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आचार्य राममूर्ति
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आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी और आचार्य राममूर्ति अलग-अलग व्यक्ति हैं; भ्रमित न हों।
आचार्य राममूर्ति (२२ जनवरी १९१३ - २० मई २०१०) गांधीवादी शिक्षाविद और समाजसेवी थे। वे जयप्रकाश नारायण के सहयोगी थे।http://api.ning.com/files/mQZW*QwuPBghOde4DbCSG*uah3F9rzRxdTOqmLLWXZEsme-TF8*SmGhnyd16e9gUONX8oYwjwE7coZV*1C1jvkRXPrmDIqT0/AcharyaRamamurti19132010.pdf महिला शान्तिसेना न्यूजलेटर २०१० 16 अगस्त 2014 https://web.archive.org/web/20140819090800/http://api.ning.com/files/mQZW*QwuPBghOde4DbCSG*uah3F9rzRxdTOqmLLWXZEsme-TF8*SmGhnyd16e9gUONX8oYwjwE7coZV*1C1jvkRXPrmDIqT0/AcharyaRamamurti19132010.pdf 19 अगस्त 2014 dead
आचार्य राममूर्ति की अगुवाई में 1990 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सुधार के लिए कमेटी का गठन किया गया था। आचार्य राममूर्ति समिति ने अपनी रिपोर्ट शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की सिफारिश की थी।
जीवनी
आचार्य राममूर्ति का जन्म २२ जनवरी १९१३ को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के अर्धपुर जिले में एक किसान परिवार में हुआ था।
1938 में लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए इतिहास में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद आचार्य राम मूर्ति ने बनारस के क्वींस कॉलेज में अध्यापन कार्य किया। 1954 में कॉलेज की नौकरी छोड़कर वे धीरेन्द्र मजूमदार के आह्वान पर श्रमभारती खादीग्राम जमुई, (मुंगेर, बिहार) पहुंचे, जहां उन्होंने सादा जीवन के अभ्यास के साथ एक नए जीवन की शुरुआत की। यहां उन्होंने गांधी जी की कल्पना की नई तालीम का अभ्यास और शिक्षण शुरू किया।
आचार्य राममूर्ति मूलतः एक शिक्षक थे। उनका सपना जननायक बनने का नहीं था, बल्कि वह चाहते थे कि समाज परिवर्तन के काम में लगने वाले ज़्यादा से ज़्यादा सिपाही तैयार हों। उन्होंने अपना सारा जीवन ऐसे लोगों को तैयार करने में लगा दिया। जहां भी ऐसे लोगों के मिलने की संभावना होती, आचार्य जी वहां पहुंचने की कोशिश करते। उनके कुछ मतभेद तो अपने सर्वोदय आंदोलन के साथियों से भी थे। जब जयप्रकाश नारायण ने बिहार में छात्र आंदोलन को अपना समर्थन दिया तथा बाद में संपूर्ण क्रांति का आंदोलन शुरू किया तो आचार्य जी ने सबसे पहले उसका केवल समर्थन ही नहीं किया, बल्कि पहले सिपाही की तरह उसमें कूद पड़े। उन्होंने संपूर्ण क्रांति के भाष्य का जिम्मा ख़ुद संभाल लिया।
आचार्य राममूर्ति की भाषा, विद्वान की भाषा नहीं थी, लेकिन विद्वान की भाषा से ज़्यादा तार्किक और ज़्यादा समझ में आने वाली भाषा थी। दिखने में सीधे-सादे, पहनने में ग्रामीण भारत की झलक देने वाले और समझाने में मार्क्स एंजेल का आभास देने वाले आचार्य राममूर्ति का जितना उपयोग होना चाहिए, उतना हो नहीं पाया। वी पी सिंह प्रधानमंत्री थे, उन्होंने आचार्य जी के सामने प्रस्ताव रखा कि वह राज्यपाल पद स्वीकार कर लें, पर आचार्य जी ने इसे अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वह शिक्षा पर कोई बुनियादी काम करना चाहते हैं। वी पी सिंह सरकार ने राममूर्ति कमीशन बनाया, जिसने शिक्षा में बुनियादी सुधार की स़िफारिशें कीं। यह पहला कमीशन था, जिसने लंबा समय नहीं लिया और डेढ़ साल के भीतर अपनी रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को सौंप दी। अफसोस कि वह रिपोर्ट किसी अलमारी में बंद पड़ी है।
आख़िरी दिनों में आचार्य जी बिल्कुल अकेले रह गए थे। शरीर साथ नहीं देता था, लेकिन उनका मस्तिष्क उनका सारथी था। उनका परिवार बहुत छोटा था, पर उसका सुख उन्हें नहीं मिला। उनके साथी कृष्ण कुमार जी और राम गुलाम जी उनके साथ आख़िरी समय तक रहे।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
राममूर्ति समिति
भूदान आन्दोलन
बाहरी कड़ियाँ
आचार्य राममूर्ति - कुछ यादें कुछ बातें
गरीबों के सच्चे हमदर्द थे आचार्य राममूर्ति
आचार्य राममूर्ति जीवित इतिहास हैं (चौथी दुनिया)
Acharya Ramamurti (जमनालाल बजाज प्रतिष्ठान)
श्रेणी:गांधीवादी
श्रेणी:शिक्षाविद