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पराशर स्मृति
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अप्रैल 2025
पराशर स्मृति एक स्मृति ग्रन्थ है जिसमें 12 अध्याय और 593 श्लोक हैं। इसके अनेक स्वरूप देखने को मिलते हैं। पराशर नाम बहुत प्राचीन है। इन्हें कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास का पिता कहा गया है।
पाराशरस्मृति में प्रमुखतः दो विषयों पर विचार किया गया है- आचार तथा प्रायश्चित्त । सत्युग, त्रेता और द्वापर के धर्मों की चर्चा अन्यान्य स्मृतियों में मिलेगी, परन्तु इस स्मृति में तो कलियुग के धर्म-आचार तथा रीति-नीति की चर्चा की गयी है। धर्म की स्थापना और ब्राह्मणों को पाप से बचाने के लिए ही पाराशरस्मृति की रचना की गयी है। गरुडपुराण के अध्याय १०७ में ३९ श्लोकों में पराशरस्मृति का सार दिया गया है।
कौटिल्य ने ६ बार पराशर के विचारों का दिग्दर्शन कराया है।पराशर स्मृति (गुरुप्रसाद शर्मा)
पाराशरस्मृति भी मनुस्मृति की परम्परा का ही अनुवर्तक ग्रन्थ है। महर्षि पराशर ने अपने ग्रन्थ में यत्र-तत्र मनु महाराज के प्रति अत्यन्त सम्मान एवं गौरव प्रकट किया है तथा उनकी मान्यताओं को बहुमान देते हुए सर्वथा प्रामाणिक स्वीकार किया है। इतना ही नहीं, महर्षि पराशर ने तो मनु महाराज को प्रत्येक युग में स्मृति का आविर्भाव करने वाला माना है। उनके अनुसार जिस प्रकार ब्रह्माजी प्रत्येक कल्प में वेदों का स्मरण करके उन्हें प्रकाशित करते हैं, उसी प्रकार मनु महाराज कल्प-कल्पान्तर में स्मृति का स्मरण करके आचार संहिता को प्रकाशित करते हैं-
न कश्चिद्वेदकर्ता च वेदस्मर्त्ता चतुर्मुखः ।
तथैव धर्मान् स्मरति मनुः कल्पान्तरेऽन्तरे ॥ -- पराशरस्मृति 1/21
पराशरस्मृति के प्रथम अध्याय के 30 श्लोकों में कहा गया है कि सतयुग में प्राण अस्थिगत, त्रेतायुग में मांसगत, द्वापरयुग में रूधिर में, तथा कलयुग में अन्न में बसते है । कुलयुग में आचार-विचार, परिपालन मुख्य धर्म है।| तृतीय अध्याय में शिशुओं, गर्भवती में अशौच एवं यज्ञोपवित होने तक अशौच व्यवस्था वर्णित है। चौथे अध्याय में गर्भपात को ब्रह्म हत्या के तुल्य मानते हुए इससे दुना पाप का भागी होना बताया गया है। छठे अध्याय में किसी भी प्राणी के बध को पाप कहा गया है तथा इनके प्रायश्चित का विधान बताया गया है। नौवे अध्याय में स्त्री, बालक, सेवक, रोगी तथा दुःखियों पर कोप न करने का निर्देश दिया गया है। बारहवें अध्याय में किसी भी पापी के साथ शयन, संसर्ग एवं आशन पर बैठना तथा भोजन करना भी पाप कहा गया है। जिसमें प्रायश्चित के लिए गोव्रत पालन का निर्देश है।
पाराशर स्मृति का मुख्य कार्य-विषय शुद्धिकरण एवं प्रायश्चित का निष्पादन है। इस स्मृति में केवल विभिन्न प्रायश्चितों का विवरण मिलता है।
पाराशर स्मृति में वर्णित प्रायश्चितों को निम्नांकित उपवर्गो में विभाजित किया जा सकता है-पराशरस्मृति : दण्डविधान तथा प्रायश्चित
(१) गौ की हत्या करने वाले का प्रायश्चित
(२) सौतेली माता इत्यादि गमन संबंधित प्रायश्चित
(३) श्वपाकी या चाण्डाली के साथ सहवास करने का प्रायश्चित
(४) ब्राह्मणों द्वारा पापकर्म किये जाने पर विहित प्रायश्चित ।
महर्षि पराशर सामान्यतः रूढ़ि एवं परम्परा का पालन करते दिखाई देते हैं, परन्तु कहीं-कहीं उन्होंने युग-धर्म के परिप्रेक्ष्य में प्रचलन से हटकर स्वतन्त्र एवं स्वस्थ विचार भी प्रकट किये हैं। उदाहरणार्थ, उनके निम्नोक्त कथन दर्शनीय हैं-
आपत्काले तु सम्प्राप्ते शौचाचारं न चिन्तयेत् ।
स्वयं समुद्धरेत्पश्चात्स्वस्थो धर्मं समाचरेत् ॥
अर्थात् संकट की स्थिति में व्यक्ति को शौच (स्नान आदि), आचार के पालन की चिन्ता नहीं करनी चाहिए, उसे सर्वप्रथम अपने शरीर की रक्षा पर ध्यान देना चाहिए । स्वस्थ रहने पर ही तो धर्म का पालन हो सकेगा। इसी प्रकार-
देशभंगे प्रवासे च व्याधिषु व्यसनेष्वपि ।
रक्षेदेव स्वदेहादौ पश्चाद्धर्मं समाचरेत् ॥
देश पर आये संकट की स्थिति में, परदेश में, रोगग्रस्त होने पर तथा अन्यान्य किसी भी असामान्य स्थिति में धर्म-रक्षा तथा धर्म-पालन की चिन्ता की अपेक्षा शरीर-रक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। शरीर स्वस्थ-सुरक्षित होगा, तो धर्म-पालन भी हो पायेगा ।
महर्षि पराशर ने स्त्रियों के सम्बन्ध में परम्परागत संकीर्णता से हटकर अतिरिक्त उदारता का परिचय दिया है। उदाहरणार्थ-
नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ ।
पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते ॥
पति का खो जाने, मर जाने, संन्यास धारण कर लेने, नपुंसक सिद्ध होने तथा बहिष्कृत होने - इन पांच स्थितियों में, स्त्री को दूसरा पति बनाने का अधिकार है।
इसी प्रकार अशिक्षित ब्राह्मण को ब्राह्मण न मानना, अर्थात् जन्म के स्थान पर कर्म और आचरण को वर्ण-व्यवस्था का आधार मानना भी परम्परा से हटकर कुछ कहने का साहस है-
यथा षण्डोऽफलः स्त्रीषु तथा गौरुषरा फला।
यथा चाऽरोऽफलं दानं तथा विप्रोऽनृचोऽफलः॥
अर्थात् स्त्रियों के लिए नपुंसक पुरुष के समान व उपज के लिए ऊसर भूमि के समान, दान के लिए अशिक्षित ब्राह्मण भी अनुपयोगी एवं निष्फल है।
महर्षि पराशर ने काठ के हाथी और चमड़े के मृग के समान ही अशिक्षित ब्राह्मण को नाममात्र का ब्राह्मण माना है—
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः ।
''ब्राह्मणस्त्वनधीयानास्त्रयस्ते नामधारकाः ॥
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
पराशर ऋषि
बाहरी कड़ियाँ
पराशरस्मृति (संस्कृत विकिस्रोत)
पराशर स्मृतिसितंबर 2026 InternetArchiveBot (अनुवादक - डॉ रामचन्द्र शास्त्री)
पराशरस्मृति (हिन्दी अनुवाद सहित)
पराशर स्मृति (गुरुप्रसाद शर्मा)
पराशर धर्म-संहिता या पराशर स्मृति
श्रेणी:हिन्दू धर्म