411 REFERENCE · Wikipedia
ॡ
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ॡ देवनागरी लिपि का दसवाँ अक्षर तथा स्वर है।
श्रेणी:भारतीय अक्षर
देवनागरी स्वर 'ऌ' एवं 'ॡ' का परिचय और पाणिनीय यङन्त रूप
ऌ (ह्रस्व) और ॡ (दीर्घ) देवनागरी लिपि और संस्कृत वर्णमाला के सबसे दुर्लभ और प्राचीन स्वर हैं। आधुनिक भारतीय भाषाओं (जैसे हिंदी, मराठी आदि) में इनका प्रयोग व्यावहारिक रूप से समाप्त हो चुका है, परंतु संस्कृत व्याकरण और प्राचीन ग्रंथों की संरचना को समझने के लिए इनका ऐतिहासिक और सैद्धांतिक महत्व अत्यंत गहरा है।
मूल परिचय एवं उच्चारण
ह्रस्व स्वर 'ऌ' (ह्रस्व लृ): यह संस्कृत वर्णमाला का नवम स्वर है। इसका उच्चारण जिह्वा को दंत भाग के समीप ले जाकर 'लृ' (जैसे 'क्लृप्त' में) की भांति किया जाता है। संपूर्ण संस्कृत वाङ्मय में यह स्वर केवल एक ही मूल धातु 'क्लृपू सामर्थ्ये' (कल्पना करना, समर्थ होना) और उससे निष्पन्न शब्दों (जैसे— क्लृप्त, क्लृप्ति, कल्पमान) में ही दिखाई देता है।
दीर्घ स्वर 'ॡ' (दीर्घ लृ): यह का ही दीर्घ रूप है। इसका अस्तित्व व्यावहारिक संस्कृत साहित्य या काव्यों में नहीं के बराबर है। महर्षि पाणिनि ने वर्णमाला के गणितीय संतुलन और व्याकरणिक नियमों की पूर्णता के लिए इसे स्वीकार किया। पाणिनि सूत्र के अनुसार, जब 'क्लृप्' धातु में अत्यंत तीव्रता या बारम्बारता का भाव जोड़ने के लिए विशेष प्रत्यय लगाए जाते हैं, तब यह अदृश्य दीर्घ स्वर 'ॡ' प्रकट होता है।
पाणिनीय यङन्त प्रक्रिया में दीर्घ-ॡ कार के रूप
जब 'क्लृप्' धातु से क्रिया की अतिशयता या बारम्बारता दर्शाने के लिए यङ्-प्रत्यय (पौनःपुन्य या तीव्रता सूचक प्रत्यय) का विधान किया जाता है, तब व्याकरणिक नियमों के कारण 'ॡ' स्वर से युक्त निम्नलिखित पांच अद्भुत रूप सिद्ध होते हैं:
१. चकॣप्यमान
पद प्रकार: कृदन्त विशेषण (वर्तमान कृदंत)
व्युत्पत्ति: क्लृप् (धातु) + यङ् (प्रत्यय) + शानच् (आत्मनेपद प्रत्यय) = चकॣप्यमान।
शाब्दिक अर्थ: जो निरंतर, बार-बार या अपनी पराकाष्ठा के साथ अत्यंत सुंदर रूप में सुव्यवस्थित या रचित किया जा रहा हो।
२. चकॣप्यते
पद प्रकार: यङन्त क्रियापद (लट्लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन)
व्युत्पत्ति: क्लृप् + यङ् + त (तिङ् प्रत्यय) = चकॣप्यते।
शाब्दिक अर्थ: वह अत्यंत निपुणता और निरंतरता के साथ बार-बार रचा जा रहा है अथवा बार-बार पूरी तरह योग्य सिद्ध हो रहा है।
३. चाक्लृप्ति
पद प्रकार: भाववाचक संज्ञा
व्युत्पत्ति: क्लृप् + यङ् (लुक्) + क्तिन् (प्रत्यय) = चाक्लृप्ति।
शाब्दिक अर्थ: बार-बार, अत्यंत सूक्ष्मता और तीव्रता से किसी सुंदर व्यवस्था, सृष्टि या कला को गढ़ने की निरंतर क्रिया।
४. चकॣपकः
पद प्रकार: कर्ता कारक संज्ञा (रचयिता)
व्युत्पत्ति: क्लृप् + यङ् + ण्वुल् (अक प्रत्यय) = चकॣपकः।
शाब्दिक अर्थ: वह रचनाकार, शिल्पी या विधाता जो बिना रुके, निरंतर सर्वश्रेष्ठ और सुघड़ रचनाओं को आकार देता रहता है।
५. चकॣप्यः
पद प्रकार: कृत्य प्रत्ययान्त विशेषण (योग्य अर्थ में)
व्युत्पत्ति: क्लृप् + यङ् + यत्/न्यात् प्रत्यय = चकॣप्यः।
शाब्दिक अर्थ: वह विचार, कलाकृति या कार्य जो इस योग्य हो कि उसे अत्यंत गहनता और बारम्बारता के साथ बार-बार नए सुंदर रूप में ढाला जाए।
व्याकरणिक सूत्र एवं सिद्धि नियम
विकिपीडिया पर लेख की प्रामाणिकता के लिए इन पाणिनीय सूत्रों का आधार लिया गया है:
सवर्णी नियम: कात्यायन के प्रसिद्ध वार्तिक "ऋऌवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यां वाच्यम्" के अनुसार 'ऋ' और को आपस में सवर्णी (समान जाति का) माना गया है। इसलिए जो नियम 'ऋ' पर लागू होते हैं, वही पर भी चलते हैं।
द्वित्व विधान: सूत्र "एकाचो द्वे प्रथमस्य" (अष्टाध्यायी ६.१.१) के द्वारा यङ् परे होने पर धातु के प्रथम भाग 'क्लृप्' को द्वित्व होकर 'क्लृप्-क्लृप्' की स्थिति बनती है।
लकार परिवर्तन: सूत्र "कृपो रो लः" (अष्टाध्यायी ८.२.१८) के अनुसार 'कृप्' के 'र'कार को 'ल'कार आदेश होता है, जिससे यह 'क्लृप्' रूप लेता है।
दीर्घ स्वर विधान: सूत्र "दीर्घोऽकितः" (अष्टाध्यायी ७.४.८३) के द्वारा अभ्यास (प्रथम भाग) के स्वर को दीर्घ आदेश होता है। चूंकि का दीर्घ रूप 'ॡ' है, अतः यहाँ 'चकॣ...' रूप सिद्ध होता है।
संदर्भ ग्रंथ
भट्टोजि दीक्षित कृत — सिद्धान्तकौमुदी (यङन्त प्रक्रिया प्रकरण)
महर्षि पतंजलि कृत — व्याकरण महाभाष्य (प्रथम आह्निक - ऐउण् सूत्र विचार)