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संताली साहित्य
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संताली साहित्य संताली भाषा में रचित साहित्य को कहा जाता है। संताली भाषा मुण्डारी भाषा परिवार की प्रमुख भाषा है, जिसे मुख्यतः झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार तथा असम में बोला जाता है। संताली साहित्य का आधार समृद्ध लोकगीत, लोककथाएँ और परंपराएँ रही हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती रही हैं।A brief History of Santali Language and Literature https://www-jetir-org.translate.goog/view?paper=JETIR2212493&_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc en-gb
इतिहास
संताली साहित्य की शुरुआत मौखिक परंपरा से हुई। इसमें लोककथाएँ, गीत, नृत्य और धार्मिक अनुष्ठान विशेष महत्व रखते हैं। 19वीं सदी में यूरोपीय मिशनरियों और भारतीय विद्वानों ने संताली भाषा को लिखित रूप देने का प्रयास किया।
रघुनाथ मुर्मू द्वारा विकसित की गई ओल चिकी लिपि (1925 ई.) ने संताली साहित्य को नई पहचान दी। इस लिपि के कारण संताली में गद्य, कविता, नाटक और आधुनिक साहित्य का विकास संभव हो सका।https://www.prabhatkhabar.com/top-stories/development-journey-of-santali-language-literature-and-their-representative-writers-sbh Santali Language Literature And Their Representative Writers 2023-08-11 Prabhat Khabar hi 2025-09-24
प्रमुख लेखक और योगदान
रघुनाथ मुर्मू - संताली लिपि "ओल चिकी" के जनक और साहित्यिक चेतना के प्रेरक।
राम दयाल मुंडा - संताली और आदिवासी साहित्य व संस्कृति के संवाहक।
निताई बसकी - संताली कविता और गद्य में महत्वपूर्ण योगदान।
मोनीसा हेम्ब्रम - समकालीन संताली लेखिका।
आधुनिक विकास
स्वतंत्रता के बाद संताली साहित्य का तेजी से विस्तार हुआ। ओल चिकी लिपि में पत्र-पत्रिकाएँ, उपन्यास, नाटक और कविता-संग्रह प्रकाशित होने लगे। 21वीं सदी में संताली साहित्य का योगदान राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कर रहा है।
संताली भाषा को 2003 में भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया, जिससे संताली साहित्य के विकास को और बढ़ावा मिला।
महत्व
संताली साहित्य न केवल आदिवासी समाज की आत्मा को अभिव्यक्त करता है, बल्कि भारतीय साहित्य की विविधता को भी समृद्ध बनाता है।
इधर भी देखें
संताली भाषा
ओल चिकी लिपि
झारखंड का साहित्य
संदर्भ
श्रेणी:झारखंड का साहित्य
श्रेणी:भारतीय भाषाओं का साहित्य
श्रेणी:संताली भाषा