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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

अद्भुत रस

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अप्रैल 2020 अदभुत रस, भारतीय काव्य शास्त्र के विभिन्न रसों में से एक है, इसका स्थायी भाव आश्चर्य होता है। जब किसी जीव के मन में विचित्र अथवा आश्चर्यजनक वस्तुओं को देखकर जो विस्मय आदि का भाव उत्पन्न होता है , उसे अद्भुत रस कहा जाता है। इसके अन्दर आँसु आना, रोमांच, गद्गद होना, काँपना, आँखे फाड़कर देखना आद शामिल हैं। अद्भुत रस के भरतमुनि ने दो भेद दिये हैं: दिव्य तथा आनन्दज। वैष्णव आचार्य इसके दृष्ट, श्रुत, संकीर्तित तथा अनुमित नामक भेद करते हैं। उदाहरण : अखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लिख मातु। चकित भई गद्गद बचना, विकसित दृग पुलकातु।। वर्णन साहित्यकारों द्वारा परिभाषाहिन्दी के आचार्य देव ने अद्भुत रस का यह लक्षण किया है - ‘आहचरज देखे सुने बिस्मै बाढ़त। चित्त अद्भुत रस बिस्मय बढ़ै अचल सचकित निमित्त’। भरतमुनि ने वीर रस से अद्भुत की उत्पत्ति बताई है तथा इसका वर्ण पीला एवं देवता ब्रह्मा कहा है। विश्वनाथ के अनुसार इसके देवता गन्धर्व हैं। ‘विस्मय’ की परिभाषा ‘सरस्वतीकण्ठाभरण’ में दी गई है - ‘विस्मयश्चित्तविस्तार: पदार्थातिशयादिभि:’ किसी अलौकिक पदार्थ के गोचरीकरण से उत्पन्न चित्त का विस्तार विस्मय है। विश्वनाथ ने ‘साहित्यदर्पण’ में इस परिभाषा को दुहराते हुए विस्मय को चमत्कार का पर्याय बताया है - ‘चमत्कारश्चित्तविस्तार रूपो विस्मयापरपर्याय:’। अतएव चित्त की वह चमत्कृत अवस्था, जिसमें वह सामान्य की परिधि से बाहर उठकर विस्तार लाभ करता है, ‘विस्मय’ कहलायेगी। वास्तव में यह विस्मय या चमत्कार प्रत्येक गहरी अनुभूति का आवश्यक अंग है और इसीलिए यह प्रत्येक रस की प्रतीति में वर्तमान रहता है। भानुदत्त ने कहा है कि विस्मय सभी रसों में संचार करता है। विश्वनाथ रसास्वाद के प्रकार को समझाते हुए कहते हैं कि रस का प्राण ‘लोकोत्तर चमत्कार’ है और इस प्रकार सर्वत्र, सम्पूर्ण रसगर्भित स्थानों में अद्भुत रस माना जाना चाहिए। इस सम्बन्ध में उन्होंने निम्नलिखित पंक्तियाँ उद्धृत की हैं - ‘रसे सारश्चमत्कार: सर्वत्राप्यनुभुयते। तच्चमत्कारसारत्वे सर्वत्राप्यद्भुतो रस:। तस्मादद्भुतमेवाह कृती नारायणो रसम्।’ अर्थात् सब रसों में चमत्कार साररूप से (स्थायी) होने से सर्वत्र अद्भुत रस ही प्रतीत होता है। अतएव, नारायण पण्डित केवल एक अद्भुत रस ही मानते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मनोविज्ञानियों ने भी विस्मय को प्रधान भावों में गृहीत किया है तथा उसकी प्रवृत्ति ‘जिज्ञासा’ से बताई है। वास्तव में आदिम मानव को प्रकृति की क्रीड़ास्थली के संसर्ग में भय एवं आश्चर्य अथवा विस्मय, इन दो भावों की ही मुख्यतया प्रतीति हुई होगी। कला एवं काव्य के आकर्षण में विस्मय की भावना सर्वाधिक महत्त्व रखती है। कवि एवं कलाकार जिस वस्तु का सौन्दर्य चित्रित करना चाहते हैं, उसमें कोई लोक को अतिक्रान्त करने वाला तत्त्व वर्तमान रहता है, जो अपनी असाधारणता से भाव को अभिभूत कर लेता है। अंग्रेज़ी साहित्य के रोमांटिक कवियों ने काव्य की आत्मा विस्मय को ही स्वीकार किया था। अतएव, अद्भुत रस का महत्त्व स्वयं सिद्ध है। साहित्य शास्त्रियों ने रस के विरोध एवं अविरोध का व्याख्यान किया है। इन्हें भी देखें रस (काव्य शास्त्र) सन्दर्भ श्रेणी:रस श्रेणी:काव्य शास्त्र