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लघु पत्रिका आंदोलन
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लघु पत्रिका आंदोलन हिंदी साहित्य में सीमित संसाधनों और अपेक्षाकृत कम प्रसार वाली साहित्यिक पत्रिकाओं के माध्यम से विकसित हुआ साहित्यिक आंदोलन था। इन पत्रिकाओं ने स्थापित और व्यावसायिक पत्रिकाओं से अलग लेखकों, रचनाओं और साहित्यिक-विचार संबंधी बहसों के लिए मंच उपलब्ध कराया। हिंदी में इस आंदोलन की शुरुआत को लेकर अलग-अलग मत हैं। कुछ अध्येता इसकी शुरुआती कड़ी 1957 में विष्णुचंद्र शर्मा द्वारा प्रकाशित पत्रिका कवि को मानते हैं, जबकि कुछ के अनुसार 1960 और 1970 के दशकों में इसका प्रभाव अधिक स्पष्ट हुआ।https://www.apnimaati.com/2016/11/blog-post_88.html हिंदी में लघु पत्रिकाएँ : एक अध्ययन अपनी माटी 2026-09-12
1960 और 1970 के दशकों में हिंदी की अनेक साहित्यिक पत्रिकाएँ छोटे शहरों और कस्बों से प्रकाशित हुईं। कथा, उत्तरार्द्ध, युवा, वाम, कथन, समारम्भ और पहल जैसी पत्रिकाएँ इस दौर की साहित्यिक गतिविधियों में उल्लेखनीय थीं। इन पत्रिकाओं के संपादकों और लेखकों ने साहित्यिक लेखन के साथ समकालीन सामाजिक और वैचारिक प्रश्नों को भी जगह दी।https://hi.wikibooks.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE/%E0%A4%B2%E0%A4%98%E0%A5%81_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%86%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%A8 लघु पत्रिका आंदोलन विकिपुस्तक 2026-09-12
इस आंदोलन से जुड़ी प्रमुख पत्रिकाओं में ज्ञानरंजन द्वारा संपादित पहल का महत्वपूर्ण स्थान रहा। पहल का प्रकाशन 1973 में जबलपुर से शुरू हुआ। 2021 में इसका 125वाँ अंक प्रकाशित हुआ।https://hiwiki.iiit.ac.in/index.php/%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%B2 पहल हिंदी विकिपीडिया 2026-09-12 सितंबर 2026 InternetArchiveBot
हालाँकि लघु पत्रिका आंदोलन को केवल पहल या ज्ञानरंजन से जोड़कर नहीं देखा जाता। कथा के संपादक मार्कण्डेय, उत्तरार्द्ध से जुड़े सब्यसाची और अन्य पत्रिकाओं के संपादकों ने भी इस साहित्यिक परिदृश्य को विकसित करने में भूमिका निभाई। अलग-अलग स्थानों से प्रकाशित इन पत्रिकाओं की प्रकृति और वैचारिक प्राथमिकताएँ अलग थीं।https://gadyakosh.org/gk/%E0%A4%B2%E0%A4%98%E0%A5%81_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%86%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%A8%3A_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B0%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%2F_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5_%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%A8_%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BF लघु-पत्रिका आंदोलन : संरचना और सरोकार गद्य कोश 2026-09-12 सितंबर 2026 InternetArchiveBot
1990 के दशक में लघु पत्रिकाओं को एक संगठित आंदोलन के रूप में सामने लाने की कोशिश हुई। 29–30 अगस्त 1992 को कोलकाता में लघु पत्रिकाओं के संपादकों की राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। इसके आयोजन में ज्ञानरंजन और आलोचक शंभुनाथ की पहल थी। संगोष्ठी का विषय लघु-पत्रिकाएँ : नई चुनौतियाँ और दिशाएँ था। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर लघु-पत्रिका समन्वय समिति के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी, जिसमें ज्ञानरंजन संयोजक और शंभुनाथ संयुक्त संयोजक बनाए गए।https://www.hindisamay.com/content/4437/1/%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%95-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5-%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%A8-%E0%A4%97%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%A7-%E0%A4%B2%E0%A4%98%E0%A5%81-%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0िका-%E0%A4आंदोलन-%E0%A4संरचना-%E0%A4और-%E0%A4सरोकार.cspx लघु पत्रिका आन्दोलन : संरचना और सरोकार हिंदी समय 2026-09-12 सितंबर 2026 InternetArchiveBot
लघु पत्रिकाओं के सामने सीमित आर्थिक संसाधन, कम प्रसार और पाठक-वर्ग से जुड़े प्रश्न लगातार बने रहे। इसके बावजूद 1960 और 1970 के दशकों में विकसित इस परंपरा ने हिंदी साहित्य में स्वतंत्र संपादकीय प्रयासों और वैकल्पिक साहित्यिक मंचों की भूमिका को स्थापित किया। बाद के दशकों में साहित्यिक पत्रिकाओं के स्वरूप और माध्यमों में बदलाव के साथ लघु पत्रिका आंदोलन का स्वरूप भी बदलता गया।<ref>{{Cite web
|url=https://www.publicationsdivision.nic.in/journals/Journalarchives/Ajkal/Ajkal-Hindi/1998/December/Ajkal_1998_December_pdf.pdf
|title=आजकल, दिसंबर 1998
|website=प्रकाश