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रामदुलारे त्रिवेदी
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रामदुलारे त्रिवेदी (जन्म: 1902, मृत्यु: 1975) संयुक्त राज्य आगरा व अवध (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे। उन्होंने असहयोग आन्दोलन में भाग लिया था जिसके कारण उन्हें छ: महीने के कठोर कारावास की सज़ा काटनी पड़ी। जेल से छूटकर आये तो राम प्रसाद 'बिस्मिल' द्वारा गठित हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गये। वे एक सच्चे स्वतन्त्रता सेनानी थे। उन्हें काकोरी काण्ड में केवल पाँच वर्ष के सश्रम कारावास का दण्ड मिला था। स्वतन्त्र भारत में उनका देहान्त 11 मई 1975 को कानपुर में हुआ। 1921 से 1945 तक कई बार जेल गये किन्तु स्वर नहीं बदला।क्रान्त स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218 1 2 2006 प्रवीण प्रकाशन नई दिल्ली hi 81-7783-120-8 549 https://web.archive.org/web/20131014175453/http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218 14 अक्तूबर 2013 live प्रताप और टंकार जैसे दो दो साप्ताहिक समाचार पत्रों का सम्पादन किया। त्रिवेदी जी ने कुछ पुस्तकें भी लिखी थीं जिनमें उल्लेखनीय थी-काकोरी के दिलजले जो 1939 में छपते ही ज़ब्त हो गयी। उनकी यह पुस्तक इतिहास का एक दुर्लभ दस्तावेज़ है।क्रान्त स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218 1 1 2006 प्रवीण प्रकाशन नई दिल्ली hi 81-7783-119-4 235 https://web.archive.org/web/20131014175453/http://www.worldcat.org/title/svadhinata-sangrama-ke-krantikari-sahitya-ka-itihasa/oclc/271682218 14 अक्तूबर 2013 live
संक्षिप्त जीवनी
राम दुलारे त्रिवेदी का जन्म उन्नाव जिले के करनाई पुर गाँव में 1902 के मार्च महीने में हुआ था। बचपन में पिता गुजर गये। परिवार में विधवा माँ और एक छोटा भाई था। गणेशशंकर विद्यार्थी ने उन्हें कानपुर में स्काउट मास्टर की नौकरी दिला दी। नई नई नौकरी लगी थी कि 1921 में असहयोग आन्दोलन शुरू हो गया। उन्होंने एक स्वयंसेवक की हैसियत से उसमें शिरकत की और पीलीभीत में गिरफ्तार कर लिये गये। सज़ा हुई और बरेली जेल भेज दिये गये। वहाँ उनकी मुलाकात रोशन सिंह से हुई जो उस समय शाहजहाँपुर के सक्रिय सदस्य के रूप में पहले से ही सज़ा काट रहे थे। जेल में इन्हें चक्की पीसने को दी गयी तो जेलर से भिड़ गये जिसके कारण बड़ी मार पड़ी किन्तु चक्की नहीं पीसी। जेल की पुलिस द्वारा भयंकर यातनायें दी गयीं किन्तु वे एक ही उत्तर देते रहे - "चक्की औरतें पीसती हैं, मर्द नहीं।" आखिरकार तन्हाई की कोठरी में डाल दिया गया।
1924 में स्थापित हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के सदस्यों में त्रिवेदी जी का प्रमुख योगदान था। यही संस्था बाद में हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में तब्दील हो गयी। उन्हें क्रान्तिकारी गतिविधियों में भाग लेने के कारण गिरफ्तार किया गया। काकोरी काण्ड के मुकदमे के फैसले में उन्हें 1926 में केवल पाँच वर्ष की सजा ही सुनायी गयी क्योंकि उनके खिलाफ़ पुलिस कोई पुख्ता सबूत नहीं जुटा सकी।
जेल से छूटकर आने के बाद उन्होंने पहले प्रताप में काम किया फ़िर अपना अखबार टंकार निकाला। आजीवन खादी के अतिरिक्त उन्होंने नं तो कोई अन्य वस्त्र पहना और न ही अपने स्वाभिमान की कीमत पर किसी से कभी समझौता किया।
लेखन कार्य
त्रिवेदी जी बरेली सेण्ट्रल जेल से छूटकर कानपुर आ गये। कानपुर आने के बाद विवाह किया, दो पुत्रियों को जन्म देने के बाद पत्नी चल बसीं। अपने छोटे भाई के परिवार के साथ रहते हुए पूरा जीवन काट दिया। सरकार के खिलाफ़ लेख लिखने के कारण बार बार किसी न किसी आरोप में जेल जाते रहे। उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखी थीं जिनमें मुख्य हैं-
शहीद सरदार भगत सिंह-1938 ई०
काकोरी के दिलजले-1939 ई० (द्वितीय संस्करण 'काकोरी-काण्ड के दिलजले' नाम से लोकहित प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित - 2002 ई०)
उनकी पुस्तक काकोरी के दिलजले ब्रिटिश राज द्वारा तत्काल ज़ब्त कर ली गयी। जब हिन्दुस्तान आज़ाद हो गया तो यह पुस्तक पुन: प्रकाशित हुई। त्रिवेदी जी को इस बात का बहुत मलाल रहा कि जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा मेरी कहानी में काकोरी काण्ड के मुकदमें को उल्लेख करने के योग्य ही न समझा जबकि पण्डित नेहरू लखनऊ जेल में क्रान्तिकारियों से सलाह मशविरा करने अक्सर आते थे।
सन्दर्भ
इन्हें भी देखें
काकोरी काण्ड
राम प्रसाद 'बिस्मिल'
बाहरी कड़ियाँ
काकोरी के दिलजले लेखक:रामदुलारे त्रिवेदी (गूगल बुक)
शहीद सरदार भगत सिंह - रामदुलारे त्रिवेदी (pdf).
श्रेणी:भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
श्रेणी:लेखक