालय, पॉलिटेक्निक, आई.टी.आई.) होने के कारण एक व्यापक धार्मिक, सांस्कृतिक आयोजन का स्वरूप ले चुका है। प्रतिवर्ष नगरपालिका परिषद श्रीनगर द्वारा वैकुण्ठ चतुर्दशी पर्व से लगभग 5-6 दिन तक व्यापक सांस्कृतिक कार्यक्रमों, खेलकूद प्रतियोगिताओं व स्थानीय संस्कृति पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों को और व्यापक स्वरूप प्रदान कर तथा इनका प्रचार प्रसार कर कमलेश्वर मन्दिर से सम्बन्धित पौराणिक/ धार्मिक मान्यताओं को उजागर कर उन पर आधारित कार्यक्रम तैयार कर इस अवसर पर पर्यटकों को भी आकर्षित किया जा सकता है। श्रीनगर की भौगोलिक स्थिति श्रीनगर शहर जो कि ऋषिकेश से 107 कि.मी. पौडी से 29 कि.मी.कोटद्वार से 135 कि.मी.दूरी पर है व बद्री-केदार यात्रा मार्ग पर स्थित है पर्यटकों के आवागमन के दृष्टिकोण से उपयुक्त स्थल है। इस आयोजन को व्यवस्थित कर व व्यापक स्वरूप देकर पर्यटकों के उपयोग हेतु प्रचारित किया जा सकता है। कैसे पहुंचें श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर अवस्थित है तथा चार धाम यात्रा मार्ग पर पड़ता है एवं राज्य के अन्य मुख्य शहरों से सड़क मार्ग से जुडा है। बस, टैक्सी तथा अन्य स्थानीय यातायात की सुविधायें उपलब्ध है। निकटतम रेलवे स्टेशन कोटद्वार- 137 किमी एवं ऋषिकेश 105 किमी0 निकटतम हवाई अड्डा जौलीग्रांट 123 किमी0 श्रेणी:गढ़वाल