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भक्तिरसशास्त्र (वैष्णव)
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महाप्रभु चैतन्य (१४८६-१५३३ ई.) की प्रेरणा से वृंदावन के षट्गोस्वामियों में अन्यतम रूपगोस्वामी (१४७०-१५५४ ई.) ने वैष्णव संप्रदाय के धर्मदर्शन की छाया में भक्तिरसशास्त्र का प्रवर्तन किया। "भक्तिरसामृत सिंधु" तथा "उज्ज्वलनीलमणि", जिसमें कामशास्त्र की परंपराओं का रिक्थ है, वैष्णव रसशास्त्र के मौलिक और उपजीव्य ग्रंथ हैं।
परिचय
जयदेव और लीलाशुक (संस्कृत), विद्यापति और चंडीदास (बँगला) की कृष्णभक्तिपरक मधुर रचनाओं तथा कृष्णभक्तों की "स्वानुभवसिद्ध" भावना ने भक्ति को 'रसराज' मानने तथा उसके सांगोपांग विवेचन के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया था।
भक्तिरसामृतसिंधु में भक्ति तथा भक्तिरसों का विशद विवेचन करने के बाद शृंगार अथवा मधुर भक्तिरस का विशेष प्रतिपादन उज्ज्वलनीलमणि का प्रतिपाद्य है। इस मधुर रस का स्थायी भाव कृष्ण तथा गोपियों की पारस्परिक प्रियता (जो संभोग का आदिकारण है) मधुरा रति है। विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों से इस रति के आस्वाद का मधुर रस है, यह रस रहस्य है सभी भक्त इसके अधिकारी नहीं हैं किंतु सभी भक्तिरसों जैसे कि शांत प्रीति, वात्सल्य से यह श्रेष्ठ है। इसे भक्तिरसराज कहा गया है। भक्तिरसामृतसिंधु की पद्धति और आधार पर नाट्यशास्त्र के ग्रंथों में वर्णित भेद प्रभेद के ग्रहण, परिहाण, परिवर्धन के साथ चैतन्य संप्रदाय की सांस्कृतिक चेतना के नए संदर्भ में इन्हीं विभावादि तथा आनुषंगिक प्रसंग का विवेचन उज्ज्वलनीलमणि का विषय है। मधुरा रति के आलंबन विभाव नायकचूडामणि कृष्ण तथा हरिप्रियाएँ हैं। नायकभेद धीरोदत्त, धीरोद्धत, धीरललित, धीर प्रशांत के अतिरिक्त ब्रज में पूर्णतम, मथुरा में पूर्णतर, द्वारका में पूर्ण के रूप में नीतिभेद, दक्षिण, षट, धृष्टभेदी को मिलाकर नायक के ९६ भेद माने गए हैं। नायक के पाँच सहायक हैं। नायिका भेद मूलत: दो हैं। श्रृंगार का परमोत्कर्ष इसी में प्रतिष्ठित है। स्वकीया के साधनपरा, देवी नित्यप्रिया ये तीन भेद तथा अनेक उपभेद हैं। अभिसारिका, वासकसज्जा उत्कंठिता आदि आठ भेद हैं, इन सभी भेदोपभेदों को मिलाकर नायिकाभेद ३६० हैं, यों स्वकीया की ही संख्या १६१०८ है। दूती के स्वयंदूती तथा आप्तदूती दो भेद तथा अंतिम के तीन प्रधान उपभेद माने गए हैं। उद्दीपन विभाव कृष्ण तथा हरिप्रियाओं से संबंधित भेदोपभेद से अनेक प्रकार के हैं अनुभावों में बाईस अलंकार (भाव, हाव, हेला आदि) सात ईद्भास्वर सात वाचिक (आलाप, विलापादि) तथा सात्विक भाव वर्णित हैं। तैंतीस प्रख्यात व्यभिचारिभावों का (उग्रता तथा आलस्य को छोड़कर) भाव के उदयादि के भेद से वर्णन है। अंत में मधुरा रति के स्वरूप तथा पक्षों का तथा मधुर रस (संयोग विप्रलंभ) के भेदोपभेदों का वर्णन सर्वथा मौलिक है।
इन्हें भी देखें
भक्ति
भक्ति आन्दोलन
रसशास्त्र (आयुर्वेद के सन्दर्भ में)
श्रेणी:काव्य
श्रेणी:भक्ति