411 REFERENCE · Wikipedia
हिन्दी शब्दानुशासन
Reference material by Wikipedia contributors. This retains its source identity and is not 411 news reporting.
हिन्दी शब्दानुशासन आचार्य किशोरीदास वाजपेयी द्वारा लिखित हिन्दी-व्याकरण का ग्रन्थ है। इस अप्रतिम वैयाकरण के लिए विद्वान व प्रशंसक कभी उन्हें ‘हिंदी का प्रथम वैज्ञानिक’ कहते हैं और कभी ‘हिंदी का पाणिनि'। यह ग्रन्थ राहुल सांकृत्यायन की प्रेरणा से लिखा गया था। हिंदी को व्याकरणसम्मत, व्यवस्थित, स्थिर, मानकीकृत, परिष्कृत और भविष्य की चुनौतियों से निपटने लायक बनाने में जैसी भूमिका ‘हिन्दी शब्दानुशासन’ ने निभाई है, किसी भी अन्य वैयाकरण की कृति ने नहीं निभायी।
इस ग्रंथ का प्रथम संस्करण 1958 में नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी द्वारा प्रकाशित किया गया था। इस पुस्तक की भूमिका में किशोरीदास जी कहते हैं.. .
..राहुल जी का वह महत्वपूर्ण लेख निकला जो अभूतपूर्व था । एक ही लेख ने पर्दा हटा दिया । हिन्दी शब्दानुशासन बनाने बनवाने की भूमिका तैयार की राहुल जी ने और फिर उसे ऊँचे उठने बढ़ने में मदद की डा० राम विलास शर्मा ने । (नागरी प्रचारिणी) सभा तो पोषणकर्त्री (धात्री) है ही..
संस्कृत के आचार्य होने के बावजूद उन्होंने हिंदी को स्वतंत्र भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कुछ भी कसर उठा नहीं रखा, न वैयाकरण के रूप में और न ही आलोचक, लेखक, कवि या साहित्यकार के रूप में। यह उद्घोषणा करने वाले वे पहले वैयाकरण थे कि हिंदी संस्कृत से अनुप्राणित अवश्य है, किंतु उससे अलग अपनी ‘सार्वभौम सत्ता’ रखती है और अपने नियमों से चलती है। कई लोगों ने इसे उनके द्वारा की गयी संस्कृत की अवज्ञा के रूप में देखा, तो भी उन्होंने कोई परवाह नहीं की. हिंदी को ‘अंग्रेजी की चेरी’ भी उन्होंने कभी नहीं माना, ब्रिटिश साम्राज्यवाद की छाया में पनप रहे उसके भाषाई साम्राज्य के बावजूद। उनके इस न मानने के महत्व को इस तथ्य की रौशनी में समझा जा सकता है कि कई मायनों में वह अंग्रेजी के ‘आतंक’ का दौर था और किसी न किसी मोड़ पर उस आतंक को हर किसी को स्वीकार करना पड़ता था। लेकिन संस्कृत व अंग्रेजी दोनों की ‘समृद्धि’ से निरपेक्ष रहते हुए वे हिंदी, उसके व्याकरण, साहित्य व संस्कृति के उन्नयन और भारत माता को स्वाधीन कराने की साधना भी करते रहे। गोरी सत्ता की ओर से उन्हें इसके ‘पुरस्कार’ नौकरी गंवाने और जेल जाने के रूप में मिलने लगे, तो भी अपने पथ से विचलित नहीं हुए।
संरचना
इस ग्रंथ में कुल तीन भाग हैं- पूर्व-पीठिका, पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध। इसके अतिरिक्त एक परिशिष्ट भाग है जिसमें हिन्दी की बोलियों और उनमें एकसूत्रता पर चर्चा की गयी है। इसके अलावा परिशिष्ट में पंजाबी भाषा एवं व्याकरण तथा भाषाविज्ञान पर विद्वत्तापूर्ण मौलिक विश्लेषण देखने को मिलते हैं। आचार्यजी इस ग्रंथ के तीसरे संस्करण में सर्वनाम और तद्धित प्रकरणों को फिर से लिखना चाहते थे। पर उनके स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया और इसका यथावत पुनर्मुद्रण हुआ। तीसरे संस्करण के निवेदन में वे लिखते हैं-
............ मेरी इच्छा थी कि सर्वनाम और तद्धित प्रकरण फिर से लिखे जाएँ। सभा को सूचित भी कर दिया था कि ये प्रकरण फिर से लिखकर भेजूँगा। परन्तु फिर हिम्मत न पड़ी। दिमाग एक विचित्र थकान का अनुभव करता है। इस पर अब जोर देना ठीक नहीं। डर है कि वैसा करने से अपने मित्र कविवर नवीन, महाकवि निराला, महापंडित राहुल सांकृत्यायन तथा कविवर अनूप की ही तरह इस उतरती उम्र में पागल न हो जाऊँ। .................
हिन्दी शब्दानुशासन की पूर्व-पीठिका में हिन्दी की उत्पत्ति, विकास-पद्धति, प्रकृति और इसके विकास आदि के अतिरिक्त नागरी लिपि, खड़ी बोली का परिष्कार आदि पर बड़े वैज्ञानिक ढंग से विचार किया गया है। अपनी बात आचार्यजी इतने तार्किक ढंग से कहते हैं कि भाषा सम्बन्धी प्रश्नों को विश्राम मिल जाता है। इस भाग का अन्त उन्होंने हिन्दी के विकास की सारिणी देकर किया है।आचार्य किशोरी दास वाजपेय़ी कृत “हिन्दी शब्दानुशासन”
इसके पूर्वार्द्ध भाग में कुल सात अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में वर्णों पर विचार किया गया है, दूसरे में शब्द, पद, हिन्दी की विभक्तियों के प्रत्यय आदि पर, तीसरे में संज्ञा, सर्वनाम, लिंग-भेद, लिंग-व्यवस्था आदि का विश्लेषण है। चौथे अध्याय में अव्यय, उपसर्ग और परसर्ग पर विचार किया गया है। पाँचवे अध्याय में यौगिक शब्दों की प्रक्रियाओं, कृदन्त और तद्धित शब्दों एवं समास आदि पर विचार किया गया है। छठें अध्याय में क्रिय-विशेषण और सातवें अध्याय में वाक्य संरचना, वाक्य-भेद, पदों की पुनरुक्ति, विशेषणों का प्रयोग, भाववाचक संज्ञाओं और विशेषण, अनेक कर्तृक या बहुकर्मक क्रियाओं आदि का विवेचन किया गया है।
उत्तरार्द्ध भाग में कुल पाँच अध्याय हैं। प्रथम अध्याय में क्रिया से जुड़े तत्त्वों का विवेचन किया गया है, यथा - क्रियापद, धातु, धातुओं की उत्पत्ति, उनके प्रयोग, क्रियाओं के पुरुष और वचन, धातु-प्रत्यय, तिङन्त और कृदन्त क्रियाएँ, वाच्य, काल, द्विकर्मक, पूर्वकालिक एवं क्रियार्थक क्रियाएँ, हिन्दी धातुओं का विकास-क्रम, धातु और नामधातु के भेद। द्वितीय अध्याय में उपधातुओं के भेद, प्रेरणार्थक या द्विकर्तृक क्रियाएँ और उनकी रचना त्रिकर्मक और अकर्तृक क्रियाएँ का विवेचन मिलता है। तीसरे अध्याय में संयुक्त क्रियाएँ, चौथे में नामधातु और पाँचवें अध्याय में क्रिया की द्विरुक्ति पर विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
परिशिष्ट भाग में हिन्दी की बोलियों और उनमें एकसूत्रता आदि पर विवेचन के साथ राजस्थानी, ब्रजभाषा, कन्नौजी या पाञ्चाली, अवधी, भोजपुरी (मगही) और मैथिली बोलियों (भाषाओं) के विभिन्न अवयवों पर विचार किया गया है। इसके अतिरिक्त पंजाबी भाषा एवं व्याकरण और भाषाविज्ञान पर विचार किया गया है।
इस ग्रंथ के बारे में डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी कहते हैं-
''अभी तक हिन्दी के जो व्याकरण लिखे गए, वे प्रयोग निर्देश तक ही सीमित हैं। 'हिन्दी शब्दानुशासन' में पहली बार व्याकरण के तत्त्वदर्शन का स्वरूप स्पष्ट हुआ है।
वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली ने आचार्य किशोरीदास के सभी ग्रंथों को "आचार्य किशोरीदास वाजपेयी ग्रंथावली" नाम से छः भागों में प्रकाशित किया है।
इन्हें भी देखें
शब्दानुशासन (हेमचन्द्राचार्य द्वारा रचित प्राकृत का व्याकरण-ग्रन्थ)
किशोरीदास वाजपेयी
कामताप्रसाद गुरु ('हिन्दी व्याकरण' नामक ग्रन्थ के रचयिता)
बाहरी कड़ियाँ
हिन्दी शब्दानुशासन
सन्दर्भ
श्रेणी:हिन्दी