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411 समाचार
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411 REFERENCE · Wikipedia

कृष्ण चन्द्र पाणिग्रही

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कृष्णचन्द्र पाणिग्रही yes 1909 12 01 खिचिंग, मयूरभंज, उड़ीसा 1987 1909 पुरातत्त्वविद भारतीय एम ए (प्राचीन इतिहास, संस्कृत) उत्कल विश्वविद्यालयकोलकाता विश्वविद्यालय 4 पद्मश्री कृष्णचन्द्र पाणिग्रही (1 दिसम्बर 1909 – 25 फरवरी 1987),Kar Bauribandhu Dr. Krishna Chandra Panigrahi : A Master of Modern Odia Prose http://orissa.gov.in/e-magazine/Orissareview/2012/April/engpdf/63-69.pdf Govt. of Odisha 29 April 2014 भारत के एक प्रसिद्ध इतिहासकार, पुरातत्त्वविद एवं उड़िया साहित्यकार थे। आरम्भिक जीवन एवं शिक्षा कृष्णचन्द्र पाणिग्रही का जन्म उड़ीसा के मयूरभंज जिले के खिचिंग में हुआ था। खिचिंग, भंज राजवंश की राजधानी थी। उअन्के पिता सागर पाणिग्रही स्थानीय खिचकेश्वरी मन्दिर के पुजारी थे। उन्होंने १९३७ में रावेनशा महाविद्यालय से इतिहास में बी ए किया। इसके बाद कोलकाता विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति में एम ए किया। इसी विश्वविद्यालय से उन्होंने १९५४ में पीएच-डी किया जिसका विषय था, "भुवनेश्वर के पुरातात्विक अवशेष"। व्यावसायिक जीवन १९३७ से १९४४ तक कृष्णचन्द्र भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण में शोधछात्र थे जहाँ वे मृद्भाण्ड (pottery) पर विशेषज्ञता प्राप्त कर रहे थे। इसके बाद वे उड़ीसा के शिक्षा विभाग में इतिहास के व्याख्याता के रूप में भर्ती हुए। वहाँ वे १९४७ तक रहे। इसके बाद वे पुनः उड़ीसा संग्रहालय के के क्युरेटर हुए जहाँ वे १९४७ से १९५१ तक रहे। इसके बाद वे पुनः शिक्षण में आ गये। एक बाद फिर वे सहायक सुपरिटेन्डेन्ट बनकर भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण में आ गये। अन्त में वे इतिहास के प्राध्यापक पद से सेवानिवृत्त हुए । ओड़िया साहित्य में अपने उल्लेखनीय योगदान के लिये उन्हें ओड़ीसा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। तत्पश्चात् साहित्य और शिक्षा में योगदान के लिये उन्हे भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया।Padma Shri Awardees http://archive.india.gov.in/myindia/padmashri_awards_list1.php?start=1570 India.gov.in 22 August 2015 7 जनवरी 2016 https://web.archive.org/web/20160107015941/http://archive.india.gov.in/myindia/padmashri_awards_list1.php?start=1570 dead अपनी आत्मकथा "मो समय र ओड़ीसा" (मेरे समय का ओड़ीसा) के लिये उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन १९८७ में ७८ वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनके दो पुत्र और दो पुत्रियाँ हैं। कृतियाँ उन्होंने इतिहास और पुरातत्त्व पर अनेक ग्रन्थों की रचना की, जिनमें से प्रमुख ये हैं- भारत प्रत्नतत्त्व (अनुवाद, 1960 में) Archaeological Remains at Bhubaneswar, Orient Longmans, 1961Panigrahi K.C. Archaeological Remains at Bhubaneswar 1961 Orient Longmans https://books.google.com/books?id=eJvpAAAAMAAJ 22 August 2015 Archaeology of Orissa, 1961 इतिहास ओ किंबदन्ति (इतिहास और किम्वदन्ति), (1964 में) प्रबन्ध मानस (1972 में) ओड़िशार इतिहास ओ संस्कृतिरे याजपुर , 1973 सारळा साहित्यर ऐतिहासिक चित्र (सारला साहित्य का ऐतिहासिक चित्र ; 1976) History of Orissa, 1981 मो समय र ओड़ीशा (आत्मकथा ; १९७७ में) Chronology of Bhauma-Karas and Somavamsis of Orissa, 1961 Sarala Dasa, सम्मान एवं पुरस्कार पद्मश्री, १९७६ ओड़िशा साहित्य अकादमी पुरस्कार, १९७९[७] ('मो समयर ओड़िशा' पर) ओड़िशा साहित्य अकादमी सम्बर्द्धना, १९७५[८] सारळा सम्मान, १९८३ प्रजातन्त्र प्रचार समिति बिषुब मिळन पुरस्कार, १९७२[९] सन्दर्भ बाहरी कड़ियाँ http://www.123orissa.com/person/person.asp?sno=22&cat=a https://web.archive.org/web/20160303173441/http://www.123orissa.com/person/person.asp?sno=22&cat=a 3 मार्च 2016 श्रेणी:ओड़ीशा के वैज्ञानिक श्रेणी:२०वीं शताब्दी के भारतीय पुरातत्त्वविद श्रेणी:२०वीं शताब्दी के भारतीय इतिहासकार श्रेणी:ओड़िया साहित्यकार श्रेणी:पद्मश्री से सम्मानित