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दण्डी (दण्डधारी संयासी)
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संस्कृत के महान रचनाकार दण्डी के लिये उस पृष्ठ पर जाँय।
thumb|250px|मनुस्मृति का चित्र।
दंडी - दंड धारण करनेवाले सन्यासी का रूढ़ार्थ।
मनुस्मृति (षष्ठ, 58) जैसे धर्मशस्त्र ग्रंथों में दंडियों के लक्षण तथा उनकी तपश्चर्या के नियम दिए गए हैं। यों तो अपनी अंतिम अवस्थाओं में वर्णाश्रम धर्मानुसार सभी द्विजों को तीन आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य और वानप्रस्थ) में रह चुकने के बाद संन्यस्त होने का विधान और अधिकार था, किंतु दंडी संन्यासी केवल ब्राह्मण ही हो सकता था। उसे भी माता पिता और पत्नी के न रहने पर ही दंडी होने की अनुमति थी। वास्तविक संन्यास संसार के सभी बंधनों और संबंधों को तोड़ देने से ही संभव था और दंडी संन्यासी उसका प्रतीक होता था। संन्यास का लक्ष्य था मोक्ष औ
र आध्यात्मिक मोक्ष की प्राप्ति के लिये सांसारिक मोक्ष अत्यावश्यक था। यही कारण था कि दंडी के लिये अत्यंत कठोर लक्षण निश्चित किए गए और कठिन तापस जीवन ही उसका मार्ग माना गया, यथा -- निरामिष भोजन, निरपेक्षता, अक्रोध, अध्यात्मरति, आत्मापरकता, गृहत्याग, सिद्धार्थत्व, असहायत्व, अनग्नित्व, परिब्राजकत्व, मुनिभावत्व, मृत्यु से भयहीनता, दु:ख सुख में समान भाव, बस्तियों में केवल भिक्षा के लिये जाना, सांसारिक मामलों से दूर रहना इत्यादि। उसके दैनिक जीवन के भी क्रम होते थे। महाभारत (तेरहवाँ 14-374) के अनुसार दंडी के ऊपरी लक्षण थे -- दंड धारण करना, सिर के बालों को घुटाए रहना (मुंडी), कुशासन का प्रयोग, चीरवसन और मेखलाधारण। इस प्रकार नियमों को पालन करते हुए 12 वर्ष बीत जाने पर दंडी अपना दंड फेंककर परमहंस हो जाता था। चूँकि दंडी संन्यासी ब्राह्मणवर्ण से आते थे, वे प्राय: योग्य विद्वान् होते थे और यदा कदा लोग उनसे पढ़ने भी जाया करते थे। कालांतर में दंडी संन्यासियों का एक संप्रदाय ही हो गया जो प्राय: भगवान आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित "मठाम्नाय महानुशाषनम्" अनुसार पद प्रतिष्ठित अधिकृत शंकराचार्यों द्वारा निर्देशित होने लगा। अद्वैत सिद्धान्त से निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना प्रतिपादित हुयी । भारत के पवित्र माने जानेवाले तीर्थों और नगरों, जैसे द्वारिकापुरी जगन्नाथ पुरी और काशी इत्यादि में आज भी अनेक दंडी आरमों, मुमुक्षु भवनों में अथवा पाठशालाओं और घाटों पर देखे जा सकते हैं।
श्रेणी:हिन्दू धर्म