Skip to main content

  | मौसम…

411 समाचार
Public archive edition · Attributed source reporting with original dates · AI drafts are excluded

411 REFERENCE · Wikipedia

सनातन गोस्वामी

Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.

सनातन गोस्वामी (सन् 1488 - 1558 ई), चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शिष्य थे। उन्होने गौड़ीय वैष्णव भक्ति सम्प्रदाय की अनेकों ग्रन्थों की रचना की। अपने भाई रूप गोस्वामी सहित वृन्दावन के छ: प्रभावशाली गोस्वामियों में वे सबसे ज्येष्ठ थे।श्री चैतन्य चरितामृतम, आदि-लीला, १०.८४, मध्य-लीला १.३५ अध्याय २०-२४ एवं अंत्य-लीला अध्याय-४ जीवनी सनातन गोस्वामी कर्णाट श्रेणीय पंचद्रविड़ भारद्वाज गोत्रीय यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। इनके पूर्वज कर्णाट राजवंश के थे और सर्वज्ञ के पुत्र रूपेश्वर बंगाल में आकर गंगातटस्थ बारीसाल में बस गए। इनके पौत्र मुकुंददेव बंगाल के नवाब के दरबार में राजकर्मचारी नियत हुए तथा गौड़ के पास रामकेलि ग्राम में रहने लगे। इनके पुत्र कुमारदेव तीन पुत्रों अमरदेव, संतोषदेव तथा वल्लभ को छोड़कर युवावस्था ही में परलोक सिधार गए जिससे मुकुंददेव ने तीनों पौत्रों का पालन कर उन्हें उचित शिक्षा दिलाई। इन्हीं तीनों को श्री चैतन्य महाप्रभु ने क्रमश: सनातन, रूप तथा अनुपम नाम दिया। सनातन का जन्म सं. 1523 के लगभग हुआ था तथा संस्कृत के साथ फारसी अरबी की भी अच्छी शिक्षा पाई थी। सन् 1483 ई. में पितामह की मृत्यु पर अठारह वर्ष की अवस्था में यह उन्हीं के पद पर नियत किए गए और बड़ी योग्यता से कार्य सँभाल लिया। हुसेन शाह के समय में यह प्रधान मंत्री हो गए तथा इन्हें दरबारे खास उपाधि मिली। राजकार्य करते हुए भी तीनों भाई परम भक्त, विरक्त तथा सत्संग प्रेमी थे। इन्होंने "कानाई नाट्यशाला" बनवाई थी, जिसमें कृष्णलीला सबंधी बहुत सी मूर्तियों का संग्रह था। श्री चैतन्य महाप्रभु का जब प्रकाश हुआ तब यह भी उनके दर्शन के लिए उतावले हुए, पर राजकार्य से छुट्टी नहीं मिली। इसलिए उन्हें पत्र लिखकर रामकेलि ग्राम में आने का आग्रह किया। श्री चैतन्य जब वृंदावन जाते समय रामकेलि ग्राम में आए तब इन तीनों भाइयों ने उनके दर्शन किए और सभी ने सांसारिक जंजाल से मुक्ति पाने का दृढ़ संकल्प किया। सभी राजपद पर थे। पर सनातन इनमें सबसे बड़े और मंत्रीपद पर थे अत: पहले श्री रूप तथा अनुपम सारे कुटुंब को स्वजन्मस्थान फतेहाबाद वाकला में सुरक्षित रख आए और रामकेलि ग्राम में सनतान जी के लिए कुसमय में काम आने को कुछ धन एक विश्वसनीय पुरुष के पास रखकर वृंदावन की ओर चले गए। जब सनातन जी ने राजकार्य से हटने का प्रयत्न किया तब नवाब ने इन्हें कारागार में बंद करा दिया। अंत में घूस देकर यह बंदीगृह से भागे और काशी पहुँच गए। स. 1572 में यहीं श्रीगौरांग से भेंट हुई और दो मास तक वैष्णव भक्ति शास्त्र पर उपदेश देकर इन्हें वृंदावन भेज दिया कि वहाँ के लुप्त तीर्थों का उद्धार, भक्तिशास्त्र की रचना तथा प्रेमभक्ति एवं संकीर्तन का प्रचार करें। यह वृंदावन चले गए पर कुछ दिनों बाद श्री गौरांग के दर्शन की प्रबल इच्छा से जगदीशपुरी की यात्रा की। वहाँ कुछ दिन रहकर यह पुनः वृंदावन लौट आए और आदित्यटीला पर अंत तक यहीं रहें। मधुकरी माँगने यह नित्य मथुरा जाते थे और वहीं उन्होंने श्री अद्वैताचार्य द्वारा प्रकटित श्री मदनगोपाल जी के विग्रह का दर्शन किया। यह उस मूर्ति को वृंदावन लाए और आदित्यटीला पर प्रतिष्ठापित कर सेवा करने लगे। कुछ दिनों बाद एक मंदिर बन गया और सं. 1591 से सेवा की व्यवस्था ठीक रूप से चलने लगी। इसी प्रकार अनेक विग्रहों को खोजकर उनकी सेवा का प्रबंध किया, अनेक लुप्त तीर्थों का उद्धार किया तथा कई ग्रंथ लिख। यह श्रीगौरांग के प्रमुख शिष्यों तथा पार्षदों में थे। रचनाएँ इनकी रचनाएँ हैं - श्री बृहत् भागवतामृत, वैष्णवतोषिणी तथा श्रीकृष्णलीलास्तव। हरिभक्तिविलास तथा भक्तिरसामृतसिंधु की रचना में भी इनका सहयोग था। सन्दर्भ इन्हें भी देखें रूप गोस्वामी षड्गोस्वामी बाहरी कड़ियाँ गोस्वामी राधाकुण्ड.कॉम पर श्री सनातन गोस्वामी (इस्कॉन.कॉम) द गोवर्धन शिला ऑफ सनातन गोस्वामी राधादामोदरमंदिर.कॉम) श्रेणी:चैतन्य महाप्रभु श्रेणी:हिन्दू धर्म