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विक्रम संवत
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चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य द्वारा प्रवर्तित विक्रम संवत् (संक्षेप में: वि॰सं॰) ही हमारा राष्ट्रीय संवत् कहलाता है। यह सर्वथा शुद्ध और वैज्ञानिक है। यह हमारी अस्मिता और स्वाधीनता के अनुरक्षण तथा शत्रुओं पर विजय का प्रतीक भी है। इसी संवत् के अनुसार ही हमारे सभी धार्मिक अनुष्ठान, तीज त्यौहार जैसे – होली, दीवाली, दशहरा आदि मनाए जाते है। विक्रम संवत् सभी काल गणना से प्राचीन तो है ही वैज्ञानिक भी है। और यहीं विक्रम संवत् की वैज्ञानिकता है।https://thesanatana.com/%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%ae-%e0%a4%b8%e0%a4%82%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%8d-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b5%e0%a5%88%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%bf/ विक्रम संवत् की प्रामाणिकता एवं सटीक गणना विज्ञान से भी आगे Bhanwar Singh Thada 2023-08-11 सनातन en-GB 2024-07-10 10 जुलाई 2024 https://web.archive.org/web/20240710165723/https://thesanatana.com/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A5%8D-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B5%E0%A5%88%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF/ dead विक्रम संवत् या विक्रमी भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित हिंदू पंचांग है। भारत में यह अनेकों राज्यों में प्रचलित पारम्परिक पञ्चाङ्ग है। नेपाल के सरकारी संवत् के रुप मे विक्रम संवत् ही चला आ रहा है। इसमें चान्द्र मास एवं सौर नाक्षत्र वर्ष का उपयोग किया जाता है। प्रायः माना जाता है कि विक्रमी संवत् के ५७ साल बाद ईस्वी सन् आरंभ हुआ था। ( ईस्वी सन् =विक्रमी संवत - ५७ )
इस संवत् का आरम्भ गुजरात में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से और उत्तरी भारत में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है। बारह महीने का एक वर्ष और सात दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत् से ही शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्य व चन्द्रमा की गति पर रखा जाता है। यह बारह राशियाँ बारह सौर मास हैं। पूर्णिमा के दिन, चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी आधार पर महीनों का नामकरण हुआ है। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से 11 दिन 3 घटी 48 पल छोटा है, इसीलिए प्रत्येक 3 वर्ष में इसमें 1 महीना जोड़ दिया जाता है (अधिमास, देखें)।
जिस दिन नव संवत् का आरम्भ होता है, उस दिन के वार के अनुसार वर्ष के राजा का निर्धारण होता है।
आरम्भिक शिलालेखों में ये वर्ष 'कृत' के नाम से आये हैं। 8वीं एवं 9वीं शती से विक्रम संवत् का नाम विशिष्ट रूप से मिलता है। संस्कृत के ज्योतिष ग्रन्थों में शक संवत् से भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए सामान्यतः केवल 'विक्रम संवत्' नाम का प्रयोग किया गया हैं ।
उद्भव
'विक्रम संवत' के उद्भव एवं प्रयोग के विषय में विद्वानों में मतभेद है। मान्यता है कि सम्राट विक्रमादित्य ने ईसा पूर्व ५७ में इसका प्रचलन आरम्भ कराया था।
फ़ारसी ग्रंथ 'कलितौ दिमनः' में पंचतंत्र का एक पद्य 'शशिदिवाकरयोर्ग्रहपीडनम्' का भाव उद्धृत है। विद्वानों ने सामान्यतः 'कृत संवत' को 'विक्रम संवत' का पूर्ववर्ती माना है। किन्तु 'कृत' शब्द के प्रयोग की सन्तोषजनक व्याख्या नहीं की जा सकी है। कुछ शिलालेखों में मालवगण का संवत उल्लिखित है, जैसे- नरवर्मा का मन्दसौर शिलालेख। 'कृत' एवं 'मालव' संवत एक ही कहे गए हैं, क्योंकि दोनों पूर्वी राजस्थान एवं पश्चिमी मालवा में प्रयोग में लाये गये हैं। कृत के २८२ एवं २९५ वर्ष तो मिलते हैं, किन्तु मालव संवत के इतने प्राचीन शिलालेख नहीं मिलते। यह भी सम्भव है कि कृत नाम पुराना है और जब मालवों ने उसे अपना लिया तो वह 'मालव-गणाम्नात' या 'मालव-गण-स्थिति' के नाम से पुकारा जाने लगा। किन्तु यह कहा जा सकता है कि यदि 'कृत' एवं 'मालव' दोनों बाद में आने वाले विक्रम संवत की ओर ही संकेत करते हैं, तो दोनों एक साथ ही लगभग एक सौ वर्षों तक प्रयोग में आते रहे, क्योंकि हमें ४८० कृत वर्ष एवं ४६१ मालव वर्ष प्राप्त होते हैं। इतिहास पक्ष कार
center|thumb|350px|'कलकाचार्य कथा' नामक पाण्डुलिपि में वर्णित जैन भिक्षु कलकाचार्य और राजा शक (छत्रपति शिवाजी महाराज वस्तु संग्रहालय, मुम्बई)
महीनों के नाम
महीनों के नाम पूर्णिमा के दिन नक्षत्र जिसमें चन्द्रमा होता है अवधिशुरुआत की तिथि (ग्रेगोरियन) चैत्र चित्रा, स्वाति३०/३१२२ मार्च से २१ अप्रैल वैशाख विशाखा, अनुराधा३०२२ अप्रैल से २२ मई ज्येष्ठ जेष्ठा, मूल३०२३ मई से २२ जून आषाढ़ पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, सतभिषा३०२३ जून से २३ जुलाई श्रावण श्रवण, धनिष्ठा३०२४ जुलाई से २३ अगस्त भाद्रपद पूर्वाभाद्रपद, उत्तरभाद्रपद३०२४ अगस्त से २३ सितंबर आश्विन अश्विनी, रेवती, भरणी३१सितंबर से अक्टूबर कार्तिक कृत्तिका, रोहिणी३१अक्टूबर से ५ नवंबर मार्गशीर्ष मृगशिरा, आर्द्रा ३१६ नवंबर से ४ दिसंबर पौष पुनर्वसु, पुष्य३१५ दिसंबर से जनवरी माघ मघा, आश्लेशा३१जनवरी से फरवरी फाल्गुन पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त ३१फरवरी से मार्च
प्रत्येक माह में दो पक्ष होते हैं, जिसे कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष कहते हैं।
नववर्ष
29 मार्च 2025 (दिन शनिवार) को विक्रम संवत 2081 का अंतिम दिन है, और 30 मार्च 2025 (दिन रविवार) से हिन्दू नववर्ष यानि नव संवत्सर 2082 शुरू हो रहा है।
अन्य मञ्जुश्री संवत्, बुद्ध काल से पहले प्रचलित संवत् जिसे प्राय तामाङ जाति के लोग मानते है
प्राचीन सप्तर्षि संवत ६६१९ विक्रम संवत ॰पू॰
कलियुग संवत् ३०४५ विक्रम संवत ॰पू॰
वीर निर्वाण संवत ४७० विक्रम संवत ॰पू॰
कल्चुरी संवत १९१विक्रम संवत ॰पू॰
लोधी संवत १०३ विक्रम संवत ॰पू॰
शक संवत २१ विक्रम संवत ॰पू॰
गुप्त संवत २६३ विक्रम संवत ॰पू
इन्हें भी देखें
मालवगण
भारतीय काल गणना
पञ्चाङ्ग
ज्योतिष
खगोलिकी
चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य
सन्दर्भ
श्रेणी:भारतीय कालगणना