411 REFERENCE · Wikipedia
आदि शंकराचार्य
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
दार्शनिक आदि शंकराचार्य हिन्दू धर्म के धर्मगुरु पद शंकराचार्य
आदि शंकर फ़िल्म निर्माता आदि शंकर (फ़िल्म निर्माता)
शिवावतार भगवान श्रीमद् आदि शंकराचार्य ज्ञान, योग, वैदिक ज्ञान, कर्मकाण्ड, वेद, भाष्य, मंत्र, तंत्र एवं शक्ति शांति के के अधिष्ठात्र देवता Raja Ravi Varma - Sankaracharya.jpg 300px शिष्यों के मध्य में जगदगुरु आदि शंकराचार्य, राजा रवि वर्मा द्वारा (1904) में चित्रित लगभग 508 ईसा पूर्व =
भारतीय केदारनाथ, पाल साम्राज्यवर्तमान में उत्तराखण्ड, भारत योगी गोविन्द नाथ अद्वैत वेदान्त, नाथ संप्रदाय का साहित्य शिवावतार, शंकराचार्य योगी, आदिगुरु, श्रीमज्जगदगुरु, धर्मचक्रप्रवर्तक, यतिचक्र चुरामणि, धर्मसम्राट, भगवान दशनामी संप्रदाय (नाथ संप्रदाय) भज गोविन्दम्, मठाम्मनाय महानुशासन, ब्रह्मसूत्र भाष्य, वेदान्त सूत्र, १०८ उपनिषदों पर भाष्य, अनगिनत स्तुति, स्तोत्रादि की रचना पूज्य हस्तामलकाचार्य, पूज्य तोटकाचार्य, पूज्य सुरेश्वराचार्य, पूज्य पद्मपादाचार्य शिव, गोरखनाथ अहं ब्रह्मास्मि, प्रज्ञानं ब्रह्म, तत्त्वमसि, ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या वैशाख शुक्ल पंचमी लगभग 750 ई॰note "date"
आचार्य शंकर भारतीय महान् दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक और योगी थे। उन्होंने अद्वैत वेदान्त को ठोस आधार प्रदान किया। भगवद्गीता, उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इन की टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। उन्होंने सांख्यदर्शन का प्रधानकारणवाद और मीमांसा दर्शन के ज्ञान कर्म समुच्चयवाद का खण्डन किया।
योगी शंकराचार्य जी का जन्म सन ५०८ - ५०९ ई.पू. में हुआ था।https://books.google.co.in/books?id=G3AMAQAAMAAJ&q=Shankaracharya+508+bce&dq=Shankaracharya+508+bce&hl=hi&sa=X&ved=2ahUKEwiTxdC6gaHzAhUhBKYKHUlCCCgQ6AF6BAgDEAM A Tribute to Hinduism: Thoughts and Wisdom Spanning Continents and Time about India and Her Culture Londhe Sushama Pragun Publication 2008 9788189920661 3 Eng Hardcover Adi Shankaracharya ( 508 - 477 BCE ) was undoubtedly an immortal spiritual leader..https://books.google.co.in/books?id=f4pUBQAAQBAJ&pg=PA150&dq=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF+508+%E0%A4%88%E0%A4%AA%E0%A5%82&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&source=gb_mobile_search&ovdme=1&sa=X&ved=2ahUKEwj8sLLC0MqBAxWW_mEKHZIPDxIQ6AF6BAgNEAM#v=onepage&q=%E0%A4%86%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%20508%20%E0%A4%88%E0%A4%AA%E0%A5%82&f=false Vikramshila Ka Itihas: Vikramshila Ka Itihas: The History of Vikramshila University by Parshuram Thakur Brahmavadi Brahmavadi Parshuram Thakur 2013-01-01 Prabhat Prakashan 978-81-7721-218-1 150 hi इतिहासकारों ने आदि शंकराचार्य का समय आठवीं सदी मानकर हिंदी साहित्य के इतिहास को भी अंधकार युग में धकेल दिया है , जबकि बिहार , वैशाली स्थित प्राकृत अनुवादक डॉ . डी . एम . त्रिवेद के एक शिलालेख के अनुसार शंकराचार्य काल ई . पू . 508 , बुद्ध ई . पू . 527 साबित होता है । ' क्रॉनिकल ऑफ नेपाल हिस्टरी , में बुद्ध का काल ई . पू . 1887 ई . पू . तक दरशाया है , यानी बुद्ध 1887 ई . पू . से 1807 ई . पू तक जीवित थे । वहीं आचार्य शंकर की जन्मतिथि ई . पू . 509 का प्रमाण एक जैन अभिलेख में भी मिलता है ।https://books.google.co.in/books?id=O5bXAAAAMAAJ&q=Adi+Shankaracharya+508+BCE&dq=Adi+Shankaracharya+508+BCE&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&source=gb_mobile_search&ovdme=1&sa=X&ved=2ahUKEwjZxN3N0sqBAxWpSGwGHSRbBHgQ6AF6BAgOEAM#Adi%20Shankaracharya%20508%20BCE Studies in Religion and Change Society Indian History and Culture 1983 Books & Books 1983 73 en Guruparampara - Smritis of Dwaraka and , Govardhana - Puri Peetham too agree with this date of Adi Sankara , i.e. K.E. 2593 corresponding to 508 B.C.1979 Journal of Indian History https://books.google.co.in/books?id=H_htAAAAMAAJ&q=Adi+Shankaracharya+508+BCE&dq=Adi+Shankaracharya+508+BCE&hl=hi&sa=X&ved=2ahUKEwihv5XlgqHzAhVRIqYKHYB2CCEQ6AF6BAgFEAM Department of Modern Indian History 57 225-30https://books.google.co.in/books?id=T5DXAAAAMAAJ&q=Adi+Shankaracharya+508+BCE&dq=Adi+Shankaracharya+508+BCE&hl=hi&sa=X&ved=2ahUKEwihv5XlgqHzAhVRIqYKHYB2CCEQ6AF6BAgJEAM Kanchi Kamakoti Math, a Myth Varanasi Raj Gopal Sharma 1987 64 en Sri Adi Sankar's time ( 508 B.C ) . They claim this plate as their own since the plate mentions the recipient living in a math near Hastishailanatha temple .https://books.google.co.in/books?id=7RIqAAAAYAAJ&q=Adi+Shankaracharya+508+BCE&dq=Adi+Shankaracharya+508+BCE&hl=en&newbks=1&newbks_redir=0&source=gb_mobile_search&ovdme=1&sa=X&ved=2ahUKEwjZxN3N0sqBAxWpSGwGHSRbBHgQ6AF6BAgNEAM#Adi%20Shankaracharya%20508%20BCE History Revealed by the Rāmāyaṇa Astronomy Chaudhuri Puspendu 1998 Firma KLM 978-81-7102-097-3 en Shri Vivekananda Choudhury , however , in his aforesaid book proved that Adi Shankara was born on April 22 , Sunday , 508 B.C2019 Ritual Journeys in South Asia: Constellations and Contestations of Mobility and space https://books.google.co.in/books?id=_1GoDwAAQBAJ&pg=PT33&dq=Adi+Shankaracharya+508+BCE&hl=hi&sa=X&ved=2ahUKEwihv5XlgqHzAhVRIqYKHYB2CCEQ6AF6BAgLEAM#v=onepage&q=Adi%20Shankaracharya%20508%20BCE&f=false Ritual Journeys in South Asia Christoph Bergmann 91979 Swarajya https://books.google.co.in/books?id=zf0sAAAAIAAJ&q=Adi+Shankaracharya+508+BCE&dq=Adi+Shankaracharya+508+BCE&hl=hi&sa=X&ved=2ahUKEwihv5XlgqHzAhVRIqYKHYB2CCEQ6AF6BAgHEAM Swarajya T. Sadavisam 23 2http://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.481060 भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें ( Some Blunders of Indian Historical Research का हिन्दी अनुवाद ) N. Oak Purushottam भट्ट श्री जगमोहन राव 1971 1971 190-207 hi 2017-01-25https://books.google.co.in/books?id=hLHXAAAAMAAJ&q=Adi+Shankaracharya+508+BCE&dq=Adi+Shankaracharya+508+BCE&hl=hi&sa=X&ved=2ahUKEwjKnZHUiqHzAhWQBd4KHfHSAN04ChDoAXoECAMQAw A Religious History of Ancient India, Upto C. 1200 A.D.: Smarta, epic-Pauranika and Tantrika Hinduism, Christianity and Islam Śrīrāma Goyala 1986 60 en Adi Sankara was born in 508 or 509 B.C.https://books.google.co.in/books?id=HLU9AAAAMAAJ&q=inauthor:%22Kota+Venkatachelam%22&dq=inauthor:%22Kota+Venkatachelam%22&hl=hi&sa=X&redir_esc=y Age of Buddha, Milinda & Amtiyoka and Yugapurana Kota Venkatachelam 1956 201 en Original PDF Birth of Adi Sankara 509 BC 2020-03-22 इन्होंने भारतवर्ष में चार कोनों में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं और जिन पर आसीन संन्यासी 'शंकराचार्य' कहे जाते हैं। वे चारों स्थान ये हैं-
१: ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम,
२: श्रृंगेरी पीठ,
३: द्वारिका शारदा पीठ और
४: पुरी गोवर्धन पीठ।
इन्होंने अनेक विधर्मियों को भी अपने धर्म में दीक्षित किया था। ये भगवान् शंकर के अवतार माने जाते हैं। इन्होंने ब्रह्मसूत्रों की बहुत विशद और रोचक व्याख्या की है।https://www.jagran.com/news/national-adi-shankaracharya-jayanti-that-amazing-journey-of-adi-shankaracharya-the-bearer-of-culture-fills-with-wonder-jagran-special-20227747.html Adi Shankaracharya Praktotsav: आश्चर्य से भर देती है आदि शंकराचार्य की वह अद्भुत यात्रा jagran
उन के विचारोपदेश आत्मा और परमात्मा की एकरूपता पर आधारित हैं जिस के अनुसार परमात्मा एक ही समय में सगुण और निर्गुण दोनों ही स्वरूपों में रहता है। स्मार्त संप्रदाय में आचार्य शंकर को शिव का अवतार माना जाता है। इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा। वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उस का प्रचार तथा वार्ता पूरे भारतवर्ष में की। उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न चार्वाक, जैन आदि मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया।
कलियुग के प्रथम चरण में विलुप्त तथा विकृत वैदिक ज्ञान विज्ञान को उद्भासित और विशुद्ध कर वैदिक वाङ्मय को दार्शनिक, व्यावहारिक, वैज्ञानिक धरातल पर समृद्ध करने वाले एवं राजर्षि सुधन्वा को सार्वभौम सम्राट् ख्यापित करने वाले चतुराम्नाय चतुष्पीठ संस्थापक नित्य तथा नैमित्तिक युग्मावतार श्रीशिवस्वरुप भगवत्पाद शंकराचार्य की अमोघदृष्टि तथा अद्भुत कृति सर्वथा स्तुत्य है।
सतयुग की अपेक्षा त्रेता में, त्रेता की अपेक्षा द्वापर में तथा द्वापर की अपेक्षा कलि में मनुष्यों की प्रज्ञाशक्ति तथा प्राणशक्ति एवं धर्म औेर आध्यात्म का ह्रास सुनिश्चित है। यही कारण है कि कृतयुग में शिवावतार भगवान् दक्षिणामूर्ति ने केवल मौन व्याख्यान से शिष्यों के संशयों का निवारण किया। त्रेता में गुरु दत्तात्रेय जिन को ब्रह्मा, विष्णु और महेश भगवान् द्वारा ज्ञान प्रदान किया गया था, उन्होंने सूत्रात्मक वाक्यों के द्वारा अनुगतों का उद्धार किया। द्वापर में नारायणावतार भगवान् कृष्णद्वैपायन वेदव्यास ने वेदों का विभाग कर महाभारत तथा पुराणादि की एवं ब्रह्मसूत्रों की संरचना कर एवं शुक, लोमहर्षण आदि कथाव्यासों को प्रशिक्षित कर धर्म तथा आध्यात्म को उज्जीवित रखा। कलियुग में भगवत्पाद श्रीमद् शंकराचार्य ने भाष्य, प्रकरण तथा स्तोत्रग्रन्थों की संरचना कर , विधर्मियों पन्थायियों एवं मीमांसकादि से शास्त्रार्थ, परकाय प्रवेश कर, नारदकुण्ड से अर्चाविग्रह श्रीबदरीनाथ एवं भूगर्भ से अर्चाविग्रह श्रीजगन्नाथ दारुब्रह्म को प्रकट कर तथा प्रस्थापित कर, सुधन्वा सार्वभौम को राजसिंहासन समर्पित कर एवं चतुराम्नाय - चतुष्पीठों की स्थापना कर अहर्निश अथक परिश्रम के द्वारा धर्म और अध्यात्म को उज्जीवित तथा प्रतिष्ठित किया।
व्यासपीठ के पोषक राजपीठ के परिपालक धर्माचार्यों को श्रीभगवत्पाद ने नीतिशास्त्र, कुलाचार तथा श्रौत स्मार्त कर्म, उपासना तथा ज्ञानकाण्ड के यथायोग्य प्रचार प्रसार की भावना से अपने अधिकार क्षेत्र में परिभ्रमण का उपदेश दिया। उन्होंने धर्मराज्य की स्थापना के लिये व्यासपीठ तथा राजपीठ में सद्भावपूर्ण सम्वाद के माध्यम से सामंजस्य बनाये रखने की प्रेरणा प्रदान की। ब्रह्मतेज तथा क्षात्रबल के साहचर्य से सर्वसुमंगल कालयोग की सिद्धि को सुनिश्चित मान कर कालगर्भित तथा कालातीतदर्शी आचार्य शंकर ने व्यासपीठ तथा राजपीठ का शोधन कर दोनों में सैद्धान्तिक सामंजस्य साधा।
दशनामी गोस्वामी में सरस्वती, गिरि, पुरी, वन, योगी, पर्वत, अरण्य, सागर, तीर्थ, आश्रम, भारती उपनाम वाले योगी, गोस्वामी इन के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माने जाते हैं और उन के प्रमुख सामाजिक संगठन का नाम "अंतरराष्ट्रीय जगत्गुरु दशनाम गोस्वामी एकता अखाड़ा परिषद" है। आचार्य शंकर ने पूरे भारत में मंदिरों और शक्तिपीठों की पुनः स्थापना की। नील पर्वत पर स्थित चंडी देवी मंदिर इन्हीं द्वारा स्थापित किया माना जाता है। शिवालिक पर्वत शृंखला की पहाड़ियों के मध्य स्थित माता शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ में जा कर इन्होंने पूजा अर्चना की और शाकंभरी देवी के साथ तीन देवियाँ भीमा, भ्रामरी और शताक्षी देवी की प्रतिमाओं को स्थापित किया। कामाक्षी देवी मंदिर भी इन्हीं द्वारा स्थापित है जिस से उस युग में धर्म का बढ़ चढ़कर प्रसार हुआ था।
जीवनचरित
आचार्य शंकर का जन्म ५०७ ई.स.पू. में केरल में कालड़ी अथवा 'काषल' नामक ग्राम में हुआ था। आचार्य शंकर के पिता का नाम शिवगुरु भट्ट और माता का नाम अयम्बा था। बहुत दिन तक सपत्नीक शिव को आराधना करने के अनंतर शिवगुरु ने पुत्ररत्न पाया था, अत: उस का नाम शंकर रखा। जब ये तीन ही वर्ष के थे तब इनके पिता का देहांत हो गया। ये बड़े ही मेधावी तथा प्रतिभाशाली थे। ६ वर्ष की अवस्था में ही ये प्रकांड पंडित हो गए थे और ८ वर्ष की अवस्था में इन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। इन के संन्यास ग्रहण करने के समय की कथा बड़ी विचित्र है। कहते हैं कि माता एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थीं। तब एक दिन नदी किनारे एक मकर ने आचार्य शंकर का पैर पकड़ लिया तब इस समय का फायदा उठाते आचार्य शंकर ने अपनी माता से कहा "मुझे सन्यास लेने की आज्ञा दो नहीं तो यह मकर मुझे खा जायेगा", इस से भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान की; और आश्चर्य है कि, जैसे ही माता ने आज्ञा दी वैसे ही तुरन्त मकर ने आचार्य शंकर का पैर छोड़ दिया और इन्होंने गोविन्द नाथ से संन्यास ग्रहण किया।https://hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-mahapurush/adi-shankaracharya-119050400029_1.html आदि शंकराचार्य के जन्म के बारे में फैला भ्रम, जानिए सचाई Hindi Webdunia https://web.archive.org/web/20190725132851/http://hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-mahapurush/adi-shankaracharya-119050400029_1.html 25 जुलाई 2019 dead
पहले ये कुछ दिनों तक काशी में रहे, और तब इन्होंने विजिलबिंदु के तालवन में आचार्य मण्डन मिश्र को सपत्नीक शास्त्रार्थ में परास्त किया। इन्होंने समस्त भारतवर्ष में भ्रमण कर के वैदिक धर्म को पुनरुज्जीवित किया।
३२ वर्ष की अल्प आयु में सम्वत् ४७५ ई.पू. में केदारनाथ के समीप शिवलोक गमन कर गए थे।
काल
भारतीय संस्कृति के विकास एवं संरक्षण में आद्य शंकराचार्य का विशेष योगदान है। राजा सुधन्वा चौहान, जो कि आचार्य शंकर के समकालीन थे, के ताम्रपत्र में आचार्य शंकर का जन्म युधिष्ठिराब्द २६३१ शक् (५०७ ई०पू०) तथा शिवलोक गमन युधिष्ठिराब्द २६६३ शक् (४७५ ई०पू०) सर्वमान्य है। इस के प्रमाण सभी शांकर मठों में मिलते हैं।
आचार्य शंकर ने जो चार पीठ स्थापित किये, उन के काल निर्धारण में उत्थापित की गई भ्रांतियाँ -
१: उत्तर दिशा में बदरिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ : स्थापना-युधिष्ठिर संवत् 2641-2645
२: पश्चिम में द्वारिका शारदापीठ- यु.सं. 2648
३: दक्षिण शृंगेरीपीठ- यु.सं. 2648
४: पूर्व दिशा जगन्नाथपुरी गोवर्द्धनपीठ - यु.सं. 2655
आचार्य शंकर अंतिम दिनों में कांची कामकोटि पीठ २६५८ यु.सं. में निवास कर रहे थे।
शारदापीठ में लिखा है -
"युधिष्ठिर शके २६३१ वैशाखशुक्लापंचम्यां श्रीमच्ठछंकरावतार:।
……तदनु २६६३ कार्तिकशुक्लपूर्णिमायां ……श्रीमच्छंकरभगवत्पूज्यपादा…… निजदेहेनैव…… निजधाम प्राविशन्निति।
अर्थात् युधिष्ठिर संवत् २६३१ में वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को श्रीशंकराचार्य का जन्म हुआ और युधि.सं. २६६३ कार्तिकशुक्ल पूर्णिमा को देहत्याग हुआ। युधिष्ठिर संवत् ३१३९ ई पू में प्रवर्तित हुआ था।
राजा सुधन्वा के ताम्रपत्र का लेख द्वारिकापीठ के एक आचार्य ने "विमर्श" नामक ग्रन्थ में प्रकाशित किया है -
'निखिलयोगिचक्रवर्त्ती श्रीमच्छंकरभगवत्पादपद्मयोर्भ्र
मरायमाणसुधन्वनो मम सोमवंशचूडामणियुधिष्ठिरपारम्पर्
यपरिप्राप्तभारतवर्षस्यांजलिबद्धपूर्वकेयं राजन्यस्य विज्ञप्ति:………युधिष्ठिरशके २६६३ आश्विन शुक्ल १५।
एक अन्य ताम्रपत्र संस्कृतचंद्रिका (कोल्हापुर) के खण्ड 14, संख्या 2 - 3 में प्रकाशित हुआ था। उस के अनुसार गुजरात के राजा सर्वजित् वर्मा ने द्वारिकाशारदापीठ के प्रथम आचार्य सुरेश्वराचार्य (पूर्व नाम - मंडनमिश्र) से लेकर 29वें आचार्य श्री नृसिंहाश्रम तक सभी आचार्यों के विवरण हैं। इस में प्रथम आचार्य का समय 2649 युधि. सं. दिया है।
सर्वज्ञसदाशिवकृत "पुण्यश्लोकमंजरी" आत्मबोध द्वारा रचित "गुरुरत्नमालिका" तथा उसकी टीका "सुषमा"में कुछ श्लोक हैं।
उन में एक श्लोक इस प्रकार है -
तिष्ये प्रयात्यनलशेवधिबाणनेत्रे, ये नन्दने दिनमणावुदगध्वभाजि ।
रात्रोदितेरुडुविनिर्गतमंगलग्नेत्याहूतवान् शिवगुरु: स च शंकरेति ॥
अर्थ- अनल=3 , शेवधि=निधि=9, बाण=5,नेत्र=2 ,
अर्थात् 3952 | 'अंकानां वामतोगति:' इस नियमसे अंक विपरीत क्रम से रखने पर 2593 कलिसंवत् बना|
[कलिसंवत् 3102 B.C. में प्रारम्भ हुआ ]
तदनुसार 3102-2593=509 BC में आदि शंकराचार्य जी का जन्म वर्ष निश्चित होता है।
कुमारिल भट्ट जो कि शंकराचार्य के समकालीन थे, जैन ग्रंथ जिनविजय में लिखा है -
ऋषिर्वारस्तथा पूर्ण मर्त्याक्षौ वाममेलनात्।
एकीकृत्य लभेतांक:क्रोधीस्यात्तत्र वत्सर:। ।
भट्टाचार्यस्य कुमारस्य कर्मकाण्डैकवादिन:।
ज्ञेय: प्रादुर्भवस्तस्मिन् वर्षे यौधिष्ठिरे शके।।
जैन लोग युधिष्ठिरसंवत् को ४६८ कलिसंवत् से प्रारम्भ हुआ मानते हैं।
श्लोकार्थ- ऋषि=7,वार=7,पूर्ण=0, मर्त्याक्षौ=2,
7702 "अंकानांवामतोगति"
2077 युधिष्ठिर संवत् आया
अर्थात् 557 B.C.
कुमारिल 48 वर्ष बड़े थे => 509 B.C. श्रीशंकराचार्य जी का जन्मवर्ष सिद्ध होता है।
"जिनविजय" में आचार्य शंकर के देहावसान के विषय में लिखा है -
ऋषिर्बाणस्तथा भूमिर्मर्त्याक्षौ वांममेलनात्।
एकत्वेन लभेतांकस्ताम्राक्षस्तत्र वत्सर: ॥
2157 यु. सं. 476 B.C. में आचार्य शंकर ब्रह्मलीन हुए :
बृहत्शंकरविजय में चित्सुखाचार्य (शंकराचार्य के सह अध्यायी) ने लिखा है -
षड्विंशकेशतके श्रीमद् युधिष्ठिरशकस्य वै।
एकत्रिंशेऽथ वर्षेतु हायने नन्दने शुभे॥
………………………………|
प्रासूत तन्वंसाध्वी गिरिजेव षडाननम्॥
यहाँ युधिष्ठिर शक 2631 में अर्थात् 508 ई. पू. में आचार्य का जन्म संवत् बताया गया है।
वर्तमान इतिहासकार जिन शंकराचार्य को 788 - 820 ई. का बताते हैं वे वस्तुत: कामकोटि पीठके 38वें आचार्य अभिनवशंकर जी थे। वे 787 से 840 ईसवीसन् तक विद्यमान थे। वे चिदम्बरम वासी श्रीविश्वजी के पुत्र थे। इन्होंने कश्मीर के वाक्पतिभट्ट को शास्त्रार्थ में पराजित किया और ३० वर्ष तक मठ के आचार्य पद पर रहे।
प्रमुख कार्य
शंकर दिग्विजय, शंकरविजयविलास, शंकरजय आदि ग्रन्थों में उन के जीवन से सम्बन्धित तथ्य उद्घाटित होते हैं। दक्षिण भारत के केरल राज्य (तत्कालीन मालाबारप्रांत) में आद्य शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था। उनके पिता शिव गुरु तैत्तिरीय शाखा के यजुर्वेदी भट्ट ब्राह्मण थे। भारतीय प्राच्य परम्परा में आचार्य शंकर को शिव का अवतार स्वीकार किया जाता है। कुछ उन के जीवन के चमत्कारिक तथ्य सामने आते हैं, जिस से प्रतीत होता है कि वास्तव में आद्य शंकराचार्य शिव के अवतार थे। ८ वर्ष की अवस्था में आचार्य गोविन्द नाथ के शिष्यत्व को ग्रहण कर संन्यासी हो जाना, पुन: वाराणसी से होते हुए बद्रिकाश्रम तक की पैदल यात्रा करना, सोलह वर्ष की अवस्था में बद्रीकाश्रम पहुंच कर ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखना, सम्पूर्ण भारत वर्ष में भ्रमण कर अद्वैत वेदान्त का प्रचार करना, दरभंगा में जाकर आचार्य मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ कर वेदान्त की दीक्षा देना तथा आचार्य मण्डन मिश्र को संन्यास धारण कराना, भारतवर्ष में प्रचलित तत्कालीन कुरीतियों को दूर कर समभावदर्शी धर्म की स्थापना करना - इत्यादि कार्य इन के महत्त्व को और बढ़ा देता है। दशनाम गोस्वामी समाज (सरस्वती, गिरि, पुरी, बन, भारती, तीर्थ, सागर, अरण्य, पर्वत और आश्रम) की संस्थापना कर, सनातन धर्म गुरु के रूप में हिंदुओं के प्रचार प्रसार व रक्षा का कार्य सौंपा और उन्हें अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी भी बताया।
मठ
चार धार्मिक मठों में दक्षिण के शृंगेरी शंकराचार्यपीठ, पूर्व (ओडिशा) जगन्नाथपुरी में गोवर्धनपीठ, पश्चिम द्वारिका में शारदामठ तथा बद्रिकाश्रम में ज्योतिर्पीठ भारत की एकात्मकता को आज भी दिग्दर्शित कर रहा है। कुछ लोग शृंगेरी को शारदापीठ तथा गुजरात के द्वारिका में मठ को काली मठ कहते हैं। उक्त सभी कार्य को सम्पादित कर ३२ वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हुए।
शास्त्रीय प्रमाण
सर्गे प्राथमिके प्रयाति विरतिं मार्गे स्थिते दौर्गते स्वर्गे दुर्गमतामुपेयुषि भृशं दुर्गेऽपवर्गे सति।
वर्गे देहभृतां निसर्ग मलिने जातोपसर्गेऽखिले सर्गे विश्वसृजस्तदीयवपुषा भर्गोऽवतीर्णो भुवि। ।
अर्थ:- " सनातन संस्कृति के पुरोधा सनकादि महर्षियों का प्राथमिक सर्ग जब उपरति को प्राप्त हो गया , अभ्युदय तथा नि:श्रेयसप्रद वैदिक सन्मार्ग की दुर्गति होने लगी , फलस्वरुप स्वर्ग दुर्गम होने लगा ,अपवर्ग अगम हो गया , तब इस भूतल पर भगवान भर्ग ( शिव ) शंकर रूप से अवतीर्ण हुऐ। "
भगवान शिव द्वारा द्वारा कलियुग के प्रथम चरण में अपने चार शिष्यों के साथ जगदगुरु आचार्य शंकर के रूप में अवतार लेने का वर्णन पुराणशास्त्र में भी वर्णित हैं जो इस प्रकार हैं :-
कल्यब्दे द्विसहस्त्रान्ते लोकानुग्रहकाम्यया।
चतुर्भि: सह शिष्यैस्तु शंकरोऽवतरिष्यति। । ( भविष्योत्तर पुराण ३६ )
अर्थ :- " कलि के दो सहस्त्र वर्ष व्यतीत होने के पश्चात लोक अनुग्रह की कामना से श्री सर्वेश्वर शिव अपने चार शिष्यों के साथ अवतार धारण कर अवतरित होते हैं। "
निन्दन्ति वेदविद्यांच द्विजा: कर्माणि वै कलौ।
कलौ देवो महादेव: शंकरो नीललोहित:। ।
प्रकाशते प्रतिष्ठार्थं धर्मस्य विकृताकृति:।
ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनापि शंकरम्। ।
कलिदोषान्विनिर्जित्य प्रयान्ति परमं पदम्। (लिंगपुराण ४०. २०-२१.१/२)
अर्थ:- " कलि में ब्राह्मण वेदविद्या और वैदिक कर्मों की जब निन्दा करने लगते हैं ; रुद्र संज्ञक विकटरुप नीललोहित महादेव धर्म की प्रतिष्ठा के लिये अवतीर्ण होते हैं। जो ब्राह्मणादि जिस किसी उपाय से उनका आस्था सहित अनुसरण सेवन करते हैं ; वे परमगति को प्राप्त होते हैं। "
कलौ रुद्रो महादेवो लोकानामीश्वर: पर:।
न देवता भवेन्नृणां देवतानांच दैवतम्। ।
करिष्यत्यवताराणि शंकरो नीललोहित:।
श्रौतस्मार्त्तप्रतिष्ठार्थं भक्तानां हितकाम्यया। ।
उपदेक्ष्यति तज्ज्ञानं शिष्याणां ब्रह्मासंज्ञितम।
सर्ववेदान्तसार हि धर्मान वेदनदिर्शितान। ।
ये तं विप्रा निषेवन्ते येन केनोपचारत:।
विजित्य कलिजान दोषान यान्ति ते परमं पदम। । ( कूर्मपुराण १.२८.३२-३४)
अर्थ:- " कलि में देवों के देव महादेव लोकों के परमेश्वर रुद्र शिव मनुष्यों के उद्धार के लिये उन भक्तों की हित की कामना से श्रौत-स्मार्त -प्रतिपादित धर्म की प्रतिष्ठा के लिये विविध अवतारों को ग्रहण करेंगें। वे शिष्यों को वेदप्रतिपादित सर्ववेदान्तसार ब्रह्मज्ञानरुप मोक्ष धर्मों का उपदेश करेंगें। जो ब्राह्मण जिस किसी भी प्रकार उनका सेवन करते हैं ; वे कलिप्रभव दोषों को जीतकर परमपद को प्राप्त करते हैं। "
व्याकुर्वन् व्याससूत्रार्थं श्रुतेरर्थं यथोचिवान्।
श्रुतेर्न्याय: स एवार्थ: शंकर: सवितानन:। । ( शिवपुराण-रुद्रखण्ड ७.१)
अर्थ:- "सूर्यसदृश प्रतापी श्री शिवावतार आचार्य शंकर श्री बादरायण - वेदव्यासविरचित ब्रह्मसूत्रों पर श्रुतिसम्मत युक्तियुक्त भाष्य संरचना करते हैं। "
महत्त्व
शंकराचार्य के विषय में कहा गया है-
अष्टवर्षेचतुर्वेदी, द्वादशेसर्वशास्त्रवित् षोडशेकृतवान्भाष्यम्द्वात्रिंशेमुनिरभ्यगात्
अर्थात् आठ वर्ष की आयु में चारों वेदों में निष्णात हो गए, बारह वर्ष की आयु में सभी शास्त्रों में पारंगत, सोलह वर्ष की आयु में शांकरभाष्यतथा बत्तीस वर्ष की आयु में शरीर त्याग दिया। ब्रह्मसूत्र के ऊपर शांकरभाष्यकी रचना कर विश्व को एक सूत्र में बांधने का प्रयास भी शंकराचार्य के द्वारा किया गया है, जो कि सामान्य मानव से सम्भव नहीं है। शंकराचार्य के दर्शन में सगुण ब्रह्म तथा निर्गुण ब्रह्म दोनों का हम दर्शन, कर सकते हैं। निर्गुण ब्रह्म उनका निराकार ईश्वर है तथा सगुण ब्रह्म साकार ईश्वर है। जीव अज्ञान व्यष्टि की उपाधि से युक्त है। तत्त्वमसि तुम ही ब्रह्म हो; अहं ब्रह्मास्मि मैं ही ब्रह्म हूं; 'अयामात्मा ब्रह्म' यह आत्मा ही ब्रह्म है; इन बृहदारण्यकोपनिषद् तथा छान्दोग्योपनिषद वाक्यों के द्वारा इस जीवात्मा को निराकार ब्रह्म से अभिन्न स्थापित करने का प्रयत्न शंकराचार्य जी ने किया है। ब्रह्म को जगत् के उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय का निमित्त कारण बताए हैं। ब्रह्म सत् (त्रिकालाबाधित) नित्य, चैतन्यस्वरूप तथा आनंद स्वरूप है। ऐसा उन्होंने स्वीकार किया है। जीवात्मा को भी सत् स्वरूप, चैतन्य स्वरूप तथा आनंद स्वरूप स्वीकार किया है। जगत् के स्वरूप को बताते हुए कहते हैं कि -
नामरूपाभ्यां व्याकृतस्य अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य प्रतिनियत देशकालनिमित्तक्रियाफलाश्रयस्य मनसापि अचिन्त्यरचनारूपस्य जन्मस्थितिभंगंयत:।
अर्थात् नाम एवं रूप से व्याकृत, अनेक कर्ता, अनेक भोक्ता से संयुक्त, जिसमें देश, काल, निमित्त और क्रियाफल भी नियत हैं। जिस जगत् की सृष्टि को मन से भी कल्पना नहीं कर सकते, उस जगत् की उत्पत्ति, स्थिति तथा लय जिससे होता है, उसको ब्रह्म कहते हैं। सम्पूर्ण जगत् के जीवों को ब्रह्म के रूप में स्वीकार करना, तथा तर्क आदि के द्वारा उसके सिद्ध कर देना, आदि शंकराचार्य की विशेषता रही है। इस प्रकार शंकराचार्य के व्यक्तित्व तथा कृतित्वके मूल्यांकन से हम कह सकते हैं कि राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का कार्य शंकराचार्य जी ने सर्वतोभावेनकिया था। भारतीय संस्कृति के विस्तार में भी इनका अमूल्य योगदान रहा है।
शास्त्रार्थ
अंगूठाकार|दाएँ|आदि शंकराचाय जी की मूर्ति
आदि शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म सहित अपने समय के विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं से धार्मिक वाद-विवाद किया और शास्त्रार्थ में कुछ उल्लेखनीय लोगों को सार्वजनिक रूप से हराया।https://www.google.co.uk/books/edition/Science_of_the_Mystical/ULvtDwAAQBAJ?hl=en&gbpv=1&dq=adi+shankara+defeated+buddhism&pg=PT59&printsec=frontcover Science of the Mystical: An Eye Opener to the Scientific Substratum in Spirituality
वे केरल से लंबी पदयात्रा करके नर्मदा नदी के तट पर स्थित ओंकारनाथ पहुँचे। वहाँ गुरु गोविंदपाद से योग शिक्षा तथा अद्वैत ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने लगे। तीन वर्ष तक आचार्य शंकर अद्वैत तत्त्व की साधना करते रहे। तत्पश्चात गुरु आज्ञा से वे काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए निकल पड़े। जब वे काशी जा रहे थे कि एक चांडाल उनकी राह में आ गया। उन्होंने क्रोधित हो चांडाल को वहाँ से हट जाने के लिए कहा तो चांडाल बोला- ‘हे मुनि! आप शरीरों में रहने वाले एक परमात्मा की उपेक्षा कर रहे हैं, इसलिए आप अब्राह्मण हैं। अतएव मेरे मार्ग से आप हट जायें।’ चांडाल की देववाणी सुन आचार्य शंकर ने अति प्रभावित होकर कहा-‘आपने मुझे ज्ञान दिया है, अत: आप मेरे गुरु हुए।’ यह कहकर आचार्य शंकर ने उन्हें प्रणाम किया तो चांडाल के स्थान पर शिव तथा चार देवों के उन्हें दर्शन हुए। काशी में कुछ दिन रहने के दौरान वे माहिष्मति नगरी (बिहार का महिषी) में आचार्य मंडन मिश्र से मिलने गए। आचार्य मिश्र के घर जो पालतू मैना थी वह भी वेद मंत्रों का उच्चारण करती थी। मिश्र जी के घर जाकर आचार्य शंकर ने उन्हें शास्त्रार्थ में हरा दिया। पति आचार्य मिश्र को हारता देख पत्नी आचार्य शंकर से बोलीं- ‘महात्मन! अभी आपने आधे ही अंग को जीता है। अपनी युक्तियों से मुझे पराजित करके ही आप विजयी कहला सकेंगे।’
तब मिश्र जी की पत्नी भारती ने कामशास्त्र पर प्रश्न करने प्रारम्भ किए। किंतु आचार्य शंकर तो बाल-ब्रह्मचारी थे, अत: काम से संबंधित उनके प्रश्नों के उत्तर कहाँ से देते? इस पर उन्होंने भारती देवी से कुछ दिनों का समय माँगा तथा पर-काया में प्रवेश कर उस विषय की सारी जानकारी प्राप्त की। इसके बाद आचार्य शंकर ने भारती को भी शास्त्रार्थ में हरा दिया। काशी में प्रवास के दौरान उन्होंने और भी बड़े-बड़े ज्ञानी पंडितों को शास्त्रार्थ में परास्त किया और गुरु पद पर प्रतिष्ठित हुए। अनेक शिष्यों ने उनसे दीक्षा ग्रहण की। इसके बाद वे धर्म का प्रचार करने लगे। वेदांत प्रचार में संलग्न रहकर उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना भी की। अद्वैत ब्रह्मवादी आचार्य शंकर केवल निर्विशेष ब्रह्म को सत्य मानते थे और ब्रह्मज्ञान में ही निमग्न रहते थे। एक बार वे ब्रह्म मुहूर्त में अपने शिष्यों के साथ एक अति सँकरी गली से स्नान हेतु मणिकर्णिका घाट जा रहे थे। रास्ते में एक युवती अपने मृत पति का सिर गोद में लिए विलाप करती हुई बैठी थी। आचार्य शंकर के शिष्यों ने उस स्त्री से अपने पति के शव को हटाकर रास्ता देने की प्रार्थना की, लेकिन वह स्त्री उसे अनसुना कर रुदन करती रही। तब स्वयं आचार्य ने उससे वह शव हटाने का अनुरोध किया। उनका आग्रह सुनकर वह स्त्री कहने लगी- ‘हे संन्यासी! आप मुझसे बार-बार यह शव हटाने के लिए कह रहे हैं। आप इस शव को ही हट जाने के लिए क्यों नहीं कहते?’ यह सुनकर आचार्य बोले- ‘हे देवी! आप शोक में कदाचित यह भी भूल गई कि शव में स्वयं हटने की शक्ति ही नहीं है।’ स्त्री ने तुरंत उत्तर दिया- ‘महात्मन् आपकी दृष्टि में तो शक्ति निरपेक्ष ब्रह्म ही जगत का कर्ता है। फिर शक्ति के बिना यह शव क्यों नहीं हट सकता?’ उस स्त्री का ऐसा गंभीर, ज्ञानमय, रहस्यपूर्ण वाक्य सुनकर आचार्य वहीं बैठ गए। उन्हें समाधि लग गई। अंत:चक्षु में उन्होंने देखा- सर्वत्र आद्याशक्ति महामाया लीला विलाप कर रही हैं। उनका हृदय अनिवर्चनीय आनंद से भर गया और मुख से मातृ वंदना की शब्दमयी धारा स्तोत्र बनकर फूट पड़ी।
अब आचार्य शंकर ऐसे महासागर बन गए, जिसमें अद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, विशिष्टा द्वैतवाद, निर्गुण ब्रह्म ज्ञान के साथ सगुण साकार की भक्ति की धाराएँ एक साथ हिलोरें लेने लगीं। उन्होंने अनुभव किया कि ज्ञान की अद्वैत भूमि पर जो परमात्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म है, वही द्वैत की भूमि पर सगुण साकार है। उन्होंने निर्गुण और सगुण दोनों का समर्थन करके निर्गुण तक पहुँचने के लिए सगुण की उपासना को अपरिहार्य सीढ़ी माना। ज्ञान और भक्ति की मिलन भूमि पर यह भी अनुभव किया कि अद्वैत ज्ञान ही सभी साधनाओं की परम उपलब्धि है। उन्होंने ‘ब्रह्मं सत्यं जगन्मिथ्या’ का उद्घोष भी किया और शिव, पार्वती, गणेश, विष्णु आदि के भक्तिरसपूर्ण स्तोत्र भी रचे, ‘सौन्दर्य लहरी’, ‘विवेक चूड़ामणि’ जैसे श्रेष्ठतम ग्रंथों की रचना की। प्रस्थान त्रयी के भष्य भी लिखे। अपने अकाट्य तर्कों से शैव-शाक्त-वैष्णवों का द्वंद्व समाप्त किया और पंचदेवोपासना का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने आसेतु हिमालय संपूर्ण भरत की यात्रा की और चार मठों की स्थापना करके पूरे देश को सांस्कृतिक, धार्मिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा भौगोलिक एकता के अविच्छिन्न सूत्र में बाँध दिया। उन्होंने समस्त मानव जाति को जीवन्मुक्ति का एक सूत्र दिया-
दुर्जन: सज्जनो भूयात सज्जन: शांतिमाप्नुयात्।
शान्तो मुच्येत बंधेम्यो मुक्त: चान्यान् विमोच्येत्॥
अर्थात् दुर्जन सज्जन बनें, सज्जन शांति बनें। शांतजन बंधनों से मुक्त हों और मुक्त अन्य जनों को मुक्त करें। अपना प्रयोजन पूरा होने बाद तैंतीस वर्ष की अल्पायु में उन्होंने इस नश्वर देह को छोड़ दिया।
दर्शन और विचार
अद्वैत वेदान्त
संक्षेप में अद्वैत
शंकराचार्य एक महान समन्वयवादी थे। उन्हें सनातन धर्म को पुनः स्थापित एवं प्रतिष्ठित करने का श्रेय दिया जाता है। एक तरफ उन्होने अद्वैत चिन्तन को पुनर्जीवित करके सनातन हिन्दू धर्म के दार्शनिक आधार को सुदृढ़ किया, तो दूसरी तरफ उन्होने जनसामान्य में प्रचलित मूर्तिपूजा का औचित्य सिद्ध करने का भी प्रयास किया।
आदि शकराचार्य जी महाराज की 108 फूट की मूर्ति ओम्कारेश्वर जिला खंडवा मध्यप्रदेश में स्थापित की जा रही है
कई यूरोपीय विद्वानों का हवाला देते हुए, Lucian Blaga समझता है कि आदि शंकराचार्य 'सभी समय का सबसे बड़े तत्वमीमांसा का विद्वान है'।लुचीयान बलागा, धर्म के दर्शन का कोर्स, पेरिस, अल्बा -यूलिया, फरोनदे का प्रकाशन संस्था, एक हजार नौ सौ नब्बे चार, उनहत्तर का पृष्ठ। (ISBN 973-963-1215) आदि शंकराचार्य ने कहा कि ज्ञान के दो प्रकार के होते हैं। एक पराविद्या कहा जाता है और अन्य में अपराविद्या कहा जाता है। पहला सगुण ब्रह्म (ईश्वर) होता है लेकिन दूसरा निर्गुण ब्रह्म होता है।मीर्चा ईटु, भारतीय दर्शन और भारतीय धर्म, ब्राशोव, लैटिन पूरबी का प्रकाशन संस्था, दो हज़ार चार, सड़सठ और अड़सठ के पृष्ठों। (ISBN 973-9338-70-4)
शंकर के अद्वैत का दर्शन का सार-
ब्रह्म और जीव मूलतः और तत्वतः एक हैं। हमे जो भी अंतर नज़र आता है उसका कारण अज्ञान है।
जीव की मुक्ति के लिये ज्ञान आवश्यक है।
जीव की मुक्ति ब्रह्म में लीन हो जाने में है।
बौद्ध धर्म का पतन
उन्होंने अपने समय में अस्तित्वहीन रीति-रिवाजों, ईश्वरविहीन बौद्ध धर्म और कई अन्य परंपराओं के प्रतिकारक रूप का विरोध किया।
अद्वैत परंपरा के अनुयायियों का दावा है कि वह "बौद्धों को दूर भगाने" के लिए भी जिम्मेदार थे। ऐतिहासिक रूप से भारत में बौद्ध धर्म का पतन शंकर या यहां तक कि कुमारिल भट्ट (जिन्होंने एक परंपरा के अनुसार "बौद्धों को वाद-विवाद में हराकर" उनका रंग फीका किया था) के बाद लंबे समय तक जाना जाता है, अफगानिस्तान में मुस्लिम आक्रमण से कुछ समय पहले (पहले गांधार)। परंपरा के अनुसार, उन्होंने रूढ़िवादी हिंदू परंपराओं और विधर्मी गैर-हिंदू-परंपराओं दोनों से अन्य विचारकों के साथ प्रवचन और तात्विक तर्क-वितर्क के माध्यम से अपने दर्शन का प्रचार करने के लिए भारतीय उपमहाद्वीप में यात्रा की। यद्यपि अद्वैत के आज के अनुयायी मानते हैं कि शंकर ने व्यक्तिगत रूप से बौद्धों के खिलाफ तर्क दिया, एक ऐतिहासिक स्रोत, माधवीय शंकर विजयम, इंगित करता है कि शंकर ने मीमांसा, सांख्य, न्याय, वैशेषिक और योग विद्वानों के साथ बहस की उतनी ही उत्सुकता से मांग की जितनी कि किसी भी बौद्ध के साथ।
विन्सेंट स्मिथ सहित कई विद्वानों का भी तर्क है कि भारत में बौद्ध धर्म के पतन में आदि शंकराचार्य की कुछ प्रमुख भूमिका रही होगी।rajnish manu https://books.google.com/books?id=y_z_8ImnviEC&newbks=0&printsec=frontcover&pg=PT60&dq=Adi+Shankara+Buddhism+decline&hl=en STATE OF MIND manu rajnish 978-93-5087-127-0 enPh.D M. Jankiraman https://books.google.com/books?id=36AGEAAAQBAJ&newbks=0&printsec=frontcover&pg=PT139&dq=Adi+Shankaracharya+single-handedly+defeated+Buddhism+in+India&hl=en Perspectives in Indian History: From the Origins to AD 1857 2020-11-03 Notion Press 978-1-64983-995-4 en
आदि शंकराचार्य के आने से भारतीय उपमहाद्वीप पर बौद्ध धर्म का प्रभाव कम हो गया। इसके साथ ही एक बार फिर वैदिक धर्म का पुनः पुनरुद्धार होना शुरू हुआ।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रभाव
शङ्कराचार्य ने अपने वेदान्त को सुप्रतिष्ठित करने के लिए निम्नांकित कार्य सम्पादित किए-
(१) उन्होंने स्पष्ट किया कि वैशेषिक, न्याय तथा सांख्य वैदिक दर्शन नहीं है यद्यपि यह वेद में आस्था रखते हैं। सांख्य के ईश्वरवादी तथा स्वयं को वेदाधारित होने के दावे को आचार्य बादरायण ने अपने ब्रह्मसूत्र में तथा शङ्कराचार्य ने अपने भाष्य में किया। शङ्कराचार्य ने सांख्य को वेदान्त का ‘प्रधानमल्ल’ अर्थात् मुख्य प्रतिद्वन्दी बताया।
(२) आचार्य ने पूर्वमीमांसाकृत वेद की कर्मपरक व्याख्या का खण्डन किया। पूर्वमीमांसा के अनुसार वेद के वह भाग जो स्पष्ट रूप से कर्मपरक नहीं है वह परोक्ष रूप से कर्म के अप्र बनकर ही सार्थक होते हैं। शङ्कराचार्य ने यह सिद्ध किया कि वेद का मुख्य लक्ष्य परमतत्त्व को प्रकाशित करना है अतः वेद के ज्ञानपूर्ण मन्त्रभाग और उपनिषद् भाग मुख्य हैं। वेद के उपासना और कर्मपरक भाग गौण हैं क्योंकि इनका उद्देश्य चित्त की शुद्धि करना है।
(३) इन्होंने उपनिषद् के प्राचीन व्याख्याकार जैसे भर्तृप्रपञ्च आदि के ब्रह्मपरिणामवाद अथवा भेदाभेदवाद मत का खण्डन किया। उसके स्थान पर आचार्य ने अद्वैतवाद का प्रतिपादन किया।
(४) इन्होंने सिद्ध किया कि निर्विशेष या निर्गुण ब्रह्म ‘शून्य’ नहीं है। ‘नेति-नेति’ ब्रह्म विषयक निर्वचनों का निषेध करता है, स्वयं ब्रह्म का नहीं। निर्विशेष ब्रह्मवाद निरपेक्ष अद्वैतवाद है।
(५) आचार्य ने बौद्धों के विज्ञानवाद का मार्मिक खण्डन किया तथा अपने नित्य औपनिषद् आत्मचैतन्यवाद को उससे पृथक् सिद्ध किया।
(६) उन्होंने सिद्ध किया कि माया या अविद्या ब्रह्म की अनिर्वचनीय शक्ति के रूप में उपनिषद् सिद्धान्त है। उपनिषद् में तात्विक भेद, द्वैत, परिणाम आदि का कोई स्थान नहीं है।
रचनाएँ
अष्टोत्तरसहस्रनामावलिः
उपदेशसहस्री
चर्पटपंजरिकास्तोत्रम्
तत्त्वविवेकाख्यम्
दत्तात्रेयस्तोत्रम्
द्वादशपंजरिकास्तोत्रम्
पंचदशी
कूटस्थदीप
चित्रदीप
तत्त्वविवेक
तृप्तिदीप
द्वैतविवेक
ध्यानदीप
नाटक दीप
पंचकोशविवेक
पंचमहाभूतविवेक
पंचकोशविवेक
ब्रह्मानन्दे अद्वैतानन्द
ब्रह्मानन्दे आत्मानन्द
ब्रह्मानन्दे योगानन्द
महावाक्यविवेक
विद्यानन्द
विषयानन्द
परापूजास्तोत्रम्
प्रपंचसार भवान्यष्टकम्
लघुवाक्यवृत्ती
विवेकचूडामणि
सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह
साधनपंचकम
भाष्य
अध्यात्म पटल भाष्य
ईशोपनिषद भाष्य
ऐतरोपनिषद भाष्य
कठोपनिषद भाष्य
केनोपनिषद भाष्य
छांदोग्योपनिषद भाष्य
तैत्तिरीयोपनिषद भाष्य
नृसिंह पूर्वतपन्युपनिषद भाष्य
प्रश्नोपनिषद भाष्य
बृहदारण्यकोपनिषद भाष्य
ब्रह्मसूत्र भाष्य
भगवद्गीता भाष्य
ललिता त्रिशती भाष्य
हस्तामलकीय भाष्य
मंडूकोपनिषद कारिका भाष्य
मुंडकोपनिषद भाष्य
विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र भाष्य
सनत्सुजातीय भाष्य
लघु तत्त्वज्ञानविषयक रचनाएँ
अद्वैत अनुभूति (८४)
अद्वैत पंचकम् (५)
अनात्मा श्रीविगर्हण (१८)
अपरोक्षानुभूति (१४४)
उपदेश पंचकम् किंवा साधन पंचकम् (५)
एकश्लोकी (१)
कौपीनपंचकम् (५)
जीवनमुक्त आनंदलहरी (१७)
तत्त्वोपदेश(८७)
धन्याष्टकम् (८)
निर्वाण मंजरी (१२)
निर्वाणशतकम् (६)
पंचीकरणम् (गद्य)
प्रबोध सुधाकर (२५७)
प्रश्नोत्तर रत्नमालिका (६७)
प्रौढ अनुभूति (१७)
यति पंचकम् (५)
योग तरावली(?) (२९)
वाक्यवृत्ति (५३)
शतश्लोकी (१००)
सदाचार अनुसंधानम् (५५)
साधन पंचकम् किंवा उपदेश पंचकम् (५)
स्वरूपानुसंधान अष्टकम् (९)
स्वात्म निरूपणम् (१५३)
स्वात्मप्रकाशिका (६८) गणेश स्तुति
गणेश पंचरत्नम् (५)
गणेश भुजांगम् (९)
शिवस्तुति
दशश्लोकी स्तुति (१०)
दक्षिणमूर्ति अष्टकम् (१०)
दक्षिणमूर्ति स्तोत्रम् (१९)
दक्षिणमूर्ति वर्णमाला स्तोत्रम् (१३)
मृत्युंजय मानसिक पूजा (४६)
वेदसार शिव स्तोत्रम् (११)
शिव अपराधक्षमापन स्तोत्रम् (१७)
शिव आनंदलहरी (१००)
शिव केशादिपादान्तवर्णन स्तोत्रम् (२९)
शिव नामावलि अष्टकम् (९)
शिव पंचाक्षर स्तोत्रम् (६)
शिव पंचाक्षरा नक्षत्रमालास्तोत्रम् (२८)
शिव पादादिकेशान्तवर्णनस्तोत्रम् (४१)
शिव भुजांगम् (४)
शिव मानस पूजा(५)
सुवर्णमाला स्तुति (५०)शक्तिस्तुति
अन्नपूर्णा अष्टकम् (८)
आनंदलहरी
कनकधारा स्तोत्रम् (१८)
कल्याण वृष्टिस्तव (१६)
गौरी दशकम् (११)
त्रिपुरसुंदरी अष्टकम् (८)
त्रिपुरसुंदरी मानस पूजा (१२७)
त्रिपुरसुंदरी वेद पाद स्तोत्रम् (१०)
देवी चतु:षष्ठी उपचार पूजा स्तोत्रम् (७२)
देवी भुजांगम् (२८)
नवरत्न मालिका (१०)
देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्
भवानी भुजांगम् (१७)
भ्रमरांबा अष्टकम् (९)
मंत्रमातृका पुष्पमालास्तव (१७)
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम्
ललिता पंचरत्नम् (६)
शारदा भुजंगप्रयात स्तोत्रम् (८)
सौन्दर्यलहरी (१००)
नर्मदाष्टक
विष्णु एवं उनके अवतारों की स्तुति
अच्युताष्टकम् (९)
कृष्णाष्टकम् (८)
गोविंदाष्टकम् (९) जगन्नाथाष्टकम् (८)
पांडुरंगाष्टकम् (९)
भगवन् मानस पूजा (१०)
मोहमुद्गार (भजगोविंदम्) (३१)
राम भुजंगप्रयात स्तोत्रम् (२९)
लक्ष्मीनृसिंह करावलंब (करुणरस) स्तोत्रम् (१७)
लक्ष्मीनरसिंह पंचरत्नम् (५)
विष्णुपादादिकेशान्त स्तोत्रम् (५२)
विष्णु भुजंगप्रयात स्तोत्रम् (१४)
षट्पदीस्तोत्रम् (७)
अन्य देवताओं एवं तीर्थों की स्तुति
अर्धनारीश्वरस्तोत्रम् (९)
उमा महेश्वर स्तोत्रम् (१३)
काशी पंचकम् (५)
गंगाष्टकम् (९)
गुरु अष्टकम् (१०)
नर्मदाष्टकम् (९)
निर्गुण मानस पूजा (३३)
मनकर्णिका अष्टकम् (९)
यमुनाष्टकम् (८)
यमुनाष्टकम्-२ (९)
इन्हें भी देखें
अद्वैतवाद
कुमारिल भट्ट
मण्डन मिश्र
पद्मपादाचार्य
शंकराचार्य
मठाम्नाय महानुशासन (आद्य शंकराचार्य द्वारा रचित ग्रन्थ जिसमें मठों के संचालन का विधान है।)
सन्दर्भ
बाहरी कड़ियाँ
श्री शंकर विरचित ब्रह्मसूत्रभाष्य
श्रीमच्छङ्करभगवत्पूज्यपादविरचितम् ब्रह्मसूत्रभाष्यम् https://web.archive.org/web/20260704163245/https://advaitasharada.sringeri.net/display/bhashyaVyakhya/BS%3Fvyakhya%3DNY 4 जुलाई 2026
शंकराचार्य के चार मठ
आदि शंकराचार्य का संपूर्ण रचना संसार
Complete Works of Sri Sankaracharya संस्कृत में - 20 Volumes
Upanishad Sankara Bhashya with Hindi Translation - Gita Press 1938/mode/2up ऐतरोयोपनिषद, हिन्दी अनुवाद सहित
श्रेणी:शंकराचार्य
श्रेणी:हिन्दू आचार्य
श्रेणी:दार्शनिक
श्रेणी:हिन्दू सुधारक
श्रेणी:साधु
श्रेणी:नौवीं शताब्दी के लोग
श्रेणी:केरल का इतिहास
श्रेणी:संस्कृत लेखक
श्रेणी:अद्वैत वेदांत
श्रेणी:हिन्दू गुरु