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सौन्दरनन्दकाव्यम्
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सौन्दरनन्दकाव्यम्, अश्वघोष कृत संस्कृत ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ बुद्ध के सौतेले भाई आनन्द के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के प्रसंग पर आधारित है।
यह अश्वघोष का दूसरा महाकाव्य है जिसमें 18 सर्ग हैं। इस महाकाव्य में राजा नन्द और सुन्दरी की कथा का वर्णन है। नन्द, गौतम बुद्ध का सौतेला भाई था। वह अत्यन्त सुन्दर और विलासी प्रकृति का था। वह अपनी पत्नी सुन्दरी पर अत्यंत आसक्त था । इसलिए गौतम बुद्ध ने नंद को सांसारिक विषयों से अलग कर विवेक और इन्द्रियों पर विजय का उपदेश दिया।
सौन्दरनन्द का सर्गानुसार विषय विवेचन इस प्रकार है-
प्रथम सर्ग में गौतम बूद्ध की जन्मभूमि कपिलवस्तु का वर्णन है। प्रथम सर्ग में मंगलाचरण के स्थान पर गौतम का ही उल्लेख है।
द्वितीय सर्ग में राजा शुद्धोदन का वर्णन, गौतम और नन्द के जन्म का वर्णन है।
तृतीय सर्ग में गौतम की बुद्धत्व प्राप्ति का उल्लेख है।
चतुर्थ सर्ग में नंद और सुन्दरी के प्रणय व्यवहार मेंडूबे होने पर गौतम का भिक्षा लेने आना, विना भिक्षा लिए लौट जाना वर्णित है। जब नंद को इस बात का आभास होता है, तो वह गौतम से क्षमा याचना के लिए जाते हैं।
पंचम सर्ग में बुद्ध द्वारा नंद को दीक्षा नन्द का साधुवेष धारण करना।
षष्ठ सर्ग में अपने प्रियतम के लौटने पर प्रतीक्षा करती हुई नंद की पत्नी सुन्दरी का करुण विलाप है।
सप्तम सर्ग में सुंदरी के वियोग में नंद का विलाप है।
अष्टम सर्ग में तथा नवम सर्ग में एक साधु श्रमण नन्द को उपदेश देता है। नन्द से कहता है कि आप उच्च मार्ग को अपनाकर फिर विषय वासना में लिप्त होना चाहते हैं,जो सर्वथा त्याज्य है।
दशम सर्ग में भगवान बुद्ध अपने योग्य विद्या के बल से नंद को उड़ाकर स्वर्ग ले जाकर अनुपम सुंदरियों के दर्शन कराते हैं।
एकादश सर्ग में आनंद नामक भिक्षु अप्सरा की प्राप्ति के लिए तपस्या करने वाले नंद का उपहास करते हैं।
द्वादश सर्ग में नंद बुद्ध के पास जाकर निर्वाण प्राप्ति का उपाय पूछते हैं। बुद्ध उसे विवेक का उपदेश देते हैं।
त्रयोदश सर्ग में बुद्ध नंद को शील एवं संयम का पाठ पढ़ाते हैं।
चतुर्दश सर्ग में इंद्रियो पर विजय के लिए आवश्यक कर्तव्यो का वर्णन है।
पंचदश सर्ग में मानसिक शुद्धि का प्रतिपादन किया गया है।
षोड़श सर्ग में चार आर्य सत्यों की व्याख्या है।
सप्तदश सर्ग में नन्द को अमृतत्व की प्राप्ति का वर्णन है।
अष्टादश सर्ग' में नन्द ज्ञान उपदेशों से कृतार्थ होकर गुरु के पास पहुंचता है तथा शांतचित्त से आशीर्वाद प्राप्त करता है।
कुछ विद्वान सौन्दरनन्दम् को बुद्धचरित से पूर्व की रचना मानते हैं , किन्तु सौन्दरनन्दम् की विकसित काव्य शैली को देखकर इसे बुद्धचरित के बाद की रचना मानना ही उचित प्रतीत होता है। इसके पूरे सर्ग संस्कृत भाषा में ही उपलब्ध होते हैं। डॉक्टर हरप्रसाद शास्त्री ने नेपाल में प्राप्त पांडुलिपियों के आधार पर इसे प्रकाशित कराया था। डॉक्टर बिमला चरण लाहा ने इसका बांग्ला भाषा में अनुवाद प्रकाशित किया था। इसका प्रामाणिक संस्करण डॉक्टर जॉनसन ने 1928 में प्रकाशित किया। यह ग्रंथ चीनी एवम् तिब्बती भाषा में उपलब्ध नहीं होता।
बाहरी कड़ियाँ
सौन्दरनन्दकाव्यम् (संस्कृत विकिस्रोत)
सौन्दरनन्दकाव्य (हिन्दी अनुवाद सहित ; अनुवादक - सूर्यनारायण चौधरी)
सौन्दरनन्दकाव्य में प्रकृति चित्रण
सन्दर्भ
श्रेणी:संस्कृत ग्रन्थ