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411 समाचार
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महर्षि संतसेवी परमहंस

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दिसम्बर 2020 महर्षि संतसेवी परमहंस thumb|Photo of Maharshi Santsevi Paramhans and Pravesh K Singh clicked at the former's residence at Bhagalpur 306px महावीर दास 1920 12 20 y गम्हरिया, Madhepura District, भारत 2007 6 4 1920 12 20 y भागलपुर, भारत कुप्पाघाट Kuppaghat, भागलपुर, भारत भारतीय महावीर दास संत of Sant Mat महर्षि संतसेवी परमहंस, Maharshi Santsevi Paramhans, (२०.१२.१९२० - ०४.०६.२००७) (हाथरस के) संत तुलसी साहब - बाबा देवी साहब - महर्षि मेँहीँ परमहंस की परंपरा में एक प्रख्यात संत थे। इस वर्ष २० दिसम्बर २०२४ को उनकी १०५ वीं जयंती मनाई जा रही है. संतमत के महान संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी के 8 जून 1986 को ब्रह्मलीन हो जाने के उपरांत महर्षि संतसेवी परमहंस जी ने महर्षि मेँहीँ आश्रम कुप्पाघाट, भागलपुर, बिहार, भारतवर्ष, जो अखिल भारतीय संतमत सत्संग का मुख्यालय है, से संतमत के प्रचार-प्रसार का बीड़ा उठाया तथा इसे नवीन ऊँचाइयों पर ले गए। वे 4 जून, 2007 की रात्रि में इस धराधाम तथा अपनी पार्थिव काया को अलविदा कह प्रयाण कर गए। आरंभिक जीवन महर्षि संतसेवी परमहंस का जन्म सोमवार 20 दिसंबर 1920 ईस्वी को भारतवर्ष के बिहार प्रांत के वर्तमान मधेपुरा जिले के गम्हरिया नामक ग्राम में हुआ था। अपने माता पिता के यह चौथे पुत्र थे। इनके पूज्य पिताश्री आदरणीय श्री बलदेव दास जी एक कृषक थे तथा इनकी पूज्य माताश्री आदरणीया श्रीमती राधा देवी एक धर्मपरायणा महिला थीं। नामकरण-संस्कार के तहत पंडितजी द्वारा इनका नाम महावीर दास रखा गया। महावीर दास बड़ी कुशाग्र बुद्धि के तथा आज्ञाकारी विद्यार्थी थे। अपनी कक्षा में ये परीक्षाओं में सदैव प्रथम अथवा द्वितीय स्थान प्राप्त किया करते थे। ये बाल्यावस्था में भगवान हनुमान के कट्टर भक्त थे। इनके दो-दो भाइयों तथा चाचाजी के अल्पायु में ही कालकवलित हो जाने की घटना ने इनके मन को तीव्र आघात पहुँचाया तथा इन्हें इस मर्त्यभुवन में जीवन की क्षणभंगुरता का साक्षात् अनुभव कराया। अभी ये इस सदमे से उबर भी नहीं पाए थे कि इनके पिता जी के आकस्मिक निधन ने इनके जीवन को पूर्णतः अस्त-व्यस्त कर दिया तथा इन्हें शिक्षा छोड़ने को विवश भी। इस कारण इनकी औपचारिक शिक्षा मात्र अष्टम वर्ग तक ही हो पाई। परिवार का वहन करने हेतु ये गांव के बच्चों को ट्यूशन देने लगे। इनके चरित्र तथा अध्ययन के प्रति इनकी रुचि देख अभिभावकों को अपने बच्चों को इन्हें सौंपने में तनिक भी झिझक न हुई। गुरु समागम एक बार की बात है। ये बिहार के पूर्णिया जिले स्थित सैदाबाद ग्राम में रह रहे थे। वहीं इन्हें ज्ञात हुआ कि निकटस्थ कनखुदिया नामक ग्राम में मासिक ध्यान-साधना शिविर आयोजित किया जाने वाला था जिसे सुशोभित करने संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस, जिनकी उस समय अपार ख्याति थी, पधारने वाले थे। यह संवाद सुनते ही मानो इनके हृदय की गहराइयों में प्रसुप्त पड़ा हुआ भक्ति-बीज करवटें लेने लगा, अंकुरित-प्रस्फुटित होने को मचलने लगा। बताते हैं, एक अज्ञात आकर्षण से खिंचे ये महर्षि जी के दर्शनों को व्याकुल हो उठे। इन्हें देख-परखकर सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी ने इन्हें सहर्ष शिष्य रूप में स्वीकार कर इन्हें संतमत-परंपरा की मानस-जप, मानस-ध्यान तथा दृष्टियोग की विधिवत् दीक्षा प्रदान की। वह 29 मार्च 1939 का ऐतिहासिक दिवस था। अपने सद्गुरु के सानिध्य से ये इतने प्रभावित हुए कि स्वयं को उनकी सेवा में रख लेने की गुरुदेव से प्रार्थना की। पर महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज ने कहा - "अभी आप जो कर रहे हैं, करते रहिए; उचित समय आने पर आपको बुलवा लिया जाएगा।" बाद में अन्य शिष्यों से इसका कारण बतलाते हुए महर्षि जी ने कहा था - "मन तो मेरा भी इन्हें पास में रखने का है, पर सोचा कि इनकी माताजी को क्यों रुलावें?" 1946 ईस्वी में इनकी माता जी के इस असार संसार से प्रस्थान घर जाने के पश्चात् महर्षि मेँहीँ ने इन्हें अपने पास बुलवा लिया और सदा के लिए अपनी निजी सेवा में रख लिया, यद्यपि इनकी माता के सशरीर रहते हुए भी महर्षि जी इन्हें महत्वपूर्ण पुस्तकों के प्रणयण, संपादन, संशोधन हेतु बुलवा लेते तथा महत्वपूर्ण सत्संग-कार्यक्रमों में भी अपने साथ ले जाते जहाँ इनसे सद्ग्रंथों तथा संतवाणी से पाठ करवाते थे। इनके शुद्ध, सुमधुर पाठ का श्रोताओं पर सशक्त प्रभाव पड़ता। सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस इन्हें पुत्रवत् स्नेह करते थे। कुछ वर्षों के लिए इन्हें सिकलीगढ़ धरहरा तथा मनिहारी स्थित आश्रमों की व्यवस्था हेतु भेजा। पर 1949 ईसवी में इन्हें अपने भागलपुर, बिहार स्थित कुप्पाघाट आश्रम वापस बुलवा लिया। तब से महर्षि जी के अंतिम साँस लेने तक ये उनके संग छायावत् बने रहे। इन्होंने अपने गुरु की चार दशक-पर्यंत (1946-1986) अथक सेवा की, जो गुरु शिष्य परंपरा में एक दुर्लभ एवं संभवतः अभूतपूर्व घटना है। इन्होंने अपने गुरु की ऐसी अनुपम सेवा की कि सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस ने इन्हें 'संतसेवी' (संत का सेवक) नाम प्रदान करने की कृपा की। महर्षि मेँहीँ ने बड़े प्यार से इन्हें गढ़ा, इनमें सत्य, शाश्वत मूल्यों की स्थापना की, बांग्ला, गुरमुखी जैसी लिपियों को पढ़ना सिखलाया तथा अपनी गौरवशाली परंपरा का सम्यक् निर्वहन करने की योग्यता प्रदान की। इनकी आध्यात्मिक उन्नति देखकर महर्षि मेँहीँ ने इन्हें 1952 ईस्वी में स्वेच्छा से संतमत की सर्वोच्च साधना, नादानुसंधान अर्थात् सुरत शब्द योग, की दीक्षा प्रधान करने की कृपा की तथा 1957 ई में इनके केस, दाढ़ी, मूँछें मुंडित करवाकर, इन्हें कषाय वस्त्र प्रदान कर सन्यास धर्म में भी दीक्षित किया। सद्गुरु का प्रतिनिधित्व संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी का अपने सद्शिष्य में पूर्ण विश्वास था। इसके प्रमाणस्वरूप अहमदाबाद (गुजरात) में 1957 में BAPS द्वारा आयोजित किए जाने वाले अखिल भारतीय साधु सम्मेलन में महर्षि मेँहीँ परमहंस जी ने इन्हें, पूज्य श्रीधर बाबा के संग, अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा। वहाँ इनके द्वारा दिए गए प्रवचनों की वहाँ पधारे साधु-महात्माओं, विद्वद्जनों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। महर्षि मेँहीँ ने इन्हें 1960 ईस्वी से प्रवचन करने की अनुमति प्रदान कर दी थी। इनके प्रवचन महर्षि मेँहीँ आश्रम कुप्पाघाट भागलपुर से प्रकाशित होने वाली मासिक आध्यात्मिक पत्रिका "शांति संदेश" में प्रकाशित होने लगे। महर्षि मेँहीँ परमहंस ने इन्हें अपनी दीक्षा पुस्तिका सौंपकर 1970 से मुमुक्षुओं को दीक्षित करने की अनुमति प्रदान की। महर्षि संतसेवी ने आजीवन मानवता को सद्भावना, सच्चरित्रता, सत्यनिष्ठा, सामंजस्य, गुरु-समर्पण, स्वावलंबी व सदाचारी जीवन-यापन, नियमित सत्संग तथा अंतस्साधना का स्वयं अपनी कथनी एवं करनी के परस्पर सामंजस्य से पाठ पढ़ाया। इनकी शिक्षा थी कि संसार के समस्त धर्मों का मूल संदेश एक ही है। ये सभी धर्म, जाति, संप्रदाय के लोगों का समान रूप से आदर करते थे। अस्तु, सभी धर्म-संप्रदाय, जाति, वर्ग, वर्ण के लोग इनके पास सदुपदेश एवं मार्गदर्शन की अपेक्षा से पहुँचते और कृतकृत्य होकर लौटते। सिक्ख, बौद्ध, जैन, इस्लाम इत्यादि धर्मों के कतिपय धर्मगुरुओं ने भी इनसे दीक्षा ग्रहण की। इनका जीवन किसी भी सच्चे मनुष्य के लिए एक आदर्श प्रकाश-स्तंभ सदृश था। इन्होंने बतलाया कि हमारी मुक्ति का मार्ग हमारे अंदर है तथा समस्त धर्मावलंबियों के लिए वह मार्ग एक ही है, चाहे उनका पेशा, रोजगार, लिंग कुछ भी क्यों ना हो! चमत्कार कितने ही लोगों ने अपने जीवन के विभिन्न कठिन पड़ावों पर इनकी चमत्कृत कर देने वाली दिव्य परंतु प्रत्यक्ष कृपा का अनुभव किया। ऐसे कुछ आत्मानुभव "महर्षि संतसेवी अभिनंदन ग्रंथ" नामक पुस्तक में भी संकलित हैं। गुरु के इनके बारे में उद्गार सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी के इनके बारे में भावोद्गार तथा चंद संबद्ध घटनाएँ, जो महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज के जीवन में उनके सद्शिष्य महर्षि संतसेवी परमहंस जी के अति विशिष्ट स्थान को स्पष्टतया दर्शाते हैं, निम्नोक्त हैं - 1. "ये हम से बेसी (अधिक) जानते हैं।" 2. "मैं गुड़ ही रह गया और संतसेवी जी चीनी बन गए।" 3. "आपने मेरी उल्लेखनीय सेवा की है। मेरी सेवा ही आपकी तपस्या है।" 4. "मुझमें और संतसेवीजी में अंग्रेजी अक्षर 'Q' तथा 'U' का संबंध है।" (ध्यातव्य है कि अंग्रेजी शब्दकोश में 'Q' से आरंभ होने वाले सभी शब्दों में 'Q' और 'U' सदैव साथ-साथ पाए जाते हैं, यथा - Quake, Quail, Queen, Queue, Quest, Quick, Quote, Quilt इत्यादि।) 5. "आपको मेरे बिना नहीं बनेगा और मुझे आपके बिना नहीं बनेगा।" 6. "जहाँ आप रहेंगे, वहाँ मैं रहूँगा और जहाँ मैं रहूँगा, वहाँ आप रहेंगे।" 7. "संतसेवीजी मेरे मस्तिष्क हैं।" 8. एक बार सत्संग के दौरान महर्षि संतसेवी जी थोड़ी देर के लिए मंच से उठकर बाहर गए, तब सद्गुरु महर्षि मेँहीँ ने मंच से कहा, "संतसेवी जी किसी आवश्यक कार्य से गए हैं। यदि किन्हीं को लगता है कि वे इनसे अधिक जानते हैं, तो वे यहाँ आकर उनकी जगह बैठ जाएँ।" सभा में छाये मौन और एक अल्प विराम के उपरांत महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज ने पुनः कहा, "पर मैं जानता हूँ कि यह होने को नहीं है।" 9. सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस ने अपने कई प्रमुख शिष्यों को दीक्षा देने का अधिकार दिया था, परन्तु अपनी दीक्षा पुस्तिका, जिसमें वे दीक्षार्थियों के नाम-पते, हस्ताक्षर इत्यादि अंकित करवाया करते थे, महर्षि संतसेवी जी को यह कहते हुए सौंपी कि लीजिए, अबसे इस रजिस्टर में आप दीक्षा दिया कीजिएगा। इनके जीवनकाल में महर्षि संतसेवीजी से 2,00,000 से अधिक लोगों ने दीक्षा प्राप्त की। 10. चाहे कितने भी वरिष्ठ महात्मा मंच पर उपस्थित क्यों ना हों, सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस की ठीक बाईं ओर सदैव महर्षि संतसेवीजी ही आसीन हुआ करते थे तथा सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज के प्रवचन के ठीक पूर्व सदैव इन्हीं का प्रवचन हुआ करता था। साहित्यिक योगदान महर्षि संतसेवी न मात्र एक प्रगल्भ वक्ता अपितु एक दक्ष लेखक भी थे। उन्हें कई भाषाओं तथा बोलियों जैसे भारती (हिंदी), संस्कृत, अंग्रेजी, बांग्ला, मारवाड़ी, मैथिली, अंगिका, नेपाली, पंजाबी, फारसी इत्यादि का ज्ञान था। इनके द्वारा प्रणीत कुछ पुस्तकों के नाम निम्नोक्त हैंः 1. ॐ विवेचन 2. परमार्थ विवेचन 3. योग माहात्म्य 4. महर्षि संतसेवी ज्ञानगंगा (इनके आलेखों का संकलन) 5 सर्वधर्म समन्वय 6. सुख-दु:ख 7. जग में ऐसे रहना 8. लोक-परलोक उपकारी 9. जे पहुँचे ते कहि गए 10. सुषुम्ना-ध्यान 11. सत्य क्या? 12. एक गुप्त मत १३. संतमत में साधना का स्वरूप इत्यादि इनमें 'सर्वधर्म समन्वय' नाम्नी पुस्तक का अमेरिका निवासी श्रीमती वीणा रानी होवार्ड ने आंग्ल-भाषा में "Harmony of Religions" नाम से अनुवाद किया है। वर्तमान महात्मा श्रद्धेय निर्मलानंद स्वामी ने उनके सैंकड़ों प्रवचनों को "महर्षि संतसेवी प्रवचन पीयूष" नामक ग्रंथ में संकलित किया है। गणमान्य विभूतियों से भेंट अपने जीवन काल में विविध कार्यक्रमों तथा यात्राओं के क्रम में इन्हें कई प्रमुख हस्तियों से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ जिनमें पूज्य श्री भूपेंद्रनाथ सान्याल, जैन मुनि श्री धनराज, श्री जयदयाल गोयंदका, महर्षि महेश योगी, स्वामी रामसुखदास, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, स्वामी सत्यानंद, बौद्ध भिक्षु जगदीश काश्यप, श्री प्रमुख स्वामी, आचार्य विनोबा भावे, पंडित परशुराम चतुर्वेदी, फादर कामिल बुल्के, स्वामी हरिनारायण इत्यादि के नाम प्रमुख हैं। यात्रायें संतमत के परम कल्याणकारी आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार-प्रसार हेतु इन्होंने पूर्व में असम से पश्चिम में अहमदाबाद (गुजरात) तथा उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में चेन्नई तक की यात्राएँ कीं। दरबार साहब, अमृतसर, आगरा के दयालबाग और स्वामीबाग, अजमेर, राजस्थान में पुष्कर, ऋषिकेश, हरिद्वार, दिल्ली, राजगृह, कोलकाता तथा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल इत्यादि प्रांतों के कई स्थानों की यात्राएँ कीं। महर्षि...परमहंस की उपाधि भारतवर्ष के उत्तराखंड प्रांत के ऋषिकेश में आयोजित अखिल भारतीय संतमत-सत्संग के 86वें वार्षिक महाधिवेशन में वहाँ उपस्थित मूर्धन्य संतों एवं महामंडलेश्वरों की पावन उपस्थिति में इन्हें स्वामी चिदानंद द्वारा "महर्षि...परमहंस" की उपाधि से विभूषित किया गया। तबसे ये महर्षि संतसेवी परमहंसजी कहे जाने लगे। महाप्रयाण महर्षि संतसेवी परमहंस जी ने अपने महान सद्गुरु के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए अपना समग्र जीवन स्व- तथा जनसामान्य के कल्याणार्थ उत्सर्ग कर दिया। इन्होंने सोमवार (जो संयोगवश इनके जन्म का भी वार था), 4 जून 2007 की रात्रि लगभग 9:45 बजे अपने पंचभौतिक पार्थिव पिंड का परित्याग कर इस अवनीतल से महाप्रयाण किया। अपने माटी के चोले में आज ये भले ही न हों, पर अपने लक्ष-लक्ष श्रद्धालु भक्तों के हृदय में वे आज भी जीवित हैं और सदा रहेंगे। जो भगवद्श्रद्धा एवं सच्ची भक्ति का दीप इन्होंने असंख्य हृदयों में प्रज्वलित किया, वह सदैव यूँ ही जलता जगमगाता रहेगा। शताब्दी जयंती वर्ष शुक्रवार 20 दिसंबर 2019 से प्रारम्भ होकर रविवार 20 दिसंबर 2020 तक महर्षि संतसेवी परमहंसजी का शताब्दी जयंती वर्ष थी। इस अवसर पर जयंती देश-विदेश के विभिन्न स्थानों में, विशेषकर महर्षि मेँहीँ आश्रम, कुप्पाघाट, भागलपुर, बिहार में, बड़े धूमधाम से मनाई गई थी। कई आश्रमों में इस मौके पर ध्यानाभ्यास शिविर भी आयोजित किये गए थे। कोरोना महामारी को ध्यानगत रखते हुए सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए 20 दिसंबर 2020 को देश के विभिन्न स्थलों पर उनके जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर विविध प्रकार के कार्यक्रमों के आयोजन भी हुए। स्रोत भगीरथ दास, स्वामी, "महर्षि मेँहीँ के दिनचर्या उपदेश", भागलपुर, भारत, अखिल भारतीय संतमत-सत्संग प्रकाशन आशुतोष स्वामी "महर्षि संतसेवी ज्ञान गंगा" 2006 अखिल भारतीय संतमत-सत्संग प्रकाशन भागलपुर, भारत प्रथम निर्मलानंद स्वामी "महर्षि संतसेवी प्रवचन पीयूष" 2012 अखिल भारतीय संतमत-सत्संग प्रकाशन भागलपुर, भारत प्रथम Howard Veena Raani "Harmony of All Religions" 2003 Santmat Society of North America Printed by Motilal Banarasi Das New Delhi भागलपुर, India first सिंह डॉ महेश्वर प्रसाद "महाप्राज्ञ स्वामी श्री संतसेवी अमृतमहोत्सव अभिनन्दनग्रंथ" 1996 अखिल भारतीय सन्तमत सत्संग प्रकाशन भागलपुर,भारत प्रथम